रविवार, मार्च 31, 2013

देवों की घाटी/बलराम अग्रवाल


                                  चित्र:बलराम अग्रवाल

 मित्रो, 'कथायात्रा' में 29 जनवरी,2013 से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' को प्रस्तुत करना शुरू किया था। प्रस्तुत है उक्त उपन्यास की तीसरी कड़ी…
गतांक से आगे…
             (तीसरी कड़ी)
दादाजी के साथ स्कूल से घर लौटते हुए दोनों बच्चे रास्ते–भर आगामी यात्रा के बारे में ही परस्पर चर्चा करते और खुश होते रहे। घर पहुँचकर वे चहकते हुए ममता के पास पहुँचे और एक–एक कर उन्होंने विद्यालय में हुए सारे रंगारंग कार्यक्रमों के बारे में बताना शुरू कर दिया। कभी निक्की बताते हुए बीच में कुछ भूल जाता तो मणिका उसमें संशोधन करती और मणिका कुछ भूल जाती तो निक्की उसमें संशोधन करता।
ममता घर का काम करते हुए ही दोनों की बातें सुनती रही।
दादाजी ने मना न कर रखा होता तो एक ही झटके में वे लम्बी यात्रा पर ले जाने की उनकी बात भी बोल ही चुके होते। सारी बातें मम्मी को बताने के दौरान उन्होंने कैसे अपनी जुबान पर काबू रखा, इसे बस वे ही समझ सकते थे।
मणिका को जब यह महसूस होने लगा कि अब अगर वे थोड़ी देर भी मम्मी के पास रुके तो मन की बात जुबान पर आ ही जायगी, तब बहाना बनाकर वह निक्की को वहाँ से उठाकर बाहर ले गयी।

उसके बाद बाकी ग्यारह दिनों तक दादाजी ने उन्हें यात्रा के दौरान काम आने वाली ज़रूरी चीज़ें बताने और उन्हें इकट्ठा करने में व्यस्त रखा। रस्सी, चाकू, एक छोटा और एक बड़ा ताला, टॉर्च, लाइटर, दो इलैक्ट्रॉनिक लालटेनें, मोमबत्तियाँ, दो–चार क्लिप्स, बैंड–एड्स, नेपकिन्स, टिश्यू पेपर, नहाने व कपड़े धोने के लिक्विड साबुन, टूथपेस्ट, हाजमे की गोलियाँ और चूर्ण। पहनकर चलने के लिए कपड़े के जूते, सिर ढँकने के लिए गर्म टोपियाँ व मफलर–स्कार्फ। और–भी पता नहीं क्या–क्या।
ठीक पहली जून को हुआ—उनकी यात्रा का शुभारम्भ। जल्दी करते–करते भी ये लोग दोपहर के बाद ही घर से निकल पाए। प्रसन्न मन से निक्की और मणिका टैक्सी में सवार हो गए। उनके आश्चर्य और खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि मम्मी और डैडी भी दादाजी के साथ आ रहे हैं।
‘‘मम्मी–डैडी आप भी!!’’ मणिका के मुँह से फूटा।
‘‘जी हाँ, हम भी।’’ सुधाकर ने रौब के साथ कहा। ममता केवल मुस्कराकर रह गई।
‘‘दादाजी, आपने तो हमसे कहा था कि यात्रा पर जाने की बात लीक–आउट नहीं करनी है!…’’ इस पर मणिका ने शिकायतभरे अन्दाज़ में दादाजी से कहा,‘‘सरप्राइज़ देना है।’’
‘‘हाँ तो, मिल गया न सरप्राइज़।’’ सुधाकर बोले,‘‘हमें न सही, तुम्हें।’’
‘‘दिस इज़ चीटिंग दादाजी!’’ निक्की दादाजी से रूठने के अन्दाज़ में बोला।
‘‘मैंने कोई चीटिंग नहीं की।’’ दादाजी बोले,‘‘मुझे खुशी इस बात की है कि मैंने जो बात छिपाए रखने को कहा था, उसे दोनों पक्षों ने निभाया।’’
बच्चों ने इसके बाद कोई शिकायत नहीं की क्योंकि वस्तुत: तो वे खुश थे कि मम्मी–डैडी भी उनके साथ यात्रा पर चल रहे हैं।

