रविवार, अक्टूबर 25, 2026

तैरती हुई रोटियाँ / बलराम अग्रवाल

  


पति निकम्मा नहीं था, लेकिन कोरोना के चलते सभी तरह के निर्माण-कार्य बन्द थे। इसलिए घर में ही पड़े रहने को विवश था।

“सुनो,” भूख से विह्वल बच्चों को देखकर एक दोपहर पत्नी ने उससे कहा, “नहर पार वाले खेतों में खीरा, ककड़ी और टमाटर खूब लगे होंगे!…”

“तो?” उसके मन्तव्य को समझकर भी पति ने पूछा।

“आजकल तो सड़क-खेत सब सुनसान पड़े रहते हैं,” उसने कहा, “शाम को तो कुत्ता भी कहीं नजर नहीं आता…!”

“तेरे कहने का मतलब है कि मैं चोरी करके लाऊँ?”

“बच्चों का रोटी के लिए रोना मेरा कलेजा चीर डालता है!” उसने करुण भाव से कहा।

“मैं चोरी करने नहीं जा सकता!” पति ने फरमान सुनाया और अपनी विवशता पर रोता-सा खाट पर जा लेटा।

‘ठीक है, तुम नहीं जा सकते तो मैं ही सही।’ पति की बात सुनकर पत्नी ने अपने आप से कहा।

उसने दिन ढलने का इंतजार किया। दरवाजे से सिर निकालकर इधर-उधर झाँका। किसी को बाहर न देखकर नौ साल और पाँच साल के बेटों को साथ लिया और लम्बे-लम्बे डग बढ़ाती नहर की ओर निकल पड़ी।

उछलते-कूदते बच्चे आगे थे, वह पीछे। जैसे ही नहर के पुल पर पहुँचे, बड़े बेटे को पानी की सतह पर कुछ रोटियों के तैरती आने का आभास हुआ।

“अम्मा, रोटी!” वह जोर से चिल्लाया और पकड़ने के लिए धड़ाम से, तैरती हुई उन रोटियों पर कूद पड़ा।

उसकी देखा-देखी पाँच साल का छोटा भाई भी जा कूदा।

यह सब इतनी तेजी से हुआ कि वह कुछ समझ ही न पाई। आव देखा न ताव, बच्चों को बचाने के लिए वह भी नहर में कूद गई।

तीनों में से किसी को भी तैरना नहीं आता था। सिर्फ रोटियाँ थीं जो तैर सकती थीं। वे थीं भी या नहीं, कोई नहीं जानता।

                                              पिकरिंग, कनाडा 13-10-26/21:50 / प्रकाशित ‘साहित्य अमृत’ नवम्बर 2026

शनिवार, अक्टूबर 24, 2026

पेड़ पर रोटियाँ / बलराम अग्रवाल

 


दस वर्षीय राजू को तीन दिन से रोटी नसीब नहीं हुई थी। वह जब भी खाना माँगता, माँ कभी प्याज तो कभी मूली उसके हाथ में थमा देती।

“यह क्या बात हुई!” आज भी माँ ने गाजर आगे बढ़ाई तो वह रोटी ही लेने की जिद पर अड़ गया, “बिना रोटी के पेट भरता है क्या?”

 जिद पर अड़ा तो मजबूर माँ ने उसकी पिटाई कर दी। कहा, “रोटियाँ क्या पेड़ पर लगती हैं, कि जाऊँ और तोड़ लाऊँ?”

पिटकर राजू रोता हुआ अन्दर की कोठरी में रखे बिस्तरों के ढेर पर जा लेटा। भूख के मारे पेट में ऐंठन हो रही थी। रोते-रोते उसे नींद आ गई और वह सपनों की दुनिया में चला गया।

उसने देखा कि वह एक ऐसे जंगल में पहुँच गया है जो पूरा का पूरा गूँथे हुए आटे का ही बना था। वहाँ आटे के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ थे। यहाँ से वहाँ तक आटे के ही पेड़ थे; और उन सब पर गोल-मटोल रोटियाँ ही रोटियाँ लटकी हुई थीं। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सोचा—अब किसी भी दिन उसे या माँ को रोटी खाये बिना नहीं रहना पड़ेगा। रोटियाँ तोड़कर जेबों में भर लेने के लिए उसने हाथ ऊपर बढ़ाया; लेकिन पाया कि वे उसकी पहुँच से बाहर, बहुत ऊँची टहनियों पर लटकी थीं।

उसे याद आया कि घर में, जब भी किसी ऊँची जगह से कोई चीज उतरवानी होती है, माँ उसे अपने कंधों पर बैठाकर ऊँचा कर देती है।

‘यही ठीक रहेगा’—उसने सोचा और बुलाने के लिए जोर से पुकारने लगा, “माँ! इधर आओ, इधर! यहाँ रोटियों के पेड़ ही पेड़ हैं!”

उन पेड़ों के चारों ओर भागता हुआ, पता नहीं कितनी देर तक वह माँ को पुकारता रहा। माँ नहीं आई। थक-हारकर वह एक पेड़ के तने का सहारा लेकर बैठ गया। जल्द ही उसे नींद आ गयी। सपने में उसने देखा—पेड़ की टहनियों से टूटकर सुहाती-सुहाती-सी गरम रोटियाँ ठंड से ठिठुरती उसकी देह को चादर की तरह ढकने लगी हैं। रोटियों से बनी उस चादर को ऊपरी सिरों से पकड़कर उसने अपने कंधों तक खींच लिया और करवट बदल ली!

वह नहीं जान पाया कि फटी-पुरानी एक गरम चादर, रोते हुए सो गये अपने भूखे बेटे को ओढ़ाकर माँ आँसू पोंछती हुई बाहर निकल गयी थी।   

पिकरिंग, कनाडा 14-10-26/01:39 / प्रकाशित ‘साहित्य अमृत’ नवम्बर 2026