शनिवार, अक्टूबर 24, 2026

रोटियों के पेड़ / बलराम अग्रवाल

 


दस वर्षीय राजू को तीन दिन से रोटी नसीब नहीं हुई थी। वह जब भी खाना माँगता, माँ कभी प्याज तो कभी मूली उसके हाथ में थमा देती।

“यह क्या बात हुई!” आज भी माँ ने गाजर आगे बढ़ाई तो वह रोटी ही लेने की जिद पर अड़ गया, “बिना रोटी के पेट भरता है क्या?”

 जिद पर अड़ा तो मजबूर माँ ने उसकी पिटाई कर दी। कहा, “रोटियाँ क्या पेड़ पर लगती हैं, कि जाऊँ और तोड़ लाऊँ?”

पिटकर राजू रोता हुआ अन्दर की कोठरी में रखे बिस्तरों के ढेर पर जा लेटा। भूख के मारे पेट में ऐंठन हो रही थी। रोते-रोते उसे नींद आ गई और वह सपनों की दुनिया में चला गया।

उसने देखा कि वह एक ऐसे जंगल में पहुँच गया है जो पूरा का पूरा गूँथे हुए आटे का ही बना था। वहाँ आटे के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ थे। यहाँ से वहाँ तक आटे के ही पेड़ थे; और उन सब पर गोल-मटोल रोटियाँ ही रोटियाँ लटकी हुई थीं। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सोचा—अब किसी भी दिन उसे या माँ को रोटी खाये बिना नहीं रहना पड़ेगा। रोटियाँ तोड़कर जेबों में भर लेने के लिए उसने हाथ ऊपर बढ़ाया; लेकिन पाया कि वे उसकी पहुँच से बाहर, बहुत ऊँची टहनियों पर लटकी थीं।

उसे याद आया कि घर में, जब भी किसी ऊँची जगह से कोई चीज उतरवानी होती है, माँ उसे अपने कंधों पर बैठाकर ऊँचा कर देती है।

‘यही ठीक रहेगा’—उसने सोचा और बुलाने के लिए जोर से पुकारने लगा, “माँ! इधर आओ, इधर! यहाँ रोटियों के पेड़ ही पेड़ हैं!”

उन पेड़ों के चारों ओर भागता हुआ, पता नहीं कितनी देर तक वह माँ को पुकारता रहा। माँ नहीं आई। थक-हारकर वह एक पेड़ के तने का सहारा लेकर बैठ गया। जल्द ही उसे नींद आ गयी। सपने में उसने देखा—पेड़ की टहनियों से टूटकर सुहाती-सुहाती-सी गरम रोटियाँ ठंड से ठिठुरती उसकी देह को चादर की तरह ढकने लगी हैं। रोटियों से बनी उस चादर को ऊपरी सिरों से पकड़कर उसने अपने कंधों तक खींच लिया और करवट बदल ली!

वह नहीं जान पाया कि फटी-पुरानी एक गरम चादर, रोते हुए सो गये अपने भूखे बेटे को ओढ़ाकर माँ आँसू पोंछती हुई बाहर निकल गयी थी।   

पिकरिंग, कनाडा 14-10-26/01:39 / प्रकाशित ‘साहित्य अमृत’ नवम्बर 2026