जाड़ों
की गुनगुनी दोपहर। सड़क किनारे चाय-बिस्कुट का एक खस्ता-हाल खोखा। मैले-से गेरुए
वस्त्र पहने, संन्यासी-सा
दिखने वाले एक अधेड़ ने सामने वाली बेंचों में से एक पर बैठते हुए चाय ऑर्डर की।
चाय वाले ने केतली से उँड़ेलकर जैसे ही चाय का कुल्हड़ उसके हाथ में थमाया,
दूसरी
बेंच पर बैठ पहले से ही चाय पी रहे नरोत्तम ने चायवाले से कहा,
“यह चाय मेरे खाते में डाल देना सुरेश।” फिर उस
व्यक्ति से कहा, “आपसे
कुछ पूछने की धृष्टता कर सकता हूँ महाराज?”
“मेरे
लत्तों पै ना जा भाई,” अधेड़
ने कहा, “मैं
कोई संन्यासी ना हूँ।”
“जो
भी हैं, हम-जैसे
सामान्य लोगों से तो अलग ही हैं।” नरोत्तम बोला,
“दरअसल, मन
में कई बार जिज्ञासा होती है कि सृष्टि में क्या वाकई स्वर्ग या नर्क जैसी कोई
जगहें हैं?”
“जरूर
है!” बात सुनते ही संन्यासी ने तुरन्त कहा।
“सिद्ध
कैसे किया जाए?” नरोत्तम
ने सवाल किया।
एकाएक,
संन्यासी
की नजर सामने से आ रही एक शव-यात्रा पर पड़ी।
“थारी
जिज्ञासा का समाधान सामने से आ रह्या है! आ,
कुछ
कदम या अरथी के संग चलते हैं!” चाय समाप्त कर कुल्हड़ को डस्टबिन के हवाले कर उसने
खड़े होते हुए कहा। नरोत्तम भी उसके साथ ही उठ खड़ा हुआ। समीप आने पर दोनों उस
यात्रा में शामिल हो गये।
“राम
नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!” समूचा इकट्ठ बोल रहा था। शब्दानुसरण करते हुए ये
भी साथ-साथ बढ़ने लगे।
“सच्चाई
और ईमानदारी के रास्ते को अपनाकर सिवा इसके कि परिवार को गरीबी में धकेले रखा,
इस
जगदीश ने हासिल क्या किया!” यात्रा में एक व्यक्ति अपने साथ वाले से दुख व्यक्त कर
रहा था। साथ वाला ‘हूँ…हाँ’ करता, ‘राम
नाम…सत्य है!’ बोलता-बुदबुदाता, चलता
जा रहा था।
“मन्दिर
के पत्थर पर जिन्दगीभर चन्दन ही घिसने को भक्ति और हजार-पाँच सौ रुपये की मजदूरी
करने को पुरुषार्थ समझते रहे भाईसाहब!…कितना समझाया,
दुनियादारी
को समझ नहीं पाये!” अपने निकटवर्ती से यह अफसोस जाहिर करने वाला मृतक का छोटा भाई
था शायद।
“हरि
का नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!” यात्रा जारी थी।
“तीन-तीन
जवान बेटियाँ ब्याह लायक छोड़ गये हैं जीजा जी…” एक प्रौढ़ चिन्ता व्यक्त कर रहे थे, “कष्टों का पहाड़ टूट
पड़ा है…ऊपर वाला हिम्मत दे; जितना
हो सकेगा, हम
भी देखेंगे ही!”
“राम
नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!”
“किसी
धन्ना सेठ से कम नहीं था मेरा यार! किसी को देकर न सही,
लेकर
नहीं मरा है!…” एक सज्जन भरे गले से अपने साथ वाले से कह रहे थे,
“इसकी दोस्ती पर जितना गर्व किया जाये,
कम
है!…”
“हरि
का नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!”
“अच्छाई-बुराई
ही साथ जाती है लाला जी! इस जैसा नेक आदमी दीवा लेकर ढूँढने से भी दूर-दूर तक नहीं
मिलेगा।…” एक अन्य व्यक्ति अपने साथ चलने वाले से कह रहा था।
“ठीक
कहो हो भाई जी!” साथ वाले ने समर्थन किया।
“राम
नाम…सत्य है!…सत्य बोलो…गत्य है!”
“सुन
लीं सारी बातें?” हाथ
के इशारे से नरोत्तम को यात्रा से अलग करते हुए संन्यासी ने धीरे से पूछा।
“जी!”
“ये
विपरीत भी हो सकें थीं! है कि नहीं?”
“जी!”
“इसी
को सुरग-नरग कहवैं हैं!” कहकर, नरोत्तम
को वहीं खड़ा छोड़, वह
जिधर जाना था, चला
गया।
‘साहित्य
अमृत’ जून 2026 अंक में