सोमवार, नवंबर 02, 2026

चलना-रुकना / बलराम अग्रवाल

 चलते-चलते वे रुक गये।

मेरा हाथ पकड़कर उपदेशक के अंदाज में बोले :

“जीवन, चलने और चलते रहने का नाम है!…लेकिन ‘चलने’ से तात्पर्य सिर्फ ‘पैर’ नहीं है, ‘साँस’ भी है!”

“साँस!” मेरे मुँह से अनायास निकला।

“हाँ, उसका चलते रहना जीवन के लिए जरूरी है!”

“लेकिन, ‘साँस’ का चरित्र तो एकदम अनोखा होता है आचार्य जी!” मैंने कहा।

“साँस के चरित्र में अनोखापन?” वे अपने आचार्यत्व को मुझ पर हावी करते हुए बोले, “हो ही नहीं सकता!”

“होता है, मान जाइए!” मैं मुस्कुराया।

“जो हो नहीं सकता, उसे मैं मान कैसे सकता हूँ?” वे नाराजगी भरे स्वर में बोले।

“कभी-कभी साँस रुकती नहीं, चलते-चलते चली…ऽ…जाती है!” मैं हँसा।

आचार्य जी मेरा मुँह ताकते रह गये।

इस बार मैंने उनका हाथ पकड़ा और हँसते हुए कहा, “चलो, चलते हैं!”

✺21-6-2025/09:40

शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2026

दो बहनें / बलराम अग्रवाल

वे एक ही परिवार से निकली दो बहनें थीं। एक—गोल-मटोल और गोरी-चिट्टी; दूसरी—चेहरे पर चेचक-जैसे दाग लिए चपटी और सूखी। दोनों को पाने वाले भी दो ही तरह के लोग थे।

गोरी-चिट्टी को पाने वाले राजे-रजवाड़े, सेठ-साहूकार और बड़े-बड़े राजनेता थे जबकि चेचक-जैसे दाग वाली चपटी और रूखी-सूखी गरीब-गुरबों, मजलूमों और मजबूरों के हिस्से में आती थी।

गोरी-चिट्टी में आकर्षण था, अदाएँ थीं; लेकिन वह उछाली और फेंकी भी खूब जाती थी।

चेचक-जैसे दाग वाली में अदाएँ न थीं; लेकिन चाहने वालों को आकर्षित वह भी खूब करती थी। वह, कभी भी न तो उछाली और न फेंकी ही जाती थी। चाहने वाले उसे सम्हालकर रखते थे। वक्त-जरूरत पूरा सम्मान उसे देते थे।

गोल-मटोल और गोरी-चिट्टी वक्त की मार झेलकर अक्सर चपटी और सूखी बन जाती थी; और चेचक वालियों के भाव कबाड़ में बिकती थी।

रोटियों का यह इतिहास भी है और वर्तमान भी।

साहित्य अमृत, नवम्बर 2026 में प्रकाशित

बुधवार, अक्टूबर 28, 2026

सुरग-नरग / बलराम अग्रवाल

 


जाड़ों की गुनगुनी दोपहर। सड़क किनारे चाय-बिस्कुट का एक खस्ता-हाल खोखा। मैले-से गेरुए वस्त्र पहने, संन्यासी-सा दिखने वाले एक अधेड़ ने सामने वाली बेंचों में से एक पर बैठते हुए चाय ऑर्डर की। चाय वाले ने केतली से उँड़ेलकर जैसे ही चाय का कुल्हड़ उसके हाथ में थमाया, दूसरी बेंच पर बैठ पहले से ही चाय पी रहे नरोत्तम ने चायवाले से कहा, “यह चाय मेरे खाते में डाल देना सुरेश।” फिर उस व्यक्ति से कहा, “आपसे कुछ पूछने की धृष्टता कर सकता हूँ महाराज?”

“मेरे लत्तों पै ना जा भाई,” अधेड़ ने कहा, “मैं कोई संन्यासी ना हूँ।”

“जो भी हैं, हम-जैसे सामान्य लोगों से तो अलग ही हैं।” नरोत्तम बोला, “दरअसल, मन में कई बार जिज्ञासा होती है कि सृष्टि में क्या वाकई स्वर्ग या नर्क जैसी कोई जगहें हैं?”

