शनिवार, जनवरी 31, 2009

कोहनी/बलराम अग्रवाल


बच्ची चीजों को ठीक-से अभी समझने लायक बड़ी नहीं हुई थी। बोलने में भी तुतलाहट थी। लेकिन भाभी ने अभी से उस पर मेहनत करना शुरू कर दिया था। वे शायद जता देना चाहती थीं कि न तो वह साधारण माँ हैं और न ही रेखा साधारण बच्ची। अपने इस प्रोजेक्ट पर उन्होंने कितने दिनों तक कितने घंटे रोज़ाना उस मासूम को तपाया, नहीं मालूम। बहरहाल, एक दिन अपने ‘उत्पाद’ को उन्होंने घर आने वालों के आगे उतार दिया।
“सारे बॉडी-पार्ट्स याद हैं हमारी रेखा को।” वह सौरभ से बोलीं।
“अच्छा!”
“अभी देख लीजिए...” कहते हुए भाभी ने बच्ची से कहा,“रेखा, अंकल को हैड बताओ बेटे।”
रेखा ने मासूमियत के साथ मम्मी की ओर देखा।
“हैड...हैड किधर है?” भाभी ने जोर डालकर पूछा।
रेखा ने दोनों नन्हीं हथेलियाँ अपने सिर पर टिका दीं।
“हेअर?”
उसने बालों को मुट्ठी में भर लिया और किलकिलाकर ताली बजा दी।
“नोज़ बताओ बेटे, नोज़।”
बच्ची ने नाक पर अपनी अँगुलियाँ टिका दीं।
“आप भी पूछिए न भैया!” भाभी ने सौरभ से कहा।
“आप ही पूछती रहिए।” सौरभ मुस्कराहट के साथ बोला,“मेरे पूछने पर बता नहीं पायेगी।”
“ऐसा कहकर आप रेखा की एबिलिटी पर शक कर रहे हैं या हमारी?” उसकी बात पर भाभी ने इठलाते हुए सवाल किया।
उनके इस सवाल पर सौरभ पहले जैसा ही मुस्कुराता हुआ अपनी जगह से उठकर रेखा के पास आया और बोला,“कोहनी बताओ बेटा, कोहनी किधर है?”
सौरभ का सवाल सुनकर बच्ची ने अपनी माँ की ओर देखा, जैसेकि इस तरह का कोई शब्द उसकी मेमोरी में ट्रेस हो ही नहीं पा रहा हो।
“क्या भैया...आप भी बस...!” बच्ची की परेशानी को महसूस करके भाभी ने सौरभ को झिड़का, “हिन्दी में क्यों पूछ रहे हैं?” यह कहती हुई वह रेखा की ओर झुकीं। कहा,“अंकल एल्बो पूछ रहे हैं बेटा,एल्बो!”
परेशानहाल बच्ची ने अपनी कोहनी को खुजाना शुरू किया, और भाभी तुरन्त ही उल्लासभरे स्वर में चीखीं,“येस, दैट्स इट माय गुड गर्ल!”

शुक्रवार, जनवरी 30, 2009

गिरावट/बलराम अग्रवाल

राज-मिस्त्री ठीक आठ बजे पहुँच गया था। मजदूर, एक वह खुद था और दूसरी उसकी बीवी। शाम तक दो तरफ की दीवारें करीब आधी-आधी खड़ी हो चुकी थीं। तभी, एक ट्रक उसके प्लॉट के आगे आ रुका। उसमें से, गरदन में रामनामी दुपट्टा डाले पच्चीस-तीस नौजवान धड़ाधड़ नीचे आ कूदे।
“किसका कमरा बन रहा है ये?” उनमें से एक ने आगे आकर पूछा।
“मेरा है।“ शरीर पर जगह-जगह गारा लगे रामाधार ने उसके सामने पहुँचकर कहा।
“ये शिलाएँ तुमको कहाँ से मिलीं?” उसने वहाँ पड़ी ईंटों की ओर इशारा करके पूछा।
“रघुनाथ मंदिर के पुजारी से...।” रामाधार ने कड़क आवाज में उत्तर दिया, “खरीदकर लाया हूँ, नगद।”
“बात नगद और उधार की नहीं, इनके गलत इस्तेमाल की है।” रेले के नेता ने उससे भी ज्यादा कड़क आवाज में कहा, “ये ईंटें नहीं, राम-शिलाएँ हैं। इनका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ राम-मंदिर बनाने में ही हो सकता है, कहीं और नहीं, समझे।”
उसके इस अंदाज से रामाधार तो अलग, उसकी बीवी और राजमिस्त्री भी दहशत में आ गये।
फोटो:रतन चन्द्र रत्नेश
“देखते क्या हो, सारी शिलाओं को डालो ट्रक में...।” नेता ने बस इतना ही कहा था कि साथ आये राम-सेवकों ने ताजा खड़ी की उन दीवारों को एक धक्के में जमीन दिखा दी। उसके बाद वे प्रशिक्षित वानरों की तरह ईंटों पर टूट पड़े।
आनन-फानन में उन्होंने सारी की सारी ईंटें उनके टुकड़ों समेत ट्रक में लाद दीं और खुद भी उस पर जा लदे।
“हिन्दू होकर ऐसा काम करते शर्म आनी चाहिए।” वापस जाते ट्रक में चढ़्ते हुए नेता ने रामाधार पर लानत भेजी, “थूकता हूँ तेरी इस हरकत पर...थू!”

