सोमवार, नवंबर 15, 2010

कसाईघाट/बलराम अग्रवाल


बहू ने हालाँकि अभी-अभी अपने कमरे की बत्ती बन्द की है; लेकिन खटखटाहट सुनकर दरवाजा खोलने के लिए रमा को ही जाना पड़ता है। दरवाजा खुलते ही बगल में प्रमाण-पत्रों की फाइल दबाए बाहर खड़ा छोटा दबे पाँव अन्दर दाखिल होकर सीधा मेरे पास आ बैठता है। मैं उठकर बैठ जाता हूँ। उसकी माँ रजाई के अन्दर से मुँह निकालकर हमारी ओर अपना ध्यान केन्द्रित कर देखने लगती है।
क्या रहा? मेरी निगाहें उससे मौन प्रश्न करती हैं।
कुछ खास नहीं। दयाल कहता है कि इंटरव्यू से पहले पाँच हजार नगद…!
छोटे का वाक्य खत्म होते-न-होते बगल के कमरे में बहू की खाट चरमराती है,ए, सो गए क्या? पति को झकझोरते हुए वह फुसफुसाती महसूस होती है,नबाव साहब टूर से लौट आए हैं, रिपोर्ट सुन लो।
एक और चरमराहट सुनकर मुझे लगता है कि वह जाग गया है। पत्नी के कहे अनुसार सुन भी रहा है, अँधेरे में यह दर्शाने के लिए उसने अपना सिर अवश्य ही उसकी खाट के पाये पर टिका दिया होगा। इधर की बातें गौर से सुनने के लिए शान्ति बनाए रखने हेतु दोनों अपने-अपने समीप सो रहे बच्चों को लगातार थपथपाते महसूस होते हैं।
सुनो, मेरे गहनों और अपने पी एफ की ओर नजरें न दौड़ा बैठना, बताए देती हूँ। पति के सिर के समीप मुँह रखे लेटी वह फुसफुसाती लगती है।
बड़ा बेटा पिता का अघोषित-उत्तराधिकारी होता है। परिवार की आर्थिक-दुर्दशा महसूस कर बहू इस जिम्मेदारी से उसे मुक्त कराने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रही है; लेकिन सामाजिक उपेक्षा के भय ने बड़े को जबरन इसी खूँटे से बाँधे रखा है।
अभी तुम सो जाओ। मेरे मुँह से फूटता है,सवेरे सोचेंगे।
                                     चित्र:बलराम अग्रवाल
फाइल को मेज पर रख, कपड़े उतारकर छोटा अपनी माँ के साथ लगे बिस्तर में जा घुसता है। दरवाजा बन्द करके कमरे में आ खड़ी रमा भी मेरा इशारा पाते ही बत्ती बन्द कर अपनी माँ के पास जा लेटती है। घर में अजीब-सा सन्नाटा बिखर गया है। रिश्वत के लिए रकम जुटा पाने की पहली कड़ी टूट जाने के उपरान्त कसाईघाट पर घिर चुकी गाय-सा असहाय मेरा मन अन्य स्रोतों की तलाश में यहाँ-वहाँ चकराने लगता है।

9 टिप्‍पणियां:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

कथ्‍य की दृष्टि से एक अच्‍छी लघुकथा है। पर अनावश्‍यक विवरण कुछ ज्‍यादा ही लगते हैं। अगर उन्‍हें संपादित किया जाए तो लघुकथा अपने चरम पर पहुंचती है। बधाई।

उमेश महादोषी ने कहा…

सामाजिक-पारिवारिक यथार्थ को उघाड़ती सुन्दर रचना है। आदरणीय राजेश उत्साही जी के मत से मैं सहमत नहीं हूँ। शब्दों की खींचतान अभी तक लघुकथा में चली आ रही है, मुझे यह निराशजनक लगता है। लघुकथा को कथा बनाये रखने के लिए शब्द तो चाहिए ही। शब्दों की गिनती से लघुकथा को पहचानने की सोच से अब तो उबर जाना चाहिए। वस्त्रों और अलंकरणों के बिना तो हर रचना नंगी नज़र आयेगी। जिन चीजों से दूसरी साहित्यिक रचनाओं को सजाया संवारा जाता है, उनसे लघुकथा को क्यों नहीं? लघुकथा को लघुकथा कहलाने के लिए उसे नंगा करने की जरूरत नहीं है, अपितु उसकी आत्मा को पहचानने की जरूरत है। बलराम अग्रवाल की लघुकथाओं को पसंद किये जाने और अलग से पहचाने जाने का कारण लघुकथा की आत्मा के साथ उसका वस्त्रों और अलंकरणों से सजा संवरा होना भी होता है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