“जरूर है!” बात सुनते ही संन्यासी ने तुरन्त कहा।

“सिद्ध कैसे किया जाए?” नरोत्तम ने सवाल किया।

एकाएक, संन्यासी की नजर सामने से आ रही एक शव-यात्रा पर पड़ी।

“थारी जिज्ञासा का समाधान सामने से आ रह्या है! आ, कुछ कदम या अरथी के संग चलते हैं!” चाय समाप्त कर कुल्हड़ को डस्टबिन के हवाले कर उसने खड़े होते हुए कहा। नरोत्तम भी उसके साथ ही उठ खड़ा हुआ। समीप आने पर दोनों उस यात्रा में शामिल हो गये।

“राम नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!” समूचा इकट्ठ बोल रहा था। शब्दानुसरण करते हुए ये भी साथ-साथ बढ़ने लगे।

“सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते को अपनाकर सिवा इसके कि परिवार को गरीबी में धकेले रखा, इस जगदीश ने हासिल क्या किया!” यात्रा में एक व्यक्ति अपने साथ वाले से दुख व्यक्त कर रहा था। साथ वाला ‘हूँ…हाँ’ करता, ‘राम नाम…सत्य है!’ बोलता-बुदबुदाता, चलता जा रहा था।

“मन्दिर के पत्थर पर जिन्दगीभर चन्दन ही घिसने को भक्ति और हजार-पाँच सौ रुपये की मजदूरी करने को पुरुषार्थ समझते रहे भाईसाहब!…कितना समझाया, दुनियादारी को समझ नहीं पाये!” अपने निकटवर्ती से यह अफसोस जाहिर करने वाला मृतक का छोटा भाई था शायद।

“हरि का नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!” यात्रा जारी थी।

“तीन-तीन जवान बेटियाँ ब्याह लायक छोड़ गये हैं जीजा जी…” एक प्रौढ़ चिन्ता व्यक्त कर रहे थे,  “कष्टों का पहाड़ टूट पड़ा है…ऊपर वाला हिम्मत दे; जितना हो सकेगा, हम भी देखेंगे ही!”

“राम नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!”

“किसी धन्ना सेठ से कम नहीं था मेरा यार! किसी को देकर न सही, लेकर नहीं मरा है!…” एक सज्जन भरे गले से अपने साथ वाले से कह रहे थे, “इसकी दोस्ती पर जितना गर्व किया जाये, कम है!…”

“हरि का नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!”

“अच्छाई-बुराई ही साथ जाती है लाला जी! इस जैसा नेक आदमी दीवा लेकर ढूँढने से भी दूर-दूर तक नहीं मिलेगा।…” एक अन्य व्यक्ति अपने साथ चलने वाले से कह रहा था।

“ठीक कहो हो भाई जी!” साथ वाले ने समर्थन किया।

“राम नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!”

“सुन लीं सारी बातें?” हाथ के इशारे से नरोत्तम को यात्रा से अलग करते हुए संन्यासी ने धीरे से पूछा।

“जी!”

“ये विपरीत भी हो सकें थीं! है कि नहीं?”

“जी!”

“इसी को सुरग-नरग कहवैं हैं!” कहकर, नरोत्तम को वहीं खड़ा छोड़, वह जिधर जाना था, चला गया।

                                                                                        ‘साहित्य अमृत’ जून 2026 अंक में

रविवार, अक्टूबर 25, 2026

तैरती हुई रोटियाँ / बलराम अग्रवाल

  


पति निकम्मा नहीं था, लेकिन कोरोना के चलते सभी तरह के निर्माण-कार्य बन्द थे। इसलिए घर में ही पड़े रहने को विवश था।

“सुनो,” भूख से विह्वल बच्चों को देखकर एक दोपहर पत्नी ने उससे कहा, “नहर पार वाले खेतों में खीरा, ककड़ी और टमाटर खूब लगे होंगे!…”

“तो?” उसके मन्तव्य को समझकर भी पति ने पूछा।

“आजकल तो सड़क-खेत सब सुनसान पड़े रहते हैं,” उसने कहा, “शाम को तो कुत्ता भी कहीं नजर नहीं आता…!”

“तेरे कहने का मतलब है कि मैं चोरी करके लाऊँ?”

“बच्चों का रोटी के लिए रोना मेरा कलेजा चीर डालता है!” उसने करुण भाव से कहा।

“मैं चोरी करने नहीं जा सकता!” पति ने फरमान सुनाया और अपनी विवशता पर रोता-सा खाट पर जा लेटा।

‘ठीक है, तुम नहीं जा सकते तो मैं ही सही।’ पति की बात सुनकर पत्नी ने अपने आप से कहा।

उसने दिन ढलने का इंतजार किया। दरवाजे से सिर निकालकर इधर-उधर झाँका। किसी को बाहर न देखकर नौ साल और पाँच साल के बेटों को साथ लिया और लम्बे-लम्बे डग बढ़ाती नहर की ओर निकल पड़ी।