यात्रा शुरू हुई।
‘‘पहली बार अब से दस साल पहले गए थे हम इस यात्रा पर, है न बाबूजी?’’ टैक्सी आगे बढ़ी तो सुधाकर ने बात शुरू की,‘‘निक्की तो तब पैदा भी नहीं हुआ था।’’
‘‘ठीक कहता है।’’ दादाजी ने हामी भरी,‘‘लेकिन तब हम टैक्सी से नहीं, ट्रेन से गए थे और तेरी मम्मी और बच्चों का चाचा विभाकर भी साथ थे।’’
‘‘मम्मीजी इस बार विभाकर भैया के साथ मैसूर–ऊटी की यात्रा का आनन्द लेने गई हैं।’’ ममता बोली,‘‘वे इस बार भी हमारे साथ ही रहतीं तो कितना मजा आता।’’
‘‘ठीक है बहू, वह साथ रहती तो परेशान ही ज्यादा करती।’’ दादाजी ने कहा,‘‘तुम्हें तो पता ही है कि यात्रा में उसे उल्टियाँ आने की बहुत तगड़ी बीमारी है।’’
‘‘वह बीमारी भी झेल ही ली जाती बाबूजी।’’ ममता ने कहा,‘‘अब विभाकर भैया भी तो उसे झेलेंगे ही।’’
‘‘चलो अब मजा किरकिरा न करो उसका बार–बार नाम लेकर।’’ दादाजी शरारती अन्दाज़ में बोले।
‘‘बाबूजी…!’’ ममता ने बनावटी तौर पर आँखें दिखाते हुए तुरन्त उन्हें टोका,‘‘आने दो मम्मीजी को…उन्हें बताऊँगी यह बात ।’’
‘‘अरे तू सीरियसली मत लिया कर मजाक को।’’ दादाजी ने कहा ।
‘‘…और आप लोग जो मजाक–मजाक में कह जाते हो सीरियस बात को, उसका क्या?’’ ममता ने तर्क पेश किया। फिर सुधाकर की ओर इशारा करके बोली,‘‘पता है, ये कितनी सीरियस बातें कर जाते हैं मुझसे ? और पकड़े जाने पर कहेंगे—मैं तो मजाक कर रहा था। एकदम आप ही पर गए हैं…।’’
‘‘अरे, उनका बेटा हूँ तो उन्हीं पर जाऊँगा न!’’ उसकी बात सुनकर सुधाकर बीच में बोल उठे ।
‘‘बेटे तो मम्मीजी के भी हो, उन पर क्यों नहीं गए?’’ ममता ने पूछा।
‘‘कुछ बातों में तो उन पर भी गया हूँ।’’ सुधाकर ने कहा,‘‘वो तुमसे डरती हैं, मैं भी डरता हूँ।’’
‘‘हे भगवान! माफ कर देना अगर मैंने एक पल के लिए भी उन्हें डराए रखना चाहा हो…’’ सुधाकर की इस बात पर ममता अपने दोनों कानों को हाथ लगाकर रुआँसी आवाज में बोली।
‘‘बस हो गई छुट्टी!’’ पीछे बैठी मणिका के मुँह से निकला,‘‘आपने मम्मी का मूड ऑफ कर दिया डैडी।’’
‘‘अब मजाक की बात को सीरियसली लेगी तो इसका क्या हमारा भी मूड ऑफ हो जाएगा।’’ सुधाकर ने कहा, फिर ममता की ओर कान पकड़कर बोला,‘‘सॉरी यार!’’
‘‘मम्मी, कम ऑन यार!’’ पीछे से निक्की बोला,‘‘मै आपके साथ हूँ।’’
‘‘मैं भी।’’ मणिका ने कहा।
‘‘और मैं भी…’’ दादाजी बोले।
‘‘और मैं तो बैठा ही इनके साथ हूँ।’’ सुधाकर ने कहा। फिर ममता से बोले,‘‘नो टियर्स ड्यूरिंग द जर्नी माई डियर…यात्रा पर निकले हैं, हँसती–मुस्कराती रहो।’’
ममता ने सिर्फ गरदन हिलाकर हामी भरी और लम्बी साँस खींचकर तनकर बैठ गई।
आगामी अंक में जारी…