गुरुवार, जनवरी 29, 2009

आदमी का बच्चा/बलराम अग्रवाल


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हूँऽ…! चरणों में चढ़ाए गए पचास रुपए के नोट को कुर्ते की जेब के हवाले करते पंडितजी के गले से आवाज निकली। पूछा,कितने बजे के करीब हुआ?
बजे तो ठीक-ठीक नहीं मालूम… पहली बार पिता बने काले-धूसर नौजवान ने उनसे यथेष्ट दूरी पर उकड़ू बैठते हुए बताया,लेकिन, चिड़ियों ने पेड़ों पर चहचहाना शुरू कर दिया था और…सूरज बस उगने-उगने को ही था। पूरब दिशा में लाली तो फैल ही चुकी थी नीचे-नीचे…।
तफ्सीस सुनकर पंडित जी ने पंचांग उठाया। पन्ने पलटकर कुछ पंक्तियों पर तर्जनी को फेरा। फिर कनिष्ठा और अनामिका पर कुछ जोड़ा-घटाया और तनकर बैठ गये।
इतनी देर तक वह नौजवान उत्सुकतावश आँखें फाड़कर उनकी ओर देखता बैठा रहा
बधाई हो कनाईराम, बड़े शुभ-मुहूर्त में पैदा हुआ है बालक… पंडितजी ने अपनी भवें उँची करके बताया,कारों में घूमेगा जिन्दगीभर!
उनकी इस उद्घोषणा पर कनाई का मुँह खुला का खुला रह गया। खुशी से नहीं, संदेह और आशंका से।
कैसी बात करते हैं पंडज्जी…! कुछ देर के भौंचक्केपन के बाद उसके मुँह से स्वत: ही फूटा,कुछ इधर-उधर पड़ गया लगता है हिसाब।
तेरा हिसाब भी मैंने ही लगाया था बेटा…और तेरे बाप का भी। उसकी इस बात पर पंडितजी त्यौरियाँ चढ़ाकर बोले,पिछले पचास सालों से पलट रहा हूँ ये पन्ने। उँगलियों पर आ गया है सारा हिसाब, कॉपी-पेंसिल की जरूरत अब मुझे नहीं पड़ती…।
फिर भी…पंडज्जी…। कनाई हकलाया।
विद्याधर की कही हुई कोई बात आज तक तो गलत निकली नहीं कभी! अपने ज्योतिष-ज्ञान की तड़ी उस पर पेलते हुए पंडितजी बोले,मेरी इस घोषणा को तू आम बात मत समझ, तेरे बेटे के बारे में यह मेरी भविष्यवाणी है भविष्यवाणी!
उनकी इस बात पर कनाई जैसे फिर-से मूक हो गया। कुछेक पल वह अन्यमनस्क-सा चुप बैठा रहा। खदान-मालिकों की बीवियों और बेटियों की कारों की खिड़कियों पर पंजे जमाए बैठे, जमीन पर उछलने-कूदने की हसरत अपनी देह और दृष्टि में भरे, उनकी गोद से निकल भागने को कुलबुलाते-कसमसाते और कारों की खिड़कियों से बाहर झाँकते कुत्तों और पिल्लों के कितने ही दृश्य उसके जेहन में घूम गये।
ये हाथ देखिए पंडज्जी। कोयले-सी काली अपनी कठोर हथेलियों को पंडितजी के आगे करते हुए वह बोला, लोहे के घन से चट्टानों को चटखाने और चूर कर डालने वाले इस कनाई का बेटा है वो सीने को अपनी खुरदुरी हथेली से ठोकते हुए उसने लगभग उत्तेजित अंदाज में बोलना शुरू किया,और खदान में पसीना बहाने वाली एक जवान औरत ने उसे जना है।…शुभ-शुभ बोलो पंडज्जी! उसने कहा,किसी कुत्ते का नहीं, इस आदमी का बच्चा है वह …
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बुधवार, जनवरी 28, 2009

