माता जी के रहते दूसरा कोई भी बाबूजी के कमरे को नहीं झाड़ता-बुहारता था। उनकी किस चीज़ को कहाँ रखना है-वही जानती थीं। लेकिन, जब से माता जी स्वर्ग सिधारी हैं, रमा ही उनका कमरा बुहारती है।
इधर, एक बात ने रमा का ध्यान कई दिनों से अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। एक ओर को रख दी गई अम्माजी की ढुलमुल-सी पुरानी मसनद को स्टोर से निकालकर बाबूजी ने अपने पलंग पर दीवार के सहारे रख लिया है। अपने कमरे में अब वे कुर्सी पर कम, पलंग पर मसनद से पीठ टिकाकर ज्यादा बैठे नजर आने लगे हैं।
“पीठ में दर्द हो तो आपके लिए ‘मूव’ मँगा दूँ बाबूजी?” रमा ने मौका पाकर एक शाम उनसे पूछा।
“अरे नहीं,” वे बोले,“दर्द-उर्द कुछ नहीं है...इसे तो मैं ऐसे ही उठा लाया हूँ स्टोर से।”
“इनसे कहकर नया मसनद मँगवा दूँ बाजार से? ज्यादा आरामदायक रहेगा।” उसने पुनः पूछा।
“अरे नहीं बहू,” वे इस बार सीधा बैठते हुए बोले,“कहा न, भला-चंगा हूँ।”
उसके बाद रमा ने उनसे कुछ नहीं कहा। अलबत्ता पति को फोन करके ‘मूव’ की एक छोटी ट्यूब लेते आने को जरूर कह दिया। वह ले आया।
“किसके लिए चाहिए थी?” ट्यूब को पत्नी के हाथ में पकड़ाते हुए रवि ने पूछा।
“बाबूजी की कमर में दर्द है शायद।” वह बोली,“उनकी मेज पर रख आती हूँ। जरूरत समझेंगे तो लगाते रहेंगे।” इतना कहकर वह बाबू जी के कमरे की ओर बढ़ गई।
कमरे में कदम रखते ही, बाहर से पड़ते हल्के प्रकाश में उसने देखा-सिरहाने से पीठ लगाए बाबू जी पलंग पर बैठे हैं। मसनद उनकी गोद में रखी है। उनकी आँखें मुँदी हैं और आँसुओं की अविरल धारा उनसे बह रही है।
भालुका तीर्थ मन्दिर, सोमनाथ(गुजरात) चित्र:बलराम अग्रवाल
आलीशान बंगला। गाड़ी। नौकर-चाकर। ऐशो-आराम। एअरकंडीशंड कमरा। ऊँची, अलमारीनुमा तिजौरी। करीने से सजा रखी करेंसी नोटों की गड्डियाँ। माँ लक्ष्मी की हीरे-जटित स्वर्ण-प्रतिमा।
दायें हाथ में सुगन्धित धूप। बायें में घंटिका। चेहरे पर अभिमान। नेत्रों में कुटिलता। होंठ शान्त लेकिन मन में भयमिश्रित बुदबुदाहट।
“नौकरों-चाकरों के आगे महनत को ही सब-कुछ कह-बताकर अपनी शेखी आप बघारने की मेरी बदतमीजी का बुरा न मानना माँ, जुबान पर मत जाना। दिल से तो मैं आपकी कृपा को ही आदमी की उन्नति का आधार मानता हूँ, महनत को नहीं। आपकी कृपा न होती तो मुझ-जैसे कंगले और कामचोर आदमी को ये ऐशो-आराम कहाँ नसीब था माँ। आपकी जय हो…आपकी जय हो।”
पेड़ की एक बड़ी-सी अनुकृति मंच के बीचों-बीच खड़ी है। उसके पीछे उसके हरे पत्ते की, कोमल पत्ती की, पतली टहनी की, फूलों के गुच्छे की, फल की तथा छाल की अनुकृतियों को इस प्रकार खड़ा किया गया है कि सामने से दर्शकों को मात्र पेड़ ही नजर आता है। यह पेड़ निर्देशक अपनी सुविधा के अनुसार पीपल, आम, बरगद किसी का भी ले सकते हैं तथा उसके अंग बने अन्य पात्रों को मंच के दायें, बायें, पिछले या सामने वाले हिस्से से भी बारी-बारी मंच पर ला सकते हैं।
दादाजी गाते हुए मंच पर प्रवेश करते हैं।
दादाजी—पेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
उनके पीछे-पीछे ही बगल में एक चटाई दबाए नंदू भी यह पंक्ति दोहराता, मटकता हुआ प्रवेश करता है।
नंदू—पेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
दादाजी—(पीछे घूमकर उसकी ओर देखते हुए) अरे बदमाश तू भी आ गया?