उछलते-कूदते बच्चे आगे थे, वह पीछे। जैसे ही नहर के पुल पर पहुँचे, बड़े बेटे को पानी की सतह पर कुछ रोटियों के तैरती आने का आभास हुआ।

“अम्मा, रोटी!” वह जोर से चिल्लाया और पकड़ने के लिए धड़ाम से, तैरती हुई उन रोटियों पर कूद पड़ा।

उसकी देखा-देखी पाँच साल का छोटा भाई भी जा कूदा।

यह सब इतनी तेजी से हुआ कि वह कुछ समझ ही न पाई। आव देखा न ताव, बच्चों को बचाने के लिए वह भी नहर में कूद गई।

तीनों में से किसी को भी तैरना नहीं आता था। सिर्फ रोटियाँ थीं जो तैर सकती थीं। वे थीं भी या नहीं, कोई नहीं जानता।

                                              पिकरिंग, कनाडा 13-10-26/21:50 / प्रकाशित ‘साहित्य अमृत’ नवम्बर 2026

शनिवार, अक्टूबर 24, 2026

पेड़ पर रोटियाँ / बलराम अग्रवाल

 


दस वर्षीय राजू को तीन दिन से रोटी नसीब नहीं हुई थी। वह जब भी खाना माँगता, माँ कभी प्याज तो कभी मूली उसके हाथ में थमा देती।

“यह क्या बात हुई!” आज भी माँ ने गाजर आगे बढ़ाई तो वह रोटी ही लेने की जिद पर अड़ गया, “बिना रोटी के पेट भरता है क्या?”

 जिद पर अड़ा तो मजबूर माँ ने उसकी पिटाई कर दी। कहा, “रोटियाँ क्या पेड़ पर लगती हैं, कि जाऊँ और तोड़ लाऊँ?”

पिटकर राजू रोता हुआ अन्दर की कोठरी में रखे बिस्तरों के ढेर पर जा लेटा। भूख के मारे पेट में ऐंठन हो रही थी। रोते-रोते उसे नींद आ गई और वह सपनों की दुनिया में चला गया।

उसने देखा कि वह एक ऐसे जंगल में पहुँच गया है जो पूरा का पूरा गूँथे हुए आटे का ही बना था। वहाँ आटे के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ थे। यहाँ से वहाँ तक आटे के ही पेड़ थे; और उन सब पर गोल-मटोल रोटियाँ ही रोटियाँ लटकी हुई थीं। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सोचा—अब किसी भी दिन उसे या माँ को रोटी खाये बिना नहीं रहना पड़ेगा। रोटियाँ तोड़कर जेबों में भर लेने के लिए उसने हाथ ऊपर बढ़ाया; लेकिन पाया कि वे उसकी पहुँच से बाहर, बहुत ऊँची टहनियों पर लटकी थीं।

उसे याद आया कि घर में, जब भी किसी ऊँची जगह से कोई चीज उतरवानी होती है, माँ उसे अपने कंधों पर बैठाकर ऊँचा कर देती है।

‘यही ठीक रहेगा’—उसने सोचा और बुलाने के लिए जोर से पुकारने लगा, “माँ! इधर आओ, इधर! यहाँ रोटियों के पेड़ ही पेड़ हैं!”

उन पेड़ों के चारों ओर भागता हुआ, पता नहीं कितनी देर तक वह माँ को पुकारता रहा। माँ नहीं आई। थक-हारकर वह एक पेड़ के तने का सहारा लेकर बैठ गया। जल्द ही उसे नींद आ गयी। सपने में उसने देखा—पेड़ की टहनियों से टूटकर सुहाती-सुहाती-सी गरम रोटियाँ ठंड से ठिठुरती उसकी देह को चादर की तरह ढकने लगी हैं। रोटियों से बनी उस चादर को ऊपरी सिरों से पकड़कर उसने अपने कंधों तक खींच लिया और करवट बदल ली!

वह नहीं जान पाया कि फटी-पुरानी एक गरम चादर, रोते हुए सो गये अपने भूखे बेटे को ओढ़ाकर माँ आँसू पोंछती हुई बाहर निकल गयी थी।   

पिकरिंग, कनाडा 14-10-26/01:39 / प्रकाशित ‘साहित्य अमृत’ नवम्बर 2026

मंगलवार, जून 17, 2025

दो भक्तों की कथा / बलराम अग्रवाल

"सर, आज की परिस्थिति में 'भक्त' और 'अंधभक्त' में क्या अन्तर है?"

"जो लोग एक खास खेमे का राग अलापते हैं, वे भक्त हैं और अपने खेमे से बाहर वाले समस्त रागियों को वे अंधभक्त कहते हैं। बहरहाल, अंधे पहले वाले भी हैं।"

"समझ में नहीं आया सर!"