कंधे पर बेताल/बलराम अग्रवाल



गारा-मजदूरी करके थोड़ी-बहुत कमाई के बाद शाम को रूपलाल घर की ओर लौट रहा था। अपनी ही धुन में मस्त। बीड़ी सुट्याता हुआ।
रास्ते में, एक झाड़ी के पीछे से कूदकर एक लुटेरा अचानक उसके सामने आ खड़ा हुआ। रूपलाल अचकचा गया। लुटेरे ने उसको सँभलने का मौका नहीं दिया। छुरा चमकाकर गुर्राया_“जान प्यारी है तो जो कुछ पास में है, निकालकर जमीन पर रख दे, चुपचाप।
चेतावनी सुनकर रूपलाल ने एक नजर लुटेरे के चेहरे पर डाली, दूसरी उसके छुरे पर और अण्टी से निकालकर उस दिन की सारी कमाई जमीन पर रख दी।
अब भाग यहाँ से,” लुटेरा दहाड़ा,“पीछे मुड़कर देखा तो जान से मार डालूँगा।
रूपलाल पीछे पलटा और दौड़ पड़ा।
विक्रम!” यह कहानी सुनाने के बाद उसके कंधे पर लदे बेताल ने उससे पूछा, “सवाल यह है कि एक मेहनतकश होते हुए भी रूपलाल ने इतनी आसानी से अपनी कमाई को क्यों लुट जाने दिया? संघर्ष क्यों नहीं किया? डरकर भाग क्यों गया?”
बेताल!” विक्रम ने बोलना शुरू किया, “रूपलाल का लुटेरे के चेहरे और छुरे पर नजर डालना उसकी निडरता और बुद्धिमत्त्ता दोनों की ओर इशारा करता है। ऐसा करके वह कई बातें एक साथ सोच जाता है। पहली यह कि हर हाथापाई को संघर्ष नहीं कहा जा सकता। जोश के जुनून में ग़ैर-हथियार आदमी का किसी हथियारबंद आदमी से उलझ जाना उसकी मूर्खता भी सिद्ध हो सकता है। दूसरी यह कि भाग जाना हमेशा ही पलायन नहीं कहलाता। संघर्ष में बने रहने के लिए कभी-कभी आदमी का जिंदा रहना ज्यादा जरूरी होता है।
बिल्कुल ठीक।बेताल बोला, “उचित और अनुचित का विवेक ही मजदूर की असली ताकत होता है।...अब, अगली समस्या-कथा सुनो_”
अब बस करो यार! मेरा मौन टूट गया...” विक्रम बोला, “...अब कंधे पर से खिसको और अपने पेड़ पर उलटे जा लटको, जाओ।
किस जमाने की बात कर रहे हो विक्रम।बेताल बोला, “तुम अब आम आदमी हो गये हो, राजा नहीं रहे। इस जमाने में समस्याओं का बेताल तुम्हारे कंधे से कभी उतरेगा नहीं, लदा रहेगा हमेशा। तो सुनो_”
उफ!” विक्रम के मुँह से निकला और कंधे पर लदे बेताल समेत थका-हारा-सा वह वहीं बैठ गया।

