मंगलवार, जुलाई 14, 2015

कहानी / सहस्रधारा--बलराम अग्रवाल

दोस्तो,
आकाशवाणी, दिल्ली के विदेश सेवा प्रभाग के अन्तर्गत वार्ता/लघुकथा (यहाँ यह शब्द अंग्रेजी के शॉर्ट स्टोरी का शब्दानुवाद है जिसका अर्थ 'कहानी' होता है) शाखा के बुलावे पर आज दिनांक 14-7-2015 को अपनी कहानी 'सहस्रधारा' का संपादित पाठ प्रस्तुत करके आया हूँ। संपादित इसलिए कि कहानी पाठ के लिए समयावधि 10-12 मिनट निश्चित थी। मूल कहानी आपके अवलोकनार्थ यहाँ पेश है :


                                                                           चित्र:गूगल से साभार
देहरादून।
रोडमैप के मुताबिक तो मैंने ठीक ही सड़क पकड़ी थी। फिर भी, ज्यादा आगे बढ़ने से पहले आश्वस्त हो जाना बेहतर समझा। सुबह होने से पहले का धुँधलका अभी काफी शेष था। सड़क पर किसी कुत्ते तक का नामोनिशान नहीं था। पीठ पर लदा अपना बैगेज़ मैंने सड़क के किनारे वाले पार्क की एक बेंच पर रखा और हल्का-फुल्का व्यायाम कर समय बिताने लगा। काफी देर बाद पैंट-शर्ट पहने एक आकृति जॉगिंग करती हुई पार्क की ओर आती दिखाई दी। कुछ ही देर में वह काफी नज़दीक आ गयी। यह एक पहाड़ी लड़की थी। पार्क में मुझे व्यायाम करता देख किंचित आश्चर्य की रेखाएँ उसके माथे पर उभरीं लेकिन जाहिराना तौर पर वह सामान्य तरीके से पार्क में दाखिल हुई और जॉगिंग करती रही।
            अँ...एक्स्क्यूज़ मी।दूसरे चक्कर में वह मेरे निकट से गुज़री तो मैंने टोका।
            वह रुक गयी।
            सहस्रधारा जाना है मुझे।मैं बोला।
            ठीक जगह रुके हैं आप।वह बोली, “पहली बस ठीक छह बजे यहाँ से गुजरेगी।
            ले...ऽ...ट हो गयी तो?” मैंने शंका जाहिर की।
            पिछले पाँच सालों में तो कभी हुई नहीं।वह उपहासपूर्वक बोली।
            यानी कि पिछले पाँच सालों से आप लगातार यहाँ जॉगिंग कर रही हैं?” उसके रवैये को दरकिनार कर मैंने पूछा।
            सो व्हाट?” मेरी बात पर उसका चेहरा एकदम-से गर्म हो गया।
            डॉन्ट बी एंग्री...यूँ ही पूछ लिया मैंने तो।मैं बोला, “मुझे आप सिर्फ रोड-वे बता दीजिए...पैदल जाना चाहता हूँ।
पैदल!!!उसने आश्चर्यपूर्वक मुँह खोला, “शक्ल-सूरत से तो घुमक्कड़ नज़र नहीं आते आप?”
            तब?” मैंने पूछा।
            सच बता दूँ?”
            हाँ-हाँ।
            नहीं...
            आपकी तरह नकचढ़ा नहीं हूँ मैं।
            उठाईगीर।मेरी बात को सुनते ही वह थोड़ा हँसकर बोली।
            यह काम भी तो कोई घुमक्कड़ ही कर सकता है मैम!मैंने भी मुस्कराकर कहा।
            बहुत हो लिया।एक ही स्थान पर लेफ्ट-राइट कूदना शुरू कर वह चुटकी बजाती हुई बोली, “बाकी गप सहस्रधारा पर...फूटिए।
            सहस्रधारा पर!...मतलब?”
