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चित्र:आदित्य अग्रवाल |
बत्ती बुझाकर जैसे ही वह बिस्तर पर लेटता, उसे घुँघरुओं के खनकने की आवाज सुनाई देने लगती। महीनों से यह सिलसिला चल रहा था। शुरू-शुरू में तो उस आवाज को उसने मन का वहम ही माना; लेकिन बाद में, घुँघरुओं की आवाज हर रात लगातार सुनाई देने लगी, तो उसने अपना ध्यान उस पर केन्द्रित करना शुरू किया। नहीं, वह वहम नहीं था। आवाज सचमुच उसके आसपास ही कहीं से आती थी।
एक रात, हिम्मत करके, उसने आखिर पूछ ही लिया," कौन है?"
"मैं..." सवाल के जवाब में एक स्त्री-स्वर उसे सुनाई दिया,"यश-लक्ष्मी!"
"यश-लक्ष्मी !" उसके मुँह से साश्चर्य निकला।
"यश चाहिए ?" स्त्री-स्वर ने तुरन्त पूछा।
"सभी को चाहिए।" वह बोला।
"सभी की छोड़ो, अपनी बात करो।"
इस पर वह कुछ न कह सका, चुप रहा।
"चारों ओर जय-जयकार करा दूँगी।" स्त्री-स्वर ने कहा।
यह बात सुनते ही उसे अपनी माँ की याद हो आयी। बेटे, मेहरबानियों के सहारे मिलने वाले धन और यश दोनों ही, आदमी से उसके ज़मीर की...किसी बेहद अपने की बलि ले लेते हैं_ वह कहा करती है। यश-लक्ष्मी किस अपने की बलि माँगेगी मुझ नि:सन्तान से_माँ की, पत्नी की...या किसी दोस्त की ! वह सोचने लगा।
"चाहिए?" स्त्री-स्वर पुन: सुनाई दिया ।
"चच्चाहिए...।" वह हिम्मत बटोरकर बोला ।
"बलि दोगे ?" छनछनाहट के साथ ही उम्मीद के मुताबिक तुरन्त यह सवाल उसे सुनाई पड़ा।
"बलि दी.... ...." आखों में आसुरी-चमक लिए वह तुरन्त ही बिस्तर से उठ खड़ा हुआ और दोनों बाँहों को ऊपर की ओर फैलाकर पूरी ताकत के साथ चीखा," उठा ले जाओ...जिसे चाहो...!"
10 टिप्पणियां:
shortcuts तो बलि माँगता ही है. और लोग देते भी हैं...
लघुकथा पढ़ तो ली, पर समझ नहीं आई। लगा अंत में कुछ छूट रहा है।
कौतुहल बना रहा अंत तक और जैसा कि भाई राजेश उत्साही जी ने कहा, ठीक वैसा ही मैंने भी अन्त में अनुभव किया…
बिम्ब अच्छा है। सामान्यत: होता भी यही है, पर आपसे अपेक्षा कुछ आगे की रहती है।
यश और लक्ष्मी दोनो बिना जमीर और रिश्तो की बलि दिये नही मिल सकते,अच्छा है।यही अर्थ खनकता है इस खनक से। अच्छी है।
AAPKEE LAGHUKATHA PADH KAR MUJHE
SANT KABEER DAAS KAA YAH DOHAA
YAAD AA GAYAA HAI -
KABIRA KHADAA BAZAAR MEIN
LIYE LUKAATHEE HAATH
JO GHAR FOONKE AAPNAA
CHALE HAMAARE SAATH
YASH PAANE KE LIYE TYAAG
KEE BHAAVNAA KAA HONA ATI AAWASHAYAK HAI .
ACHCHHEE LAGHU KATHA KE
LIYE AAPKO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA .
समझ में तो आ रहा है फिर भी अंत कुछ अस्पष्ट सा है
बेहद तल्ख लघुकथा और वास्तविकता को बयान करती हुई. यश -धन चाहने वाले किसी की भी बलि देने के लिए तैयार रहते हैं और बिना उसके उन्हें वह सब मिलता ही नहीं---- और हकीकत यह कि सबसे उनके अपने जमीर की ही बलि चढ़ती है.
चन्देल
लघुकथा अच्छी लगी । वास्तव में यश व धन का प्रलोभन मनुष्य को निस्संग बना देता है ।
मुझे तो लघुकथा अच्छी लगी । ऐश्वर्य का प्रलोभन प्रायः लोगों को निस्संग बना देता है ।
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