रविवार, फ़रवरी 24, 2013

देवों की घाटी/बलराम अग्रवाल

 मित्रो, 'कथायात्रा' में 29 जनवरी,2013 से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' को प्रस्तुत करना शुरू किया था। इसे मैं पाक्षिक रूप से जारी करने का वादा था लेकिन दूसरी ही किस्त में एक सप्ताह लेट हूँ, माफी चाहता हूँ। आप सभी से अनुरोध है कि इसकी प्रस्तुति में जो भी सम्भावना शेष नजर आये, नि:संकोच बताएँ ताकि इसे सुधारा जा सके।
गतांक से आगे…
(दूसरी कड़ी)
                                                                                                                                    चित्र:बलराम अग्रवाल
 ‘‘मई के अन्त में…’’ निक्की ने बताना शुरू किया लेकिन बताने का अन्दाज़ उसका पहले–जैसा किसी गहरे रहस्य पर से परदा हटाने की तरह का ही रहा। मणिका ने इस बार कुछ सब्र्र से काम लिया। उसने निक्की की चुप्पी पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। कुछ पल बाद अन्तत: निक्की स्वयं ही बोला,‘‘मई के अन्त में दादाजी हमें ले जाएँगे…ऽ…बदरीनाथ यात्रा पर ।’’
‘‘हुर्रे…ऽ…!’’ यह सुनते ही मणिका खुशी से उछल पड़ी । दौड़ती हुई वह वापस दादाजी के निकट जा पहुँची और पूछने लगी,‘‘निक्की सच कह रहा है दादाजी ?’’
‘‘एकदम सच!’’ दादाजी मुस्कराते हुए बोले।
‘‘हुर्रे…ऽ…!’’ दादाजी का जवाब सुनते ही मणिका एक बार पुन: किलक उठी ।
‘‘आप कितने अच्छे हैं दादाजी!’’ दादाजी को अपनी नन्हीं बाहों में घेरने की कोशिश करते हुए वह बोली,‘‘यह बात मम्मी को बता दूँ?’’
‘‘अभी नहीं।’’ दादाजी ने कहा,‘‘पहले अपनी परीक्षाएँ समाप्त करो। अच्छा ग्रेड लेकर अगली कक्षा में पहुँचो। पहले सेशन की एक महीना पढ़ाई करो। उसके बाद गर्मी की छुट्टियों में तय करेंगे कि कहाँ जाना है—बदरीनाथ या कहीं–और!…और, तुम लोगों को साथ ले चलना है या नहीं।’’
‘‘दादाजी!!’’ दोनों बच्चों ने शिकायती स्वर में एक–साथ कहा ।
‘‘अब जाओ। घर की और अपने शरीर की सफाई करो। खाओ–पीओ और पढ़ो।’’ दादाजी ने हँसते हुए कहा।
निक्की और मणिका दोनों दादाजी के पास से उठ खड़े हुए। एक–दूसरे की गरदन में बाँहें डालकर वे बुझे मन से घर के भीतर की ओर चल दिए। उन्हें इस तरह जाते देखकर दादाजी धीरे–से मुस्कराए और कुर्सी को धूप में खिसकाकर अखबार पढ़ने में तल्लीन हो गए।