            वहाँ पर फैन्सी आइटम्स की एक छोटी-सी दुकान है हमारी।वह बोली, “छह बजे वाली बस से जाकर रोज़ाना मैं ही खोलती हूँ उसे। नौ बजे डैडी पहुँचते हैं, तब लौटती हूँ।
            मेरे सामने उसका यह दूसरा रूप खुला। मन हुआ कि उससे और-बातें करूँ। अँधेरे पर सुबह से पहले का उजाला हावी होता महसूस होने लगा था। वहाँ रुके रहने का मतलब थापैदल यात्रा की अपनी आकांक्षा को छोड़ देना। यह मुझे उचित नहीं लगा।
            आप अगर लड़का होतीं तो आपसे आज अपने साथ पैदल चलने का आग्रह ज़रूर करता मैं।कुछ सोचते हुए मैंने कहा।
            लड़का!...खुद के लड़काहोने पर बड़ा घमण्ड है आपको!!मेरी बात पर इस बार वह पूरी तरह बिफर गयी, “तिब्बत की बेटी हूँ...आपसे ज्यादा तेज़ और ज्यादा दूर तक पैदल चल सकती हूँ मैं।...हम लोगों के बारे में आइन्दा इतना कम न सोचना।
            बाप रे! बड़ी खतरनाक लड़की है!! उसके तेवर देखकर मैंने सोचाµसीधा-सादा मज़ाक तक बर्दाश्त नहीं है इसे!!!
            ओ.के.!विषय को तुरन्त बदलते हुए मैंने उससे विदा ले लेना ही बेहतर समझा। बोला, “आपकी दुकान पर मिलता हूँ...गुड-डे।
            ज़रूर!वह सामान्य स्वर में बोली, “बशर्ते कि आप नौ बजे तक वहाँ पहुँच जायें।
            अरे हाँ!बैगेज़ उठाकर मैं चलते-चलते पलटा, “आपका नाम तो पूछा ही नहीं मैंने?”
            बहुत पवित्र नाम है।वह मुस्कराकर बोली, “नहाकर पूछना।
            इसके साथ ही वह आगे को दौड़ गयी।
            मैंने सहस्रधारा की ओर रुख किया। ऊँची सड़कों पर चलने का यह पहला ही अवसर था मेरा। सूरज निकलने से पहले तक तो फिर भी कुछ राहत रही; उसके बाद धूप चुभने लगी। सैर-सपाटे के लिए घरों से निकले लोग भी अब शहर की ओर लौटते नज़र आने लगे थे। मैं चलता रहा और उस सीमा से आगे निकल गया जहाँ पहुँचकर शहर के लोग सैर का आनन्द लेकर घर लौटने का मन बना लेते होंगे। सड़क पर लोग नज़र आने खत्म हो गये। पेड़ों पर चिडि़यों के स्वर तेज़ होने लगे थे। पक्षी अपने बसेरों को छोड़कर, दिनभर के भोजन और राहत के स्थानों की ओर उड़ चले थे। पेड़ों और पहाड़ों की चोटियाँ कहीं-कहीं गुलाबी नज़र आने लगी थीं। पहाड़ी रास्ते पर चलने के लिए शरीर को इतना श्रम करना पड़ रहा था कि उस सर्द सुबह को भी मेरे माथे पर पसीना छलछला आया था। लेकिन मैं चलता रहा। मुझे लगा कि मेरी बनियान भी पसीने से भीगने लगी है और यही हाल रहा तो कुछ ही देर बाद अपनी जर्किन और स्वेटर मुझे कंधे पर लाद लेने होंगे।
            इस बीच दो बसें भी मुझे क्रॉस करके आगे जा चुकी थीं। मेरी अगर यही रफ्तार रही तो नौ क्या, दस बजे तक भी सहस्रधारा नहीं पहुँच पाऊँगा—मैंने व्यग्रतापूर्वक सोचा और जहाँ तक पहुँच गया था, सड़क के किनारे वहीं पर अपना बैगेज़ टिका दिया। कुछ देर इन्तज़ार के बाद पीछे-से आयी तीसरी बस को रुकवाकर मैं उसमें बैठ गया।
            सुनो, आखिरी स्टॉप से आधा किलोमीटर पहले ही उतार देना।मैंने कण्डक्टर से विनती की और उसने सहस्रधारा से करीब एक किलोमीटर पहले मुझे उतार दिया। वहाँ से खरामा-खरामा चलकर साढ़े सात-पौने आठ बजे के करीब मैं धारा तक जा पहुँचा। जैसा कि जाहिर था, मेरे कदम सबसे पहले वहाँ बनी दुकानों की ओर ही मुड़े और मेरी उत्सुक आँखों ने आसानी से उसकी दुकान को टोह लिया।
            कितनी दूर पैदल चलकर बस में बैठे?” मुझे देखते ही उसने पूछा।
            बस में!...सिर से एड़ी तक बहता यह पसीना नहीं दीख रहा आपको?”
