मंगलवार, सितंबर 28, 2010

आखिरी उसूल /बलराम अग्रवाल

लात्कार की बात लड़की ने सबसे पहले मौसी के आगे रोई । मौसी ने उसकी बात पर हारी हुई-सी साँस ली; फिर बोली,औरत  के लिए सारे-के-सारे मर्द बाज़ हैं बेटी। उनकी निगाह में हमारी हैसियत एक कमजोर चिड़िया से ज्यादा कुछ भी नहीं है। बचकर रहना औरत को लुट जाने के बाद ही सूझता है। सब्र कर और....बचकर रहना सीख।
      लड़की सब्र न कर पाई। खुद पर बलात्कार की शिकायत लिखाने थाने में जा धमकी।
रहती कहाँ हो ? शिकायत सुनकर थानेदार ने पूछा।
फोटो:आदित्य अग्रवाल
जी....रेड-लाइट एरिया में। लड़की ने बताया।
रंडी हो ? इस बार उसने बेहया-अंदाज में पूछा।
ज्ज्जी। लड़की ने बेहद संकोच के साथ हामी भरी।
पैसा दिए बिना भाग गये होंगे हरामजादे, है न! वह हँसा।
यह बात नहीं है सर।
यही बात है... लड़की का एतराज सुनते ही वह एकदम-से कड़क आवाज में चीखा और अपनी कुर्सी पर से उठ खड़ा हुआ। उसके इस अप्रत्याशित व्यवहार से वह बुरी तरह चौंक गयी। भीतर का आक्रोश फूट पड़ने को छिद्र तलाशने लगा। उसका शरीर काँपने लगा। आँखों से बहती अश्रुधार कुछ और तेज हो गयी।
देखो, इस बार थानेदार ने समझाने के अन्दाज में बोलना शुरू किया,छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा हर कामदार कम-से-कम एक बार इस तरह की लूट का शिकार जरूर बनता है। जो अपने काम में लगा रहता है, वो देर-सवेर घाटे को पूरा भी कर लेता है। लेकिन, जो इसे सीने से लगाए घूमता है, वो कहीं का नहीं रहता।
मामला बिजनेस का नहीं है सर। लड़की ने तड़पकर कहा,आप समझने की कोशिश तो कीजिए। खरीदारों का नहीं है यह काम...।
रेड-लाइट एरिया की लड़कियों की शिकायतें दर्ज करने लगूँगा तो...। थानेदार ने उसके सामने खड़े होकर बोलना शुरू किया,तुम्हें तो पूरी जिन्दगी वहीं गुजारनी है। इस एक हादसे से ही इतना घबरा जाओगी तो...।
      लड़की बेबसी के साथ उसकी रूखी और गैर-जिम्मेदार बातों को सुनती रही और...।
जो हो चुका, उस पर खाक डालो। धमकी-भरे अन्दाज में वह कड़ाई के साथ उसका कंधा दबाकर बोला,हर काम, हर धंधे का पहला और आखिरी सिर्फ एक ही उसूल हैलड़ो किसी से नहीं।
नहीं......! एक झटके के साथ अपने कंधे से उसका हाथ झटककर लड़की पूरी ताकत के साथ चीखी,नहीं......!!

शनिवार, सितंबर 04, 2010

अन्तिम संस्कार/बलराम अग्रवाल


पिता को दम तोड़ते, तड़पते देखते रहने की उसमें हिम्मत नहीं थी; लेकिन इन दिनों, वह भी खाली हाथ, उन्हें किसी डॉक्टर को दिखा देने का बूता भी उसके अन्दर नहीं था। अजीब कशमकश के बीच झूलते उसने धीरे-से, सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की को खोला। दू…ऽ…रचौराहे पर गश्त और गपशप में मशगूल पुलिस के जवानों के बीच-से गुजरती उसकी निगाहें डॉक्टर की आलीशान कोठी पर जा टिकीं।
सुनिए… पत्नी ने अपने अन्दर से आ रही रुलाई को रोकने की कोशिश करते हुए भर्राई आवाज में पीछे से पुकारा,पिताजी शायद…
उसकी गरदन एकाएक निश्चल पड़ चुके पिता की ओर घूम गई। इस डर से कि इसे पुलिसवाले दंगाइयों के हमले से उत्पन्न चीख-पुकार समझकर कहीं घर में ही न घुस आएँ, वह खुलकर रो नहीं पाया।
ऐसे में…इनका अन्तिम-संस्कार कैसे होगा? हृदय से उठ रही हूक को दबाती पत्नी की इस बात को सुनकर वह पुन: खिड़की के पार, सड़क पर तैनात जवानों को देखने लगा। अचानक, बगलवाले मकान की खिड़की से कोई चीज टप् से सड़क पर आ गिरी। कुछ ही दूरी पर तैनात पुलिस के जवान थोड़ी-थोड़ी देर बाद सड़क पर आ पड़ने वाली इस चीज और टप् की आवाज से चौंके बिना गश्त लगाने में मशगूल रहे। अखबार में लपेटकर किसी ने अपना मैला बाहर फेंका था। वह स्वयं भी कर्फ्यू जारी होने वाले दिन से ही अखबार बिछा, पिता को उस पर टट्टी-पेशाब करा, पुड़िया बना सड़क पर फेंकता आ रहा था; लेकिन आज! टप् की इस आवाज ने एकाएक उसके दिमाग की दूसरी खिड़कियाँ खोल दींलाश का पेट फाड़कर सड़क पर फेंक दिया जाए तो…।
मृत पिता की ओर देखते हुए उसने धीरे-से खिड़की बन्द की। दंगा-फसाद के दौरान गुण्डों से अपनी रक्षा के लिए चोरी-छिपे घर में रखे खंजर को बाहर निकाला। चटनी-मसाला पीसने के काम आने वाले पत्थर पर पानी डालकर दो-चार बार उसको इधर-उधर से रगड़ा; और अपने सिरहाने उसे रखकर भरी हुई आँखें लिए रात के गहराने के इन्तजार में खाट पर पड़ रहा।