मंगलवार, जनवरी 27, 2009

सेक्यूलर/बलराम अग्रवाल


गाँव में पता नहीं किस बात पर दो परिवारों में लाठियाँ चल गयीं। खूब सिर फूटे, हड्डियाँ टूटीं। औरतों के कपड़े फटे और...।
पुलिस पहुँची। कुछ को अस्पताल में डाल आई, कुछ को हवालात में डाल दिया। दोनों ओर के बचे-खुचे लोग अपने-अपने आकाओं की ओर दौड़े। एक ने इस राजनीतिक-दल का दामन थामा तो दूसरे ने उस के तलवे चाटे।
ओ पाट्टी किस जाती को बिलौंग करता है? इस के नेता ने कान को कुरेदते हुए पूछा।
अपनी ही जाती का है ससुरा।
अपनी ही जाती का पाट्टी से किस ग्राउंड पर लड़ोगे? नेता हताश स्वर में बुदबुदाया।
मतलब?
मतलब ये...ऽ...कि सबरन रहा होता तो...अब किसके खिलाफ बोलेंगे?
बोलेंगे न सरकार… उनकी हताशा पर वह तुरन्त बोला,वे लोग उस पार्टी की सपोर्ट पा रहे हैं...पुलिस पर दवाब बनाकर बाहर भी निकाल चुके हैं अपने कई आदमियों को...।
अइसा! यह सुनते ही सांसद-सर की बाँछें खिल उठीं,तब तो समझो बन गया बात...। ऊ साला कम्यूनल पाट्टी...असान्ती फैलाया इलाके में... गाँव-बिरादरी को लड़ाया आपस में...दलितों पर जानलेवा हमला कराया...पुलिस भी दलितों को ही परेशान कर रही है...। बहुत तगड़ा बेस बन गया...वाह ! ...अब देख, मैं कैसे उनकी माँ-बहन को नंगा करता हूँ भरे सदन में...। कुल दस हजार लूँगा...ला, पेशगी निकाल...।
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सोमवार, जनवरी 26, 2009

सरकारी अमला/बलराम अग्रवाल


आरोप है कि तुमने सरकारी अमले पर हमला किया और उसके काम में बाधा डाली। फाइल के पन्नों को पलटते हुए मजिस्ट्रेट ने मुलजिम से कहा।
वे लोग मेरे मकान पर बुलडोजर चला रहे थे जनाब...!
लेकिन उनका कहना है कि उनके पास मकान नम्बर डी-फाइव को तोड़्ने का सरकारी आदेश-पत्र मौजूद था जो तुम्हें दिखा दिया गया था। फाइल के पन्नों को और-आगे पलटते हुए वह बोला।
उन्होंने मुझे डी-फाइव लिखा एक सादा कागज दिखाया था, बस।
यानी कि तुम स्वीकार करते हो कि आदेश-पत्र तुम्हें दिखाया गया था... फाइल पर से हटाकर मजिस्ट्रेट ने इस बार उसके चेहरे पर नजर टिकाकर पूछा।
लेकिन, उस नम्बर के तो शहर में हजारों मकान होंगे।...मेरे मकान के पीछे वाली सड़क के उस पार नगर विकास मन्त्री की कोठी का नम्बर भी डी-फाइव ही है...।
राजनीतिक ईर्ष्या! उसकी बात पर मजिस्ट्रेट के मुख पर परिहासपरक मुस्कान तैर आई।
कैसी बातें करते हैं जनाब! मजिस्ट्रेट की मुस्कान से घबराकर वह बोल उठा,मैं भला राजनीति क्यों करूँगा...। राजनीति में तो सड़क से संसद तक सब चोर हैं।
हुम्म...बहुत चिढ़े हुए नजर आते हो। बाहर यही बातें तुम अदालत के बारे में भी करते होगे?
न...नहीं जनाब!
अदालत में खड़े होकर झूठ बोलने और बाहर उसकी मानहानि करने के जुर्म में…नगद जुर्माना एक हजार रुपए या सश्रम कारावास एक मास... मजिस्ट्रेट ने लिखा और कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
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रविवार, जनवरी 25, 2009