            होता है...पहाड़ी रास्तों पर ऐसा ही होता है।मेरी बनावट को नज़रअन्दाज़ कर वह बोली, “कोई बात नहीं...जब तक न चढ़ो तभी तक रहती है पहाड़ पर चढ़ने की ललक।
            कमाल हो।
            सो तो हूँ।वह बोली, “ऐसा करो उधर जाकर पहले नहा लो। बाहर और भीतर, दोनों तरफ का मैल धो डालेगी, बड़ी पवित्र धारा है।
            बाहर-भीतर के मैल से मतलब?”
            पसीना और थकान, और क्या?” वह बोली।
            अब तो बता दो अपना नाम।मैं विनयपूर्वक बोला।
            कहा न, अपना बैगेज़ पीठ से उतारकर नीचे रखो। आराम से बैठकर एड़ी तक बहता यह पसीना सुखाओ।अपने पूर्व-अन्दाज़ में वह बोली, “उसके बाद...धारा के बीच पड़े बड़े-बड़े पत्थर देख रहे हो न, उनमें से एक पर मेरा नाम लिखा है।...नाम ढूँढ़ने के बहाने नहाना भी हो जायेगा, क्यों?”
            कमाल थी वह लड़की। या तो उसके पास गुस्सा था या उपहास। मैं बार-बार उसकी उपहासभरी बातों से अन्दर तक छिल जाता, फिर भी सौम्यता और सरलता के आकर्षण में बँधा कुछ कह नहीं पाता।
            अच्छा छोड़ो।सहज होकर मैं पुनः बोला,  कितने भाई-बहन हैं आप?”
            हम!...मैं तो अकेली ही अपनी भाई भी हूँ बहन भी।इस बार वह धीरे-से बोली।
            सॉरी।
            कोई बात नहीं, आप?”
            हम तो बहुत हैं, सात! मैं सबसे छोटा हूँ।
            बहनें कितनी हैं?” उसने तपाक-से पूछा।
            सिर्फ एक।
            आप-जैसी ही होगी...आय मीन, नॉटी एण्ड ब्यूटीफुल।
            मुझसे कहीं ज्यादा...और बहादुर भी।
            अच्छा! उसने प्रफुल्लित स्वर में पूछा,  नाम भी बड़ा प्यारा होगा न। क्या है भला?”
            वही तो पूछ रहा हूँ सुबह से।उसकी नाक पकड़कर दायें-बायें हिलाते हुए अपेक्षाकृत अधिकारपूर्ण स्वर में मैं बोला, “बताती है कि नहीं?”
            सोनम...सोनम नामग्याल!एक झटके के साथ अपनी नाक छुड़ाकर मेरे हाथ को बारी-बारी कई बार अपनी आँखों पर लगाया उसने। मैं हर बार उनसे बहते स्नेह का गर्म-स्पर्श अपनी त्वचा, अपने दिल, अपने दिमाग़ पर महसूस करता रहा।
            अब तक बह रही है स्पर्श की वह पवित्र धारा, ऐसा लगता है।
 



सोमवार, मई 26, 2014

देवों की घाटी / बलराम अग्रवाल



दोस्तो,  'कथायात्रा' में 29 जनवरी,2013 से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' के कुछ अंशों को प्रस्तुत करना शुरू किया था। आज 26 मई, 2014 की शाम को भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में श्री नरेंद्र मोदी ने संविधान सम्मत शपथ ली है। उम्मीद है कि वे देश की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे। उनको बधाई देने साथ ही प्रस्तुत है 'देवों की घाटी' उपन्यास की बाईसवीं कड़ी
गतांक से आगे
                                                                                                                            (बाईसवीं कड़ी)
‘‘काफी समय पहले इस जगह का नाम चट्टीघाट था।’’ दादाजी ने बताना शुरू किया,‘‘और यहाँ से कुछ दूर उधर, अलकनन्दा के पुल को पार करने के बाद एक गाँव आता हैभ्यूँडार।’’
‘‘भ्यूँडार!’’