नंदू—मम्मी ने आपके लेटने-बैठने के लिए चटाई देकर भेजा है।
दादाजी—बहुत अच्छा किया। आ, फिर मेरे साथ-साथ गा—पेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
नंदू—पेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
दादाजी—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
नंदू—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
दादाजी—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
नंदू—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
गाते-गाते ही वे दोनों पेड़ के नीचे एक चटाई बिछाकर उस पर बैठ जाते हैं।
दादाजी—नंदू, हमारे पूर्वज बहुत विद्वान थे बेटे।
नंदू—कितने विद्वान थे?
दादाजी—इतने…ऽ…कि दुनियाभर के पेड़-पौधे, सारी वनस्पतियाँ, उनके फूल, फल, बड़े-बड़े पहाड़, बहती हुई नदियाँ, उड़ती हुई चिड़ियाँ, यह घास (जमीन से उठाकर घास का एक तिनका नंदू को दिखाते हैं), यह मिट्टी (जमीन से उठाकर मुट्ठीभर मिट्टी नंदू को दिखाते हैं)—सारी चीजों से वे बातें करते थे और सारी चीजें उनसे बातें करती थीं।
नंदू—(व्यंग्यात्मक स्वर में) गिनाने से कोई नाम छूट तो नहीं गया दादाजी?
दादाजी—मजाक समझ रहा है?
नंदू—और नहीं तो क्या? बेजान और बेजुबान चीजों से कोई कैसे बातें कर सकता है?
दादाजी—क्यों नहीं कर सकता?
नंदू—अगर कर सकता होता तो ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ यह मुहावरा क्यों बनता।
दादाजी—इस मुहावरे का मतलब अलग है नंदू और मेरी बात का मतलब अलग।
नंदू—यह कैसे हो सकता है दादाजी कि ‘नॉन लिविंग’ यानी निर्जीव वस्तुएँ ‘लिविंग’ यानी जीवित वस्तु, आदमी से बातें करें?
दादाजी—तू तो विज्ञान का विद्यार्थी है न? उसमें तो वैज्ञानिकों ने जीवित और निर्जीव वस्तुओं के कुछ गुण बताए हुए हैं।
नंदू—सो तो है।
दादाजी—उनके आधार पर विज्ञान भी पेड़-पौधों को जीवित ही मानता है।
नंदू—मानता तो है, पर…
दादाजी—पर क्या?
नंदू—(कुछ सोचते हुए) देखो दादाजी, हमारे सिरहाने…ये खड़े हैं पेड़ बाबा, और आप है हमारे पूर्वज। ठीक है?
दादाजी—ठीक है।
नंदू—तो अब आप मेरे सामने पेड़ बाबा से बातें करके दिखाइए।
दादाजी—देखो बेटा, बातें करने के मतलब को समझो।
नंदू—समझाइए।
दादाजी—हमारे पूर्वजों ने अनेक प्रयोग करके बहुत-सी चीजों के गुणों की खोज की।
नंदू—सो तो आज के वैज्ञानिक भी करते हैं।
दादाजी—हाँ, लेकिन आज का वैज्ञानिक कहता है कि मैंने ‘इस’ वस्तु के या ‘इस’ प्राणी के इस गुण की खोज की।
नंदू—और पूर्वज क्या कहते थे?
दादाजी—वे कहते थे कि इस ‘पौधे’ ने या इस ‘पेड़’ ने या इस ‘बेजुबान प्राणी’ ने मुझसे बातें कीं और अपने बारे में मुझे ये-ये बातें बताईं।
नंदू—बात तो वही हुई न।
दादाजी—नहीं। बात वही नहीं हुई। आज का वैज्ञानिक अगर मनुष्य पर भी शोध करता है, तो उसे वह ‘निर्जीव वस्तु’ मानकर चलता है।
नंदू—और पूर्वज क्या मानकर चलते थे?