उमेश जी फिर हम उसे लघुकथा क्‍यों कहें। इसमें जो कथ्‍य लिया गया है और जिस तरह से उसे कहा जा रहा है वह कथा की तरह ही बढ़ता है। बेहतर तो यही होगा कि उसे कथा का ही रूप ही दिया जाए। उमेश जी आपका कथा को नंगे किए जाने का बिम्‍ब भी समझ नहीं आया।

मैंने शब्‍दों की सीमा की बात नहीं कही है। मैंने कहा है लघुकथा में अनावश्‍यक विवरण हैं। उनके न होने पर लघुकथा में और पैनापन आता है। जबकि उनके रहने पर लघुकथा प्रभावहीन होने लगती है।

Aadarsh Rathore ने कहा…

उत्साही जी से सहमत नहीं हूं.

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

कसाईघाट एक उत्कृष्ट लघुकथा है. महादोषी से मैं सहमत और उत्साही जी असहमत. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लघुकथा भी कथा का एक अंग है और भले ही हम बात शब्दों की न करें, लेकिन जब कोई कथा लिखी जाती है तब उसमे कथातत्व का होना आवश्यक है. जिस भावभूमि को यह लघुकथा अभिव्यक्त कर रही है, क्या उसे कुछ शब्दों में समेटा जा सकता है ? और रही इसे कहानी बनाने की बात ( जिसे उत्साही जी कथा कहते है)तो इसमें वे तत्व मौजूद नहीं हैं. लघुकथा किसी क्षण विशेष को व्याख्यायित करती है जबकि कहानी किसी घटना को अपनी सम्पूर्णता में पकड़ती है. कसाईघाट एक क्षण को ही पकड़ती और चित्रित करती है, इसलिए यह एक सफल लघुकथा ही है .

रूपसिंह चन्देल
०९८१०८३०९५७

सुभाष नीरव ने कहा…

एक जमाना था जब लघुकथा में इस तरह की बहसें खूब हुआ करती थीं। कुछेक सार्थक बहसें ही लघुकथा का हित कर सकीं, अन्यथा बाकियों ने तो इसके धुंघलके को गहाराया ही। मेरा मानना है कि भाई चन्देल की बात पर जरा गौर किया जाए। लघुकथा में क्षण का बहुत महत्व है। कथ्य कितना फैलाव लिए है, यह उसकी भाषा, प्रस्तुती के ट्रीटमेंट से नहीं देखा जाना चाहिए। दर-असल इस लघुकथा का क्राफ्ट कहानी जैसा है। अनेकों श्रेष्ठ लघुकथाओं का क्राफ्ट कहानी जैसा मिल जाएगा। और इसमें कोई हर्ज़ मुझे नहीं दीखता। बहरहाल 'लघुकथा' में कथातत्व होना लाज़िमी है इसलित अक्सर लेखक ऐसा क्राफ्ट इस्तेमाल करता है। लघुकथा में जिस रचनात्मक कसाव, थोड़े शब्दों की बात की जाती है, उसे इस क्राफ्ट को अपनाकर भी कायम रखा जा सकता है। बहुत से उदाहरण इस सन्दर्भ में देखे जा सकते हैं।
बहरहाल, उक्त लघुकथा बेकारी की जिस विभीषिका को झेलते युवक की व्यथाकथा बहुत कम शब्दों में कह रही है, ज़रूरी नहीं कि हम इसे और फैलाकर कहानी का रूप दे दें। बेशक इस विषय पर बेहतर कहानी लिखी जा सकती है और लिखी भी गई हैं।

उपेन्द्र ने कहा…

कथा बहुत ही शसक्त है और देश- कल / वातावरण की दृष्टी से कहीं से भी शब्दों का अनावश्यक विस्तार नहीं है. मुझे याद है एक बार हंस मे मशहूर कथाकार राजेंद्र यादव जी ने लघु कहानी और बड़ी कहानी के बीच उपजे शब्दों की संख्या के आकार पर कहा था की कहानी अपनी शब्दों के आकर पर बड़ी और छोटी नहीं बल्कि अपने भावों से छोटी बड़ी बनती है.एहा ये बात महत्वपूर्ण है की अगर लेखक कहानी को सपाट सीधे सिर्फ दो पंक्ति में कह कर आकार के दृष्टी से लघु बना सकता है मगर फिर कहानी मे नीरसता रहेगी और भाव पाठक के गले शायद ना उतार सके.

प्रदीप कांत ने कहा…

बेकारी पर सशक्त लघुकथा ...

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar ने कहा…

बुकमार्क कर लिया है...आपका यह ब्लॉग!
आराम से पढ़ूँगा आकर!