"यों समझो कि इलाके में दो कीर्तन मंडलियाँ हैं। अपने-अपने इष्ट की प्रशस्ति गाने वाला एक से बढ़कर एक भक्त उन मंडलियों में है। एक मंडली के इष्ट मार्क्स हैं, माओ हैं, लेनिन हैं, नेहरू हैं, और भी कई-एक हैं। इनकी प्रशस्ति को ये लोग प्रगतिशील चिंतन कहते हैं।"

"और, दूसरी मंडली.. ?"

"दूसरी मंडली वालों के इष्ट तो एक हैं लेकिन देवता तेंतीस करोड़ हैं। इसीलिए इनके सुरों में भिन्नता मिलती है। अतीत-गायन से एक कदम भी आगे बढ़ने, वर्तमान से जुड़ने की कोशिश भर को ये अपमान समझते हैं, और इसीलिए...।"

"इसीलिए क्या?"

"इसीलिए पहली भक्त-मंडली के निशाने पर बने रहते हैं।"

बात-बतंगड़ / बलराम अग्रवाल

 “वे कह रहे हैं—यह हिमाकत नाकाबिले बर्दाश्त है।”

“क्यों?”

“इसलिए कि… ‘आपका दिन शुभ हो’ की बजाय, गलती से ‘आपका दीन शुभ हो’ टाइप होकर समूह में डल गया। बस, तभी से सारे के सारे सेक्युलर अपना कुर्ता फाड़ डाल रहे हैं। बाँहें कुहनियों तक चढ़ाए, आँखें तरेड़ते खड़े हैं!”

एक असन्तुष्ट से बातचीत / बलराम अग्रवाल

जैसे ही कार उसके नजदीक से गुजरती, भौंकते हुए वह आदतन-सा उसके साथ दौड़ पड़ता।

आखिरकार, एक दिन मैंने कार साइड में रोकी और दरवाजा खोलकर नीचे उतर आया। पूछा, “जाते-आते क्यों भौंकते हो हर बार?”

“तुम पर नहीं, कार पर भौंकता हूँ।” वह बोला।

“क्यों?”

“हम पूँजी के खिलाफ हैं।”

“लेकिन, मैं तो ड्राइवर हूँ, सर्वहारा श्रेणी का आदमी!”

“होगे; कार पूँजी का प्रतीक है और इसमें बैठे आदमी को सर्वहारा नहीं माना जा सकता!”

“अभी कुछ दिन पहले तुम एक बाइक-सवार पर भी भौंकते नजर आए थे?”

“हमारी नजर में स्कूटी-बाइक भी पूँजी ही हैं!”

“उससे पहले एक साइकिल वाले को भी खूब दौड़ाया था तुमने!”

“मुझ जैसे ग्रासरूट लेवल के शख्स को जो चीजें मुहैया नहीं हैं, वे सब पूँजी की श्रेणी में आती हैं!”

“बकवास मत करो। एक दिन, जब मैं पैदल यहाँ से गुजर रहा था, तुम एकाएक मुझ पर ही झपट पड़े थे, याद है?”

“खूब याद है!”

“उसके बारे में क्या सफाई है?”

“देख रहे हो कि जब से पैदा हुआ हूँ, नंगा घूम रहा हूँ! लिबास वालों पर हमला मेरा मौलिक अधिकार बनता है कि नहीं?” 

अन्तर्सम्बन्ध / बलराम अग्रवाल

                                                           ललिता का सिर आज गर्वानुभूति से तना हुआ ही था। वह शायद इस इंतजार में थी कि कोई सहकर्मी चर्चा चलाए तो वह चहके। 

“क्या-क्या मिल गया भतीजे की शादी में?” सुषमा के पूछते ही चेहरे पर मुस्कान बिखेरकर फूट पड़ी उसके। बोली, “इतनी अच्छी रिश्तेदारी मिली है कि हम सोच भी नहीं सकते थे।”

“रिश्तेदारी छोड़ो, तुम क्या-क्या बटोर लाई, यह बताओ?” समीप ही बैठी किरन ने पूछा।

“वह भी बताऊँगी,” ललिता ने कहा, “पहले यह सुनो कि बहू क्या लाई है? भगवान कसम, ऐसी-ऐसी चीजें लाई है कि हम सोच भी नहीं सकते थे।”

“क्या-क्या ले आई, बता जरा?” उत्सुक अन्दाज में सुषमा ने पूछा। 

“वॉशिंग मशीन, बर्तन धोने की मशीन, रोटी बनाने की मशीन, सब की सब फुल्ली ऑटोमेटिक!” ललिता बताने लगी, “टीवी, फ्रिज, ए.सी., टेबल फैन, सीलिंग फैन, सब के सब रिमोट से चलने वाले!”