दादाजी—सजीव। सही बात तो यह है नंदू कि भारतीय दर्शन इस पूरी सृष्टि में एक कण को भी ‘निर्जीव’ मानता ही नहीं है।
नंदू—जी।
दादाजी—इसीलिए मनुष्य की या पशुओं-पक्षियों जैसे चलने-फिरने-बोलने वाले जीवों की तो बात ही छोड़ो, वे अगर नदियों पर, पेड़-पौधों पर, पत्थरों पर, अलग-अलग जगह की मिट्टी जैसी निश्चल वस्तुओं पर भी शोध करते थे तो उन्हें ‘निर्जीव वस्तु’ नहीं ‘सजीव और प्राणवान’ मानकर चलते थे।
नंदू—हूँ…ऽ…इसीलिए कहते थे कि इसने मुझसे और मैंने इससे बातें कीं।
दादाजी—बिल्कुल ठीक। …और, अब देखो, यह पेड़ तुमसे और तुम इस पेड़ से बातें करोगे।
यों कहते हुए दादाजी पेड़ की अनुकृति के पीछे जाकर खड़े हो जाते हैं।
पेड़ बाबा—हलो नंदू। मैं हूँ हरा-भरा सुगंधित हवा और ठंडी छाया देता हुआ पेड़।
नंदू अपने दोनों हाथ हवा में फैलाकर ऐसे साँस लेता है जैसे उसे वाकई बहुत सुगंधित और शीतल वायु मिल गई हो।
नंदू—प्रणाम करता हूँ पेड़ बाबा।
पेड़ बाबा—सदा स्वस्थ रहो बेटा।
नंदू—पेड़ बाबा, आप अपने बारे में कुछ बताइए न।
पेड़ बाबा—क्या बताऊँ? ज्यादातर तो लोग हमें काठ और ईंधन देने वाला ही समझते हैं।
नंदू—बिल्कुल गलत। मेरे दादाजी कहते हैं कि पेड़ बड़े दयावान होते हैं।
पेड़ बाबा—देखो बेटा, धरती पर जितने भी पेड़ हैं, उन सबके छ: अंग अवश्य होते हैं और वे सब के सब उपयोगी होते हैं।
नंदू—(आश्चर्य से) पेड़ों के अंग भी होते हैं?
पेड़ बाबा—हाँ नंदू। सबसे पहले—जड़।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर जड़ की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—फिर छाल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर छाल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—शाखा यानी टहनी।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर टहनी की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—पत्ते।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर हरी व कोमल पत्तियों की अनुकृतियाँ मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—फूल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर फूल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—और फल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर फल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—सभी पेड़ों के ये छ: अंग अवश्य होते हैं। लेकिन किसी-किसी के कम या ज्यादा भी होते हैं।
नंदू—जैसे?
पेड़ बाबा—जैसे किसी-किसी पेड़ को दाढ़ी भी होती है।
नंदू—पेड़ों को दाढ़ी-मूछें भी आती हैं?
पेड़ बाबा—दाढ़ी-मूँछें नहीं, सिर्फ दाढ़ी। तुमने बरगद के पेड़ तो देखे ही हैं न। उनके तनों और शाखाओं से लम्बे-लम्बे रेशे जमीन की ओर लटक रहे होते हैं।
नंदू—हाँ।
पेड़ बाबा—उन्हें ही बरगद की दाढ़ी कहा जाता है। किसी-किसी पीपल की तथा कुछ दूसरे पेड़ों की भी दाढ़ी आती है।
नंदू—और फूल?
पेड़ बाबा—प्रकृति का नियम है नंदू कि पेड़-पौधों पर पहले फूल आएगा, फिर फल। लेकिन, पीपल और बरगद के पेड़ की यह विशेषता है नंदू कि इनकी डालियों पर फूल नहीं आते, सीधे फल ही आते हैं।
नंदू—यह तो कमाल की बात है!
पेड़ बाबा—मेरी एक बात और गाँठ में बाँध लो।
नंदू—कौन-सी बात को?
पेड़ बाबा—देखो बेटा, कोई कितना भी बुजुर्ग क्यों न हो, उसकी बताई बातों को जब तक उस विषय के किसी विशेषज्ञ से निश्चित न कर लो, तब तक उन पर अमल मत करो। मेरी बातों पर भी।
नंदू—क्यों?
पेड़ बाबा—तुमने ‘नीम हकीम खतरा-ए-जान’ वाली कहावत तो सुनी ही होगी?
नंदू—(हँसता है) ही-ही-ही…
पेड़ बाबा—हँस क्यों रहे हो?