महाप्रलय में औरत/बलराम अग्रवाल


ऊपर, लरजते-गरजते, पानी बरसाते और बिजलियाँ गिराते काले-कलूटे बादलों के झुण्ड थे। नीचे, चारों ओर पानी ही पानी था, लेकिन न पीने लायक । फलों से लदे पेड़ थे, लेकिन प्रलय के पानी में शीर्षासन करते…अँधेरे आसमान से मदद की उम्मीद में जड़ें ऊपर उठाए, बहे जाते । कितनी ही तरह की चिड़ियाँ और मछलियाँ थीं,लेकिन गंदले और उफनते पानी की सतह पर निश्चल पड़ी बही जातीं, बेदम ।
धरती पर पर्वत-श्रृंखला की बची-खुची एक चोटी पर निश्चल बैठी दुनिया की आखिरी औरत यह सब देख रही थी ।
समस्त मानवजाति नष्ट हो गयी।
एकाएक उसे पुरुष-स्वर सुनाई दिया । उसने आवाज़ की दिशा में अपनी दृष्टि घुमाई । वह दुनिया का शायद आखिरी पुरुष था जो धीरे-धीरे चोटी की ओर चढ़ रहा था ।
सृष्टि में मानवजाति के आस्तित्व को बचाए रखने की जिम्मेदारी अब हम दोनों पर ही बची है... औरत के सामने की एक शिला पर किसी तरह टिककर वह बोला ।
औरत ने एक गहरी दृष्टि उसके चेहरे पर डाली और गंभीर-स्वर में बोली, भोग की तुम्हारी लालसा महाप्रलय के इस भयावह चरण में भी जस की तस है!
मानवजाति को बचाए रखने की मेरी भावना को भोग की लालसा कहकर बाढ़ के पानी में तैरते इन झागों और बुलबुलों की तरह मत बहाओ... औरत की आँखों में आँखें डालकर उसने कहा,हमेशा यों ही नहीं चढ़ते रहना है यह जल, उतरेगा जरूर । डरो मत…डरो मत।
जल का स्तर ऊँचा होते-होते बड़ी तेजी के साथ पर्वत के उस शेष-शिखर की ओर बढ़ रहा था । इस बीच बड़ी से बड़ी शिला भी उसका स्पर्श पाते ही अपनी जगह को छोड़कर तलहीन जल में समाए जा रही थी। छोटी-मोटी पहाड़ियाँ तो चीनी के ढेर की तरह कब की उसमें गल चुकी थीं। औरत लगातार इस उथल-पुथल पर नजर रखे हुए थी, लेकिन मर्द उस ओर पीठ किए बैठा था । औरत को लगा कि मानवजाति को बचाए रखने का जुनून पाले बैठे इस मर्द के समीप रहते, महाप्रलय के इस भीषण और भयावह मौके पर भी उसकी इज्जत पहले जितनी ही असुरक्षित है। ईश्वर की प्राथमिकता भी इस समय किसी वस्तु को बचाने की बजाय उसे डुबोने और नष्ट-भृष्ट कर डालने की महसूस होती है। ऐसे में, जो कुछ भी करना है खुद उसे ही करना है।
मानवजाति को बचाने का खयाल छोड़…और फिलहाल तो तू अपने आप को बचा...। औरत निर्णायक-स्वर में दहाड़ी और जोरों की एक लात उसने पुरुष के सीने पर दे मारी।
उस समय जल का भयावह गर्जन सुनने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं था, पुरुष के उसमें गिरने की हल्की-सी आवाज़ को कौन सुनता ।
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शनिवार, जनवरी 24, 2009

बिना नाल का घोड़ा/बलराम अग्रवाल

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उसने देखा कि आफ़िस के लिए तैयार होते-होते वह चारों हाथ-पैरों पर चलने लगा है । तैयार होने के बाद वह घर से बाहर निकला । जैसे ही सड़क पर पहुँचा, घोड़े में तब्दील हो गया । अपने जैसे ही साधारण कद और काठी वाले चमकदार काले घोड़े में । माँ, पिता, पत्नी और बच्चे-सबको उसने अपनी गरदन से लेकर पीठ तक लदा पाया । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, सड़ाक से एक हंटर उसके पुट्ठे पर पड़ा,देर हो चुकी है, दौड़ो...!
वह दौड़ने लगाठकाठक...ठकाठक...ठकाठक...ठकाठक...
तेज़...और तेज़...! ऊपर लदे लोग एक-साथ चिल्लाए।
वह और तेज़ दौड़ासरपट।
कुछ ही देर में उसने पाया कि वह आफिस के सामने पहुँच गया है। खरामा-खरामा पहले वह लिफ़्ट तक पहुँचा, लिफ़्ट से फ़्लोर तक और फ़्लोर से सीट तक। ठीक से वह अभी सीट पर बैठा भी नहीं था कि पहले से सवार घरवालों को पीछे धकेलकर बॉस उसकी गरदन पर आ सवार हुआ।
यह सीट पर बैठकर आराम फरमाने का नहीं, काम से लगने-लिपटने का समय है मूरख ! दौड़... उसके पुट्ठों पर, गरदन पर, कनपटियों पर संटी फटकारते हुए वह चीखा।
उसने तुरंत दौड़ना शुरू कर दियाइस फाइल से उस फाइल तक, उस फाइल से उस फाइल तक....लगातार....लगातार...और दौड़ता रहा तब तक, जब तक कि अपनी सीट पर ढह न गया पूरी तरह पस्त होकर। एकाएक उसकी मेज़ पर रखे फोन की घंटी घनघनाईट्रिंग-ट्रिंग.. ट्रिंग-ट्रिंग...ट्रिंग...!
उसकी आँखें खुल गयीं। हाथ बढ़ाकर उसने सिरहाने रखे अलार्म-पीस को बंद कर दिया और सीधा बैठ गया। पैताने पर, सामने उसने माँ को बैठे पाया।
नमस्ते माँ! आँखें मलते हुए माँ को उसने सुबह की नमस्ते की।
जीते रहो! माँ ने कहा,तुम्हारी कुंडली कल पंडितजी को दिखाई थी। ग्रह-दशा सुधारने के लिए तुम्हें काले घोड़े की नाल से बनी अँगूठी अपने दायें हाथ की अँगुली में पहननी होगी।
माँ की बात पर वह कुछ न बोला, चुप रहा ।
बाज़ार में बहुत लोग नाल बेचते हैं। माँ आगे बोली,लेकिन, उनकी असलियत का कुछ भरोसा नहीं है। बैल-भैंसा किसी के भी पैर की हो सकती हैं।...मैं यह कहने को आई थी कि दो-चार जान-पहचान वालों को बोलकर काला-घोड़ा तलाश करो, ताकि असली नाल मिल सके।
नाल पर अब कौन पैसे खर्च करता है माँ! माँ की बात पर वह कातर-स्वर में बुदबुदाया,हंटरों और चाबुकों के बल पर अब तो मालिक लोग बिना नाल ठोंके ही घोड़ों को घिसे जा रहे हैं... यह कहते हुए अपने दोनों पैर चादर से निकालकर उसने माँ के आगे फैला दिए,लो देख लो।
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शुक्रवार, जनवरी 23, 2009