“इसमें नया क्या है ललिता?” समीप की ही सीट पर बैठे हुए निरंजन ने उसकी गर्वोक्ति पर चुटकी लेते हुए कहा, “कपड़े धोने, रोटी बनाने, बर्तन माँजने की फुल्ली ऑटोमेटिक मशीन तो अब से दस साल पहले मुझे मिल गई थी शादी में। रिमोट की भी जरूरत नहीं पड़ती, तुम्हारी भाभी इशारा पाते ही टीवी, फ्रिज, ए.सी., टेबल फैन, सीलिंग फैन सब ऑन कर देती है।”

“तू वाइफ थोड़े ही लाया था शादी करके, नौकरानी लाया था!” ललिता ने चिढ़कर कहा।

“तुझे भी बहू नहीं मिली है भतीजे की शादी में!” निरंजन बोला, “मालिकिन मिली है, सबको नचाएगी दहेज की नोक पर!”

“और, तू जो बिना दहेज लिये ही नाचता है भाभी की उँगलियों पर, उसका क्या?” चिढ़कर ललिता ने कहा तो सुषमा और किरन दोनों हँस पड़ीं।

“तू उस नाचने का आनन्द नहीं समझ पायेगी ललिता!” निरंजन नीचे ही नीचे फुसफुसाया और अपने काम में लग रहा।

रविवार, फ़रवरी 09, 2025

उसकी बात / बलराम अग्रवाल

[लघुकथा का यह ड्राफ्ट आज 09-02-25 को एक पुरानी डायरी में रखा मिला है। इस पर तारीख नहीं लिखी। कथ्य और ड्राफ्ट की प्रकृति को देखते हुए 1975 तक कभी लिखी गई हो सकती है। यह मेरे किसी संग्रह में भी नहीं है शायद। ड्राफ्ट के कुछेक शब्द दुरुस्त जरूर करने पड़े हैं।]

लगभग पन्द्रह दिन पहले, फटे हाल एक अधेड़ मेरे कमरे पर आया था, एक बच्ची और एक पत्र के साथ। पत्र अनुराधा का था। लिखा था–'तुम्हारे आदेशानुसार जिस पति को अपना जीवनाधार माना माना था, उसने दूरी अपना ली है। बच्ची को तुम्हारे जिम्मे छोड़कर धरती से दूर जा रही हूँ। इसको पिता के पाँवों को आधार मानकर जीना नहीं सिखाना, स्वाभिमान भर देना।

तुम्हारी अनु

□ अनु मेरी प्रेमिका थी।

□ आज, शाहदरा जाते हुए वह अचानक ही ट्रेन में मिल गया। दस साल के वैवाहिक जीवन के हर पहलू को पेश करते-करते उसने बताया–अनु को उसने तलाक दे दिया है। छः वर्षीया बच्ची अनु के पास ही रहेगी। बच्ची का पोषण-भार वह वह स्वयं ही वहन करेगा–साठ रुपये महीना देकर।

□ बातचीत के दौरान मेरी चुप्पी की चिन्ता उसने नहीं की। शाहदरा स्टेशन आया। मुझे उतरना था, लेकिन वह पूरी कहानी कह नहीं पाया था; इसलिए 'गुड-बाई' के बजाय 'सॉरी' कहकर उससे विदा होना पड़ा।

□ पीछे घूमकर उसकी ओर देखे बिना ही मैं चला। ट्रेन भी खिसक ली। अनु और उसके दस वर्षीय वैवाहिक जीवन के उतार-चढ़ाव को अपने आप में क्रमशः उलटने ही लगा था कि उसने पीछे से आकर मेरा हाथ दबाया–"यार, जैसे भी हो, अनु को मना लो। मैं तलाक वापस लेने को तैयार हूँ। दरअसल, उसके वगैर मैं जी नहीं सकता। ये पन्द्रह दिन कैसे कटे हैं, मैं ही जानता हूँ।" 

□ निराश्रित बच्ची की तस्वीर मैं उसके चेहरे पर  देखना चाहता था लेकिन अनु के पत्र ने उसको पूरा ढक दिया। मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही वह चलती ट्रेन की ओर दौड़ा। मेरी करुणा भी उसको ट्रेन तक पहुँच जाने की दुआ दी; लेकिन भरपूर कोशिश के बावजूद अन्तिम डिब्बे तक भी उसका हाथ पहुँच नहीं पाया।