नंदू—हमारी कक्षा में वो चंदू है न, उसने टीचरजी को इसका अर्थ बताया कि—ए हकीम, इस नीम से तेरी जान को खतरा है। उसका उलटा जवाब सुनकर टीचरजी ने उसे कक्षा के बाहर खड़ा कर दिया था।
पेड़ बाबा—इस मुहावरे का सही अर्थ यह है बेटा कि आधी-अधूरी जानकारी रखने वाला हकीम मरीज की जान के लिए खतरा होता है। उसकी सलाह और दवाइयाँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और जानलेवा हो सकती हैं।
नंदू—मैं समझ गया।
इसी के साथ दादाजी पेड़ के पी्छे से निकलकर नंदू के निकट आ जाते हैं और कहते हैं—
दादाजी—पेड़ दयावान ही नहीं, परोपकारी भी होते हैं नंदू। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि—पेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
नंदू—पेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
दादाजी—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
नंदू—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
दादाजी—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
नंदू—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
अंतिम पंक्तियों के साथ ही प्रकाश मद्धिम होता जाता है।
दोस्तो, लम्बे समय बाद 'कथायात्रा' पर आना हो पाया है। अपनी व्यस्तताओं का विलाप 'अपना दौर' में कर चुका हूँ। इस बार 'कथायात्रा' में लघुकथा की बजाय बाल-एकांकी 'सेर को सवा सेर' लगा रहा हूँ। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।--बलराम अग्रवाल
बाल-एकांकी
चित्र : बलराम अग्रवाल
पात्र—
चायवाला
चौबे जी
अजनबी
चाय की दुकान, जिस पर ‘पंडित जी चाय वाले’ का बैनर लटका हुआ है। चायवाला चाय बना रहा है। चौबेजीएक बैंच पर बैठा चाय बनकर आने का इंतजार कर रहा है।
चौबे जी—भाई, तू चाय बना रहा है या बीरबल की खिचड़ी? एक घंटा हो गया उबालते-उबालते।
चायवाला—जल्दी वाली चाय अगले चौराहे पर मिलेगी चौबे जी।
चौबे जी—इतनी देर वाली भी तो नहीं मिलनी चाहिए।
चायवाला—भाईसाहब, मैं केवल चाय-पत्ती नहीं उबालता पानी में। तुलसी के पत्ते, कुटी हुई अदरक और हरी इलायची भी डालता हूँ। ये सब जब तक अच्छी तरह ना उबल जायें, इनका असर कैसे आयेगा चाय में।
चौबे जी—अब बात ना बना, जल्दी दे।
चायवाला छलनी एक कप के ऊपर रखकर चाय छानता है और चौबे जी के हाथ में थमा देता है।
चौबे जी—अच्छा एक बात बता—तूने दुकान पर‘पंडित जी चाय वाले’ क्यों लिखवाया है?
चायवाला—वो इसलिए कि अनपढ़ों का इलाका है। इसे पढ़कर कम पढ़ा-लिखा आदमी भी आसानी से यह समझ सकता है कि यह दुकान चाय की है।
चौबे जी—नहीं, मेरा इशारा ‘पंडित जी’ लिखवाने की तरफ है, ‘चाय वाले’ लिखवाने की तरफ नहीं।
चायवाला—भैया चौबे जी, असल बात तो ये है कि खोखा जिससे खरीदा था यह उसी ने लिखवाया हुआ था। हमने उतारने या बदलने की जरूरत नहीं समझी।
चौबे जी—वही तो मैं सोचूँ था कि तू ठाकुर आदमी पंडित कब से हो गया?
चायवाला—भई, बिजनेस जिससे ठीक चले वो सब काम ठीक है। ‘पंडित जी’लिखा देखकर ऊँची जाति वाले भी बिना संकोच के यहाँ आ जाते हैं।
चौबे जी—और नीची जात वाले?
चायवाला—देखो भैया, धन्धा करने बैठे हैं तो वापस तो किसी को जाने नहीं देना है।
चौबे जी—यह भी ठीक है।
चित्र:आदित्य अग्रवाल
इतने में गन्दे-से कपड़े पहने टहलता हुआ-सा एक अजनबी दुकान पर आता है और नि:संकोच चौबे जी वाली बैंच पर उसके निकट आ बैठता है। चौबे जी उसकी तरफ देखकर नाक सिकोड़ता है और बैंच पर उससे अलग खिसक जाता है।
चायवाला—क्या चाहिए?
अजनबी—एक किलो चावल दे दो।
चायवाला—दुकान के ऊपर ये बैनर दीख रहा है?
अजनबी—दीख तो रहा है। पर उसमें चावल नहीं लटक रहे।
चायवाला—एक बार फिर ध्यान से देख।
अजनबी—जो आदमी ध्यान से बैनर नहीं देखेगा, उसे चावल नहीं दोगे क्या?
