वे एक ही परिवार से निकली दो बहनें थीं। एक—गोल-मटोल और गोरी-चिट्टी; दूसरी—चेहरे पर चेचक-जैसे दाग लिए चपटी और सूखी। दोनों को पाने वाले भी दो ही तरह के लोग थे।
गोरी-चिट्टी को पाने वाले राजे-रजवाड़े, सेठ-साहूकार और बड़े-बड़े राजनेता थे जबकि चेचक-जैसे दाग वाली चपटी और रूखी-सूखी गरीब-गुरबों, मजलूमों और मजबूरों के हिस्से में आती थी।
गोरी-चिट्टी में आकर्षण था, अदाएँ थीं; लेकिन वह उछाली और फेंकी भी खूब जाती थी।
चेचक-जैसे दाग वाली में अदाएँ न थीं; लेकिन चाहने वालों को आकर्षित वह भी खूब करती थी। वह, कभी भी न तो उछाली और न फेंकी ही जाती थी। चाहने वाले उसे सम्हालकर रखते थे। वक्त-जरूरत पूरा सम्मान उसे देते थे।
गोल-मटोल और गोरी-चिट्टी वक्त की मार झेलकर अक्सर चपटी और सूखी बन जाती थी; और चेचक वालियों के भाव कबाड़ में बिकती थी।
रोटियों का यह इतिहास भी है और वर्तमान भी।
साहित्य अमृत, नवम्बर 2026 में प्रकाशित
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