गोभोजन कथा/बलराम अग्रवाल

 
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याद आया, गऊशाला से भी निराश निकलते इन्दर ने पत्नी को बताया, अपना बशीर था न…वही, जो हाल के दंगों में मारा गया। उसकी गाय शायद गर्भिणी है।
छि:!
कमाल करती हो! इन्दर तमतमा गया, बशीर के खूँटे से बँधकर गाय, गाय नहीं रही, बकरी हो गयी? याद है, दंगाइयों के हाथों उस गाय को हलाक होने से बचाने के चक्कर में ही जान गई उस बेचारे की…।
दो-चार, दस-पाँच दिन का समय दिया होता तो कहीं और भी तलाश कर सकते थे हम। उसकी उपेक्षापूर्ण चुप्पी से क्षुब्ध होकर वह पुन: बोला, शुभ-मुहूर्त है!…आज ही से शुरू करना होगा!!… पड़ गई साले ज्योतिषी के चक्कर में।
चुप रही माधुरी, क्या कहती! सन्तान-प्राप्ति जैसे भावुक मामले में बेजान पत्थर और अव्व्ल अहमक तक को पीर-औलिया मानकर पूजने लगते हैं लोग। यह तो गाय थी, सजीव और साक्षात्। बशीर की ही सही। घर पहुँचकर उसने हाथ-मुँह धोए। लबालब तीन अंजुरीभर गेहूँ का आटा एक बरतन में डाला, तोड़कर गुड़ का एक टुकड़ा उसमें रखा और साड़ी के पल्लू से उसे ढाँपकर चल पड़ी बशीर के घर की ओर।
गाय बाहर ही बँधी थी, लेकिन गर्भिणी होना तय करने से पहले उसको कुछ देना माधुरी को ज्योतिषी की सलाह के अनुरूप नहीं लगा। सो, साँकल खटखटा दी। सूनी आँखों और रूख़े चेहरे वाली बशीर की विधवा ने दरवाज़ा खोला। देखती रह गयी माधुरीयह थी ही ऐसी रूखी-सूखी या…! इन्दर तो एक बार यह भी बताते थे कि बशीर का बच्चा इसके पेट में है…!
क्या हुक्म है?
मैं… माधुरी हूँ, इन्दर की पत्नी। कभी गाय के तो कभी बशीर की बीवी के पेट को परखती माधुरी जैसे तन्द्रा से जाग उठी—“आटा लाई हूँ…ज्यादा तो नहीं, फिर भी अपनी हैसियत-भर…तुम्हारे लिए जो भी बन पड़ेगा, हम करेंगे बहन। बरतन के ऊपर से पल्लू हटाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए उसने कहा, संकोच न करो…रख लो…बच्चे की खातिर।
बशीर की विधवा ने चूनर को अपने पेट पर सरका लिया और फफककर चौखट के सहारे सरकती हुई, धीरे-धीरे वहीं बैठ गयी।

