सोमवार, जनवरी 16, 2012

अथ ध्यानम्/बलराम अग्रवाल


भालुका तीर्थ मन्दिर, सोमनाथ(गुजरात)                              चित्र:बलराम अग्रवाल
 आलीशान बंगला। गाड़ी। नौकर-चाकर। ऐशो-आराम। एअरकंडीशंड कमरा। ऊँची, अलमारीनुमा तिजौरी। करीने से सजा रखी करेंसी नोटों की गड्डियाँ। माँ लक्ष्मी की हीरे-जटित स्वर्ण-प्रतिमा।
दायें हाथ में सुगन्धित धूप। बायें में घंटिका। चेहरे पर अभिमान। नेत्रों में कुटिलता। होंठ शान्त लेकिन मन में भयमिश्रित बुदबुदाहट।
“नौकरों-चाकरों के आगे महनत को ही सब-कुछ कह-बताकर अपनी शेखी आप बघारने की मेरी बदतमीजी का बुरा न मानना माँ, जुबान पर मत जाना। दिल से तो मैं आपकी कृपा को ही आदमी की उन्नति का आधार मानता हूँ, महनत को नहीं। आपकी कृपा न होती तो मुझ-जैसे कंगले और कामचोर आदमी को ये ऐशो-आराम कहाँ नसीब था माँ। आपकी जय हो…आपकी जय हो।” 

2 टिप्‍पणियां:

  1. भीतर-बाहर का यह भेद वाकई वहाँ सबसे अधिक पाया जाता है जहाँ उपलब्धि का आधार श्रम से इतर घटक होते हैं. श्रम है तो द्वैध की गुंजाइश कहाँ.

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  2. मां का आर्शीवाद भी तो इन पर ही होता है।

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