‘‘हाँ।’’ दादाजी इस बार जरा तनकर बैठ गए। उनकी आँखों में पुरानी यादों की चमकसी नजर आने लगी।
पुलना-भ्यूंडार गाँव जून 2013 में प्राकृतिक आपदा के बाद का रूप चन्द्रशेखर चौहान के फोटोशॉप अलबम से साभार

  ‘‘यह मेरे एक जिगरी दोस्त का गाँव है।’’ वे आगे बोले,‘‘भगतसिंह चौहान का गाँव। उसका बेटा चन्द्रशेखर उन दिनों मणिका जितनी उम्र का था। वह भी बहुत अच्छा लड़का था। एकदम अपने मातापिता की तरह सीधासच्चा और जहीन।’’ इतना कहकर वे भावावेश के कारण चुप हो गए।
‘‘आगे बताइए न!’’ उन्हें चुप देखकर निक्की बोला।
फूलों की घाटी से जुड़ा वन : जून 2013 में प्राकृतिक आपदा के बाद का ध्वस्त  रूप चन्द्रशेखर चौहान के फोटोशॉप अलबम से साभार
‘‘भ्यूँडार से कुछ आगे घंघरिया नाम का एक गाँव है।’’ भावावेश पर काबू पाकर दादाजी बताने लगे,‘‘घंघरिया के बायें किनारे पर पुष्पतोया नाम की नदी बहती है । इस नदी के किनारेकिनारे करीब पाँच किलोमीटर तक का क्षेत्र अनगिनत तरह के फूलों से भरा पड़ा है। सन् 1931 में स्माइल नाम के एक अंग्रेज घुमक्कड़ ने फूलों से भरे इस क्षेत्र की भव्यता से चकाचैंध होकर इसे फ्लावर वैली ऑफ गढ़वालयानी गढ़वाल की फूलों की घाटीनाम दिया था। तब से यह इसी नाम से जानी जाती है और दुनियाभर से लोग इसे देखकर आनन्दित होने आते हैं।’’
‘‘फूलों की घाटी समुद्रतल से कितनी ऊँचाई पर होगी दादाजी?’’ मणिका ने पूछा।
‘‘होगी करीब दस हजार फुट की ऊँचाई पर।’’
‘‘इससे ऊपर भी कोई जगह है?’’
‘‘हाँ है…’’ दादाजी बोले,‘‘और वह भी संसारभर में प्रसिद्ध हैहेमकुण्ट साहिबसिख भाइयों का महत्वपूर्ण तीर्थ । यह करीब तेरह हजार फुट की ऊँचाई पर बना है। पहले इस जगह का नाम हेमकुण्ट लोकपाल था। लोकपाल यानी भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण जी ने यहाँ तपस्या की थी। सिखों के गुरु गोविंद सिंह जी स्वयं द्वारा लिखित विचित्र नाटकमें एक स्थान पर कहते हैं कि सप्तश्रृंग नामक पर्वत श्रेणियों के बीच हेमकुण्ट नाम की पर्वत चोटी पर किसी समय में उन्होंने तप किया था। बाद में इसी आधार पर सिखों ने गुरुदेव की याद में यहाँ पर गुरुद्वारा बना दिया। तभी से इस चट्टीघाटका नाम भी गोविंदघाटपड़ गया।’’
बदरीनाथ या हेमकुण्ट साहिब की यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्री गोविंदघाट के श्रीराम मन्दिर में मत्था टेकने के बहाने कुछ देर आराम कर लेते हैं। वे आराम करते हैं तो उनकी गाड़ियों के इंजनों को भी कुछ देर आराम मिल जाता है। लम्बी दूरी तय करने वाले ड्राइवर गाड़ी के  इंजन की सेहत का उतना ही ध्यान रखते हैं जितना कि अपनी खुद की सेहत का। सुरक्षित यात्रा के लिए यह परम आवश्यक है कि गाड़ी और उसके इंजन की सेहत का पूरा ध्यान रखा जाय।
आराम करने के बाद जब सभी टैक्सी में आ बैठे तो अल्ताफ ने उसे स्टार्ट कर दिया। सभी लोग गोविंदघाट की सुन्दरता का आस्वाद मन ही मन ले रहे थे, इसीलिए चुप थे। अल्ताफ तो रहता ही अक्सर चुप था सो वह टैक्सी चलाता रहा। कुछ ही देर में टैक्सी को उसने पाण्डुकेश्वर के निकट पहुँचा दिया।
‘‘सुनो,’’ दादाजी अचानक बोले,‘‘मैंने उत्तराखण्ड के प्रयाग तुमको गिनाए थे न।’’
‘‘जी।’’
‘‘उनमें पाँच उत्तराखण्ड के प्रमुख प्रयाग कहलाते हैं। उसी तरह केदारनाथ और बदरीनाथ की भी पाँचपाँच शाखाएँ हैं जिन्हें पंचकेदार और पंचबदरी के नाम से जाना जाता है। आगे पंचबदरी में से एकपाण्डुकेश्वर आने वाला है।’’
