“लालाजी,” ऑफिस जाने के सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया हुआ मैं अपने मकान-मालिक से पूछता हूँ—“वह सामने…”
“वह जतन बाबू है, गुलामी…”
“सो तो मैं जानता हूँ।” लालाजी की तरह ही मैं भी उनका वाक्य बीच में ही लपक लेता हूँ—“मेरा मतलब था कि जतन बाबू रोजाना ही…इस तरह…गुलमोहर के सामने…?”
“वही तो बता रहा हूँ बाबूजी!” सीधी-सादी बातचीत के दौरान भी चापलूस हँसी हँसना लालाजी की आदत में शामिल है। स्वाभानुसार ही खीसें निपोरते-से वह बताते हैं—“गुलामी के दिनों में जतन बाबू ने कितने अफसरान को गोलियों-बमों से उड़ा दिया होगा, कोई बता नहीं सकता। कहते हैं कि गुलमोहर के इस पौधे को जतन बाबू के एक बागी दोस्त ने यह कहकर यहाँ रोपा था कि इस पर आजाद हिन्दुस्तान की खुशहालियाँ फूलेंगी। वक्त की बात बाबूजी, उसी रात अपने चार साथियों के साथ वह पुलिस के बीच घिर गया और…”
“और शहीद हो गया।” लालाजी के वाक्य को पूरा करते हुए मैं बोलता हूँ।
“हाँ बाबूजी। जतन बाबू ने तभी से इस पौधे को अपने बच्चे की तरह सींच-सींचकर वृक्ष बनाया है। खाद, पानी…कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। खूब हरा-भरा रहता है यह; लेकिन……”
“लेकिन क्या?”
“हिन्दुस्तान को आज़ाद हुए इतने बरस बीत गए।” चलते-चलते लालाजी रुक जाते हैं—“पता नहीं क्या बात है कि इस पर फूल एक भी नहीं खिला…।”