रविवार, अगस्त 11, 2019

बाहरी आतंकवाद / बलराम अग्रवाल


धड़-धड़-धड़......धड़-धड़!
दरवाजे पर बुरी तरह थापें पड़ीं तो मैं उबाल-सा खा गया। कौन इस बदतमीजी से दरवाजे को पीट रहा है!
‘‘कौन है?’’ ब्लड-प्रेशर को बढ़ने से रोकने की कोशिश करते हुए मैंने यथासंभव मीठे स्वर में पूछा।
‘‘भाईजान, दरवाजा खोलेंगे जरा?’’ बाहर खड़े आदमी ने मुझसे भी अधिक मीठेपन के साथ अनुरोध किया।
मैं चौकन्ना हो गया। दरवाजा पीटना का वहशी-अन्दाज और इतना मीठापन!
धड़-धड़-धड़-धड़......धड़-धड़!
‘‘अरे भाई, आप हैं कौन?’’ मैंने पुनः खुद पर काबू रखकर पूछा, ‘‘क्यों दरवाजा पीट रहे हैं?’’
‘‘भाईजान, आप भीतर आने देंगे, तभी न आपको कुछ बता पाऊँगा।’’ वह बोला।
ये लो। पहले दरवाजा खोलने का अनुरोध और अब भीतर आने देने का !
धड़-धड़-धड़-धड़......धड़-धड़!
‘‘अरे भाई, जाओ यहाँ से!’’ इस बार मैंने बेकाबू अंदाज में कहा, ‘‘क्यों नाहक दरवाजे को पीटे जा रहे हो? मैं अजनबियों पर मेहरबान नहीं होता।’’
‘‘तू दरवाजा खोलकर नहीं, इसे तुड़वाकर मुझे आने देगा।’’ इतना कहकर उसने दरवाजे को बेइन्तिहा थपेड़ना शुरू कर दिया—धड़-धड़, धड़-धड़, धड़-धड़...! लगता है कि हाथों की बजाय दरवाजे को उसने अब किसी ठोस चीज से ठोंकना-तोड़ना शुरू कर दिया है। तय है कि विवेक की नहीं, उसे सिर्फ ताकत की भाषा आती है। मुझे अब और अधिक बर्दाश्त नहीं करना है। उसकी बदतमीजियों ने मुकाबले को जरूरी बना दिया है। दरवाजे को ज्यादा नुकसान पहुँचाए या तोड़ डाले, इस से पहले ही मुझे उसे रगड़ डालना चाहिए, यही उचित ऐसा महसूस होता है।
(‘पीले पंखोंवाली तितलियाँ’, 2015 से)

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