‘‘आप उन सभी के नाम बताइए न!’’ मणिका बोली।
‘‘ठीक है। सुनो, पहले मैं तुमको पंचकेदार के नाम गिनाता हूँपहला केदारनाथ तो प्रमुख है ही। दूसरा मध्यमहेश्वरय यह केदारनाथ जाने वाले रास्ते में कालीमठ नाम की जगह के पास पड़ता है। तीसरा तुंगनाथय यह गोपेश्वरऊखीमठ मार्ग पर चैपता के पास पड़ता है। चौथा रुद्रनाथय यह भी उसी मार्ग पर गोपेश्वर से करीब बारह किलोमीटर दूर मण्डलचट्टी गाँव से पैदल मार्ग पर करीब 20–25 किलोमीटर की दूरी पर बड़े मनोहर स्थान पर स्थित है और पाँचवाँ कल्पेश्वर। पैदल यात्रा कर सकने वाले साहसी लोग रुद्रनाथ से ही उरगम घाटी में स्थित कल्पेश्वर केदारनाथ के दर्शन के लिए जाते हैं।’’
‘‘अब पंचबदरियों के नाम गिनवाइए बाबूजी।’’ इस बार ममता बोली।  
‘‘सुनोबदरीनाथ, आदि बदरी, भविष्य बदरी, योगध्यान बदरी और वृद्ध बदरीये पाँचों पंचबदरी कहलाते हैं। धार्मिक लोग, विशेष रूप से संन्यासी, इन पाँचों ही बदरी स्थानों के दर्शन कर अपने ज्ञान अनुभव और तप को सार्थक करते हैं।’’
टैक्सी के पाण्डुकेश्वर की सीमा में प्रवेश करते ही दादाजी ने पुन: उसी के बारे में बताना शुरू कर दिया,‘‘हस्तिनापुर के राजा पाण्डु एक शाप के कारण अपना सारा राज्य अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र को सौंपकर वन को चले गए थे और अपने अन्तिम दिन उन्होंने वन में ही गुजारे थे। अपनी दोनों पत्नियोंकुन्ती और माद्री के साथ। कहते हैं कि वह इसी क्षेत्र में आकर रहे थे जिससे इस समय हमारी टैक्सी गुजर रही है।’’
‘‘हमारी टैक्सी इस समय किस क्षेत्र से गुजर रहे हैं बाबूजी?’’ ममता ने पूछा; और इससे पहले कि दादाजी उसके सवाल का जवाब दें, सुधाकर बोल उठे,‘‘पाण्डुकेश्वर से।’’
‘‘अरे वाह! आपको कैसे पता चला डैडी?’’ निक्की ने आश्चर्यपूर्वक पूछा।
‘‘भाई बचपन में अम्मा और बाबूजी के साथ आखिर मैं भी रहा हूँ इस इलाके में। सबकुछ थोड़े ही भूल गया हूँ।’’ सुधाकर ने बड़बोले अन्दाज़ में कहा।
‘‘आ…ऽ…हाहाहा, बाहर लगे लैण्डमार्क को पढ़कर इस जगह का नाम बता दिया तो जानकारबन बैठे!’’ तुरन्त ही उनकी बात को काटते हुए ममता बोली,‘‘आप खिड़की के सहारे वाली सीट छोड़कर जरा उधर बैठिए, पीछे वाली सीट पर। तब देखती हूँ कि इस इलाके के बारे में कितनी अच्छी जानकारी अभी भी बाकी है जनाब के भेजे में।’’
‘‘लो यार,’’ सुधाकर बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोले,‘‘न घर में कुछ बोलने देती है न बाहर। कैसी लड़की से आपने मेरी शादी करा दी है बाबूजी? हर समय पति की इज्जत का फलूदा बनाने पर तुली रहती है!’’
बाबूजी ही नहीं, अल्ताफ भी उनके इस अभिनय पर मुस्करा दिया।
‘‘मुझे नहीं बैठना इसके पास।’’ अपनी सीट से उठकर खड़े होने की कोशिश करते वे बोले,‘‘इधर आप आ बैठिए।’’
‘‘दादाजी कैसे उधर बैठ सकते हैं डैडी?’’ उनकी एक्टिंग को वास्तविकता मानकर मणिका घबराए स्वर में बोली।
‘‘वैसे ही बैठ सकते हैं जैसे मैं बैठा हूँ। वो मुझसे ज्यादा मोटे हैं क्या?’’
‘‘बात मोटे या दुबले होने की नहीं है डैडी,’’ मणिका ने समझाते हुए कहा,‘‘आपके इधर आ जाने और दादाजी के उधर चले जाने से हमारा तो कॉम्बीनेशन ही बिगड़ जाएगा।’’
‘‘कैसा कॉम्बीनेशन ?’’ सुधाकर ने पूछा।
                                                                                                               आगामी अंक में जारी