गुरुवार, जनवरी 22, 2009

अज्ञात गमन/बलराम अग्रवाल

चौराहे के घंटाघर से दो बजने की आवाज़ घनघनाती है। बंद कोठरी में लिहाफ के बीच लिपटे दिवाकर आँखेंखोलकर जैसे अँधेरे में ही सब-कुछ देख लेना चाहते हैं—दो जवान बेटों में से एक, बड़ा, अपनी शादी के तुरंत बाद हीबहू को लेकर नौकरी पर चला गया था। राजी-खुशी के दो-चार पत्रों के बाद तीसरे ही महीने—पूज्य पिताजी, बाहररहकर इतने कम वेतन में निर्वाह करना कितना मुश्किल है! इस पर भी, पिछले माह वेतन मिला नहीं। हो सके तो, कुछ रुपए खर्च के लिए भेज दें। अगले कुछ महीनों में धीरे-धीरे लौटा दूँगा…लिखा पत्र मिला।
रुपए तो दिवाकर क्या भेज पाते। बड़े की चतुराई भाँप उससे मदद की उम्मीद छोड़ बैठे। छोटा उस समय कितनाबिगड़ा था बड़े पर—हद कर दी भैया ने, बीवी मिलते ही बाप को छोड़ बैठे!
इस घटना के बाद एकदम बदल गया था वह। एक-दो ट्यूशन के जरिए अपना जेब-खर्च उसने खुद सँभाल लिया थाऔर आवारगी छोड़ आश्चर्यजनक रूप से पढ़ाई में जुट गया था। प्रभावित होकर मकान गिरवी रखकर भी दिवाकरने उसे उच्च-शिक्षा दिलाई और सौभाग्यवश ब्रिटेन के एक कालेज में वह प्राध्यापक नियुक्त हो गया। वहाँ पहुँचकरवह अपनी राजी-खुशी और ऐशो-आराम की खबर से लेकर दिवाकर ‘ससुर’ और फिर ‘दादाजी’ बन जाने तक कीहर खबर भेजता रहा है। लेकिन वह, यहाँ भारत में, क्या खा-पीकर जिन्दा हैं—छोटे ने कभी नहीं पूछा।
…कल सुबह, जब गिरवी रखे इस मकान से वह बेदखल कर दिए जाएँगे—घने अंधकार में डबडबाई आँखें खोलेदिवाकर कठोरतापूर्वक सोचते हैं…अपने बेटों के पास दो पत्र लिखेंगे…यह कि अपने मकान से बेदखल हो जाने औरउसके बाद कोई निश्चित पता-ठिकाना न होने के कारण आगे से उनके पत्रों को वह प्राप्त नहीं कर पाएँगे।

बुधवार, जनवरी 21, 2009

अलाव के इर्द-गिर्द/बलराम अग्रवाल



खनों तक खेत में धँसे मिसरी ने सीधे खड़े होकर पानी से भरे अपने पूरे खेत पर निगाह डाली। नलकूप की नाली में बहते पानी में उसने हाथ-पाँव और फावड़े को धोया और श्यामा के बाद अपना खेत सींचने के इन्तजार में अलाव ताप रहे बदरू के पास जा बैठा।
बोल भाई मिसरी, के रह्या थारे मामले में? बदरू ने पूछा।
सब ससुर धोखा। अलाव के पास ही रखी बीड़ियों में से एक को सुलगाकर खेत भर जाने के प्रति कश-ब-कश आश्वस्त होता मिसरी बोला,ई ससुर सुराज तो फिस्स हुई गया रे बदरू।
कउन सुराज…इस स्यामा का छोरा?
स्यामा का नहीं, गाँधी का छोरा…पिर्जातन्त!
मैंने तो पहले ही कह दिया था थारे को। ई कोर्ट-कचहरी का न्याय तो भैया पैसे वालों के हाथों में जा पहुँचा। सब बेकार।
गलती हुई रे बदरू। थारी जमीन हारने के बाद मैं कित्ता रोया था उसमें बैठकर।… और यही बात मैंने कही थी उस बखत, कि एका नहीं होगा तो थोड़ा-थोड़ा करके हर किसान का खेत चबा जाएगा चौधरी। अलाव की आग को पतली-सी एक डण्डी से कुरेदते हुए बदरू बोला,और आज ही बताए देता हूँ, थारे से निबटते ही इस स्यामा की जमीन पर गड़ेंगे उसके दाँत!
बदरू की बात के साथ ही मिसरी की नजरें खेत सींचने में मस्त श्यामा पर जा पड़ीं। बित्ता-बित्ता भर जमीन अपनी होने के अहसास ने उन्हें आजाद-हैसियत का गर्व दे रखा है। इस गर्व को कायम रखने की ललक ने मिसरी के अन्दर से भय की सिहरन को बाहर निकाल फेंका।
मुझे दे! चिंगारी कुरेद रहे बदरू के हाथ से डण्डी को लेकर मिसरी ने जगह बनाई और फेफड़ों में पूरी हवा भरकर चार-छ: लम्बी फूँक अलाव की जड़ में झोंकीं। झरी हुई राख के सैंकड़ों चिन्दे हवा में उड़े और दूर जा गिरे। अलाव ने आग पकड़ ली।
कुहासे-भरी उस सर्द रात के तीसरे पहर लपटों के तीव्र प्रकाश में बदरू ने श्यामवर्ण मिसरी के ताँबई पड़ गए चेहरे को देखा और इर्द-गिर्द बिखरी पड़ी डंडियों-तीलियों को बीन-बीन कर अलाव में झोंकने लगा।

