रविवार, फ़रवरी 08, 2009

देश का सिपाही/बलराम अग्रवाल



मुजरिम को हवालात में करीबन दो हफ्ते बंद रखने के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जा सका। स्वाधीनता-समारोह के समापन में इतना समय लग जाना कोई बड़ी बात नहीं थी।
पुलिस ने कहाँ से गिरफ्तार किया तुम्हें? मजिस्ट्रेट ने पूछा।
जी, मानसरोवर पार्क से। वह बोला।
क्यों?
जी, मालूम नहीं।
इसमें लिखा है कि राष्ट्र-ध्वज का अपमान करते हुए तुम्हें रंगे हाथों पकड़ा गया।मजिस्ट्रेट ने आरोप-पत्र की ओर इशारा करके उसे बताया ।
पार्क में बैठकर योगासन करने से राष्ट्र-ध्वज का अपमान कैसे हो गया सर! वह चौंककर बोल उठा।
उसकी सफाई पर मजिस्ट्रेट का ध्यान जाए, उससे पहले ही उसके साथ आया कांस्टेबल हरकत में आ गया ।
एन स्वाधीनता-दिवस की सुबह यह आदमी राष्ट्र-ध्वज को लातें दिखा रहा था जनाब। वह मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होकर बोला,ऐसा करते हुए खुद मैंने इसे देखा और गिरफ्तार किया, सरकार।
उसके इस बयान से मजिस्ट्रेट की त्यौरियाँ चढ़ गईं। जहर-बुझी नजरों से उसने मुजरिम की ओर देखा।
जिस समय पुलिस ने मुझे पकड़ा, मैं शीर्षासन की मुद्रा में था सर। मुजरिम ने घिघियाई आवाज में सफाई दी।
सुन लीजिए...सुन लीजिए जनाब। कांस्टेबल तपाक से बोला,यह खुद ही अपने जुर्म का इकबाल कर रहा है।
कांस्टेबल की इस मुस्तैदी पर मुजरिम की जुबान बंद हो गई। अपने बचाव में क्या दलील दे, वह समझ नहीं पा रहा था।
लेकिन...उस पार्क में तो कोई राष्ट्र-ध्वज उस समय था ही नहीं सर! ध्यान आने पर वह एकाएक बोला।
उसकी इस बात पर मजिस्ट्रेट ने कांस्टेबल की ओर सवालिया निगाह डाली। वह थोड़ा सकपकाया। वाकई, उस पार्क में उस समय क्या, इस समय तक भी कोई राष्ट्र-ध्वज नहीं होगा। लेकिन वह हताश नहीं हुआ। हिम्मत के साथ मजिस्ट्रेट की ओर दो कदम और बढ़ाकर उसने कहना शुरू किया,सवाल इस या उस पार्क का है ही नहीं जनाब। आजादी के दिन तो ज्यादातर जगहों पर राष्ट्र-ध्वज खुले आसमान में फहर रहा होता है।…और…और प्रधानमंत्री के छोड़े हुए गैस-वाले सैकड़ों तिरंगे गुब्बारे भी तो एन इसके ऊपर से ही गुजर रहे थे उस समय…। ऐसे में, इस आदमी का अपनी दोनों लातें आसमान की ओर उठाना...मुझसे...बर्दाश्त नहीं हुआ हुजूर...!
कांस्टेबल का बयान सुनकर मजिस्ट्रेट भरपूर गुस्से के बावजूद भी उस पर चीख या चिल्ला न सका। राजनीति-प्रधान वर्तमान परिस्थितियों में कौन किस राजनेता का कुत्ता निकल आएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।
उसने कलम उठाया और फैसला लिखना शुरू कर दिया। इसके अलावा कुछ और वह शायद कर ही नहीं सकता था।
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5 टिप्‍पणियां:

सुभाष नीरव ने कहा…

विषय अच्छा होने के बावजूद लघुकथा कुछ प्रायोजित -सी लगी। "लातें" शब्द की जगह "टाँगें" या फिर "पैर ऊपर उठाए" क्या अधिक संगत न होगा ?

बलराम अग्रवाल ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
बलराम अग्रवाल ने कहा…

तुम या मैं वहाँ होते तो टाँगें ही बोलते। मैं वैसा करता तो पुलिसमैन कैरेक्टर सभ्य हो जाने का खतरा था। हाँ, तुम्हारे पहले वाक्य से मेरी सहमति है।

MUFLIS ने कहा…

bahut achhi rachna hai....
'sandesh' pahunchtaa hai..
paatroN aur paristhitee ke mutabik
bhasha steek hai..........
badhaaee . . . .
---MUFLIS---

Harkirat Haqeer ने कहा…

कांस्टेबल का बयान सुनकर मजिस्ट्रेट भरपूर गुस्से के बावजूद भी उस पर चीख या चिल्ला न सका। राजनीति-प्रधान वर्तमान परिस्थितियों में कौन किस राजनेता का कुत्ता निकल आएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।

उसने कलम उठाया और फैसला लिखना शुरू कर दिया। इसके अलावा कुछ और वह शायद कर ही नहीं सकता था.....Bhot hi satik ktha...!!

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