चायवाला—उस पर पढ़ भी ले, क्या लिखा है।
अजनबी—पढ़ा-लिखा होता तो तेरी ही दुकान मिली थी आकर बैठने को?
चायावाला—नहीं, तू तो नई दिल्ली के अशोका होटल में जाता चाय पीने। शकल देखी है आइने में?
अजनबी—बकवास बंद कर और काम की बात कर।
चायवाला—अबे, चाय की दुकान पर चावल कैसे मिलेंगे?
अजनबी—नहीं मिलेंगे तो पूछ क्यों रहा है—क्या चाहिए? यह पूछ कि कैसी चाय चाहिए।
चायवाला—मेरा मतलब था कि…
अजनबी—मतलब छोड़ और चाय दे। कितने की है?
चायवाला—पाँच रुपये की। एक काम कर, वो सामने जो प्याला रखा है, उसे धो ला।
अजनबी—ग्राहक धोकर लाएगा प्याला?
चायवाला—चाय पीनी है तो लाना पड़ेगा धोकर।
अजनबी—अगर ना लाऊँ तो?
चायवाला—तो? तो…
यह कहता हुआ चायवाला एक कुल्हड़ में चाय छानकर अपनी मेज पर ही अजनबी की ओर रख देता है।
चायवाला—ये ले, चाय उठा अपनी।
अजनबी—इन भाईसाहब को तो प्याले में चाय दे रखी है, मुझे कुल्हड़ में क्यों?
चायवाला—अनजान लोग अगर अपने लिए प्याला धोने में ना-नुकर करते हैं तो उनको हम कुल्हड़ में ही चाय देते हैं।
अजनबी—क्यों?
चायवाला—देख भाई, हम ठहरे ऊँच जात। पढ़-लिख नहीं सके सो चाय बनाने-बेचने का कारोबार करते हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम ऐरे-गैरे हर आदमी के झूठे प्लेट-प्याले धोते फिरें।
अजनबी—अगर सभी के लिए कुल्हड़ रख लो तो किसी का भी झूठा नहीं धोना पड़ेगा।
चायवाला—(रोषपूर्वक हाथ जोड़कर) तू अपनी सलाह अपने पास रख। चाय पी, पैसे दे और अपना रास्ता नाप।
अजनबी—रख लेते हैं जी अपनी सलाह अपने पास।
यों कहकर वह फटाफट चाय पीकर खत्म करता है और क्रोधपूर्वक कुल्हड़ को जमीन में देकर मारता है। चायवाला और चौबे जी, दोनों अचरज से उसके इस व्यवहार को देखते हैं। अजनबी अपने मुँह के अन्दर से पाँच रुपए का एक सिक्का निकालकर चायवाले की ओर बढ़ाता है।
अजनबी—ये लो, चाय के पाँच रुपए।
चायवाला—यह क्या तरीका है पैसे रखने का?
अजनबी—मेरे पैसे हैं। मैं इन्हें जैसे चाहूँ, जहाँ चाहूँ रखूँ।
चायवाला—अबे मुँह में से निकालकर अपने थूक में सना सिक्का मेरी ओर बढ़ा रहा है?
अजनबी—मैं तो ऐसे ही दूँगा। नहीं लेता तो वापस रख लेता हूँ।
यों कहकर सिक्के को वापिस अपने मुँह में रख लेता है।
चायवाला—ओए ठहर ओए। चाय मुफ्त की नहीं है।(अपनी हथेली फैलाकर) ला, इधर ला पाँच रुपए का सिक्का।
अजनबी सिक्के को मुँह में से निकालकर चायवाले की हथेली पर रख देता है। चायवाला पानी से भरी बाल्टी की ओर बढ़ता है और सिक्के को पानी से धोने लगता है।
अजनबी—गैर जात के आदमी के थूक में सने सिक्के को पानी से धो सकता है, उसके झूठे प्याले को धोने में बेइज्जती होती है!
यों कहकर वह उस प्याले को भी उठाकर जमीन पर दे मारता है। यह देखकर चायवाला झटके से उठ खड़ा होता है—
चायवाला—अबे, प्याला क्यों तोड़ दिया! पागल हो गया है क्या?
अजनबी मुँह में से निकालकर पाँच रुपए का एक सिक्का और उसकी हथेली पर जबरन रख देता है—
अजनबी—पाँच रुपए का यह सिक्का इस प्याले की कीमत है। ले, इसे भी धो ले।
चायवाला और चौबे जी दोनों अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर मुँह बाये अजनबी की इस हरकत को देखते रह जाते हैं।