मंगलवार, जनवरी 20, 2009

अकेला कब तक लड़ेगा जटायु/बलराम अग्रवाल



गभग चौथे स्टेशन तक कम्पार्टमेंट से सभी यात्री उतर गये। रह गया मैं और बढ़ती जा रही ठंड के कारण रह-रह क़र सिहरती, सहमी आँखों वाली वह लड़की। कम्पार्टमेंट में अनायास उपजे इस एकांत ने अनेक कल्पनाएँ मेरे म में भर दींकाश! पत्नी इन दिनों मायके में रह रही होती…बीमार…अस्पताल में होती…या फिर…। कल्पनाओं के इस उन्माद में अपनी सीट से उठकर मैं उसके समीप जा बैठा।
गाड़ी अगले स्टेशन पर रुकी। एक…दो…तीन नये यात्रियों ने प्रवेश किया, पूरे कम्पार्टमेंट का एक चक्कर लगाया और एक-एक कर उनमें से दो हमारे सामने वाली बर्थ पर आ टिके।
कहाँ जाओगे? गाड़ी चलते ही एक ने पूछा।
शामली। मैं बोला।
यह? सभ्यता का अपना लबादा उतारकर दूसरे ने पूछा।
येयि…यह…। मैं हकलाया।
मैं पत्नी हूँ इनकी। स्थिति को भाँपकर लड़की बोल उठी। अपनी दायीं बाँह से उसने मेरी बाँह को जकड़ लिया।
ऐसी की तैसी…तेरी…और तेरे इस शौहर की। दूसरे ने झड़ाक से एक झापड़ मुझे मारकर लड़की को पकड़ लिया।
बचा लो…बचा लो…यों चुप न बैठो…! मेरी बाँह को कुछ और जकड़कर लड़की भयंकर भय और विषाद से डकरा उठी। दुर्धर्ष नजर आ रहे उन गुण्डों ने बलपूर्वक उसे मेरी बाँह से छुड़ा लिया। मेरे देखते-देखते छटपटाती-चिंघाड़ती उस लड़की को कम्पार्टमेंट में वे दूसरी ओर को ले गये।
लड़की को छोड़ दो! उधर से अचानक चेतावनी-भरा स्वर उभरा।
यह निश्चय ही उस ओर बैठ गया तीसरा यात्री था। उस गहन रात को दनादन चीरती जा रही गाड़ी के गर्भ में उसकी चेतावनी के साथ ही हाथापाई और मारपीट प्रारम्भ हो जाने का आभास हुआ। काफी देर तक वह दौर चलता रहा। कई स्टेशन आये और गुजर गये। डिब्बे में अन्तत: नीरवता महसूस कर मैंने पेशाब के बहाने उठने की हिम्मत की। जाकर संडास का दरवाजा खोलातीसरे का नंगा बदन वहाँ पड़ा था…लहूलुहान…जगह-जगह फटा चेहरा! आहट पाकर पल-भर को उसकी आँखें खुलीं…नजर मिलते ही आँखों के पार निकलती आँखें। मर-मिटने का तिलभर भी माद्दा तुम अपने भीतर सँजोते तो लड़की बच जाती…और गुण्डे…! कहती, मेरे मुँह पर थूकती…थू-थू करती आँखें। उफ्फ!