परीक्षाएँ समाप्त हुईं। परिणाम घोषित हुए। मणिका और निक्की दोनों ही अपनी–अपनी कक्षाओं में ए–प्लस ग्रेड लेकर पास हुए। एक भव्य समारोह में स्कूल के प्राचार्य ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सभी छात्र–छात्राओं को पुरस्कार तथा प्रशस्ति–पत्र प्रदान किये।
आगामी दिन से स्कूल पुन: खुला। अत्यन्त प्रफुल्लित मन से बच्चे नयी कक्षाओं में जाकर बैठे। नयी पुस्तकों के बीच उनका चहकना उनकी खुशी की गवाही देता था। लेकिन उनके मन पर यह दबाव भी हमेशा बना रहता था कि कब एक महीने का यह नया सेशन समाप्त हो और कब पढ़ाई के इस बंधन से मुक्त हो कुछ दिनों के लिए वे सैलानी बन जाएँ।
इस चिन्ता के चलते दोनों बच्चों ने बड़ी बेसब्री के साथ पहले सेशन की पढ़ाई समाप्त की।
छुट्टियाँ घोषित करने वाले दिन प्राचार्य महोदय के लिखित अनुरोध को स्वीकार कर अधिकतर बच्चे अपने माता–पिता के साथ स्कूल पहुँचे। सभी अभिभावकों को अध्यापकों व अन्य स्कूल–स्टाफ की मदद से आदर सहित स्कूल–भवन के सेमिनार कक्ष में निर्धारित सीटों पर बैठाया गया। छात्र–छात्राएँ अपनी–अपनी कक्षा में बैठे। प्राचार्य महोदय ने सभी छात्रों को पंक्तिबद्ध होकर स्कूल–भवन के सेमिनार कक्ष में एकत्र होने का आदेश भिजवाया था। अध्यापकों ने अपनी अनुपस्थिति में इस कार्य को सम्पन्न करने का जिम्मा प्रत्येक कक्षा के मॉनीटर को सौंपा था। पंक्तिबद्ध होकर सभी छात्र कक्षा–मॉनीटर्स की देखरेख में वहाँ पहुँच गये। निगम पार्षद एवं विधायक सहित क्षेत्र के कुछ अन्य गण्यमान्य लोग भी स्कूल–प्रशासन के आमन्त्रण पर आए हुए थे। उन सबको मंच के ठीक सामने सोफों पर बैठाया गया था। प्राचार्य एवं अध्यापकगण भी सोफों पर बैठे तथा समस्त छात्र उनके पीछे लगी कुर्सियों पर। 
कार्यक्रम शुरू हुआ।
सबसे पहले आमन्त्रित गण्यमान्य लोगों द्वारा विद्या की देवी ‘माँ सरस्वती’ की ताम्र–प्रतिमा के आगे रखे दीपों को प्रज्वलित कर उन्हें पुष्प अर्पित किए गए। तत्पश्चात् विद्यालय की संगीत–अध्यापिका के निर्देशन में तैयार कुछ छात्र–छात्राओं द्वारा संगीतमय सरस्वती–वन्दना प्रस्तुत की गई —
माँ शा…ऽ…रदे! वर दे ।
वरदे…ऽ…! वर दे ।
श्वे…ऽ…त पद्मा……ऽ…सने! चरणों…ऽ… में शरण दे ।
वरदे…ऽ…! वर दे ।
                                                              आगामी अंक में जारी…

मंगलवार, जनवरी 29, 2013

देवों की घाटी/बलराम अग्रवाल


 मित्रो, 'कथायात्रा' में आज से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' के कुछेक अंशों को प्रस्तुत करना शुरू कर रहा हूँ। इसे यथासम्भव मैं पाक्षिक रूप से जारी करूँगा।
(पहली कड़ी)

दीदी…ऽ…ऽ…दीदी…ऽ…!!
                        चित्र:बलराम अग्रवाल
बाहर लॉन में धूप सेंक रहे दादाजी के पास से उठकर निक्की मणिका को पुकार उठा। वहाँ खड़े रहकर उसने एक–दो आवाज़ें और लगाईं, फिर भागकर घर के अन्दर आ गया। यह कमरा, वह कमरा, स्टोर, बाथरूम—उसने सब देख डाले लेकिन मणिका का कहीं कोई पता न चला।
‘‘मम्मी! दीदी किधर है ?’’ हताश होकर वह रसोई में गया और ममता से पूछा।
‘‘क्यों, दोनों की कुट्टी दोबारा दोस्ती में बदल गई क्या ?’’ आटा गूँथती हुई ममता ने मुस्कराते हुए पूछा।
‘‘बताओ न मम्मी।’’ निक्की ने पैर पटकते हुए पुन: पूछा।
‘‘पहले तुम बताओ।’’ ममता उसी तरह मुस्कराती रही।
‘‘बताओ न!’’ निक्की रसोई के अन्दर आकर उनकी टाँगों से लिपट गया और नोंचने लगा।
‘‘अरे–अरे, चप्पलें बाहर उतारो।’’

आगामी अंक में जारी…

मंगलवार, फ़रवरी 21, 2012

लगाव/बलराम अग्रवाल

                                                                      चित्र:बलराम अग्रवाल
माता जी के रहते दूसरा कोई भी बाबूजी के कमरे को नहीं झाड़ता-बुहारता था। उनकी किस चीज़ को कहाँ रखना है-वही जानती थीं। लेकिन, जब से माता जी स्वर्ग सिधारी हैं, रमा ही उनका कमरा बुहारती है।
इधर, एक बात ने रमा का ध्यान कई दिनों से अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। एक ओर को रख दी गई अम्माजी की ढुलमुल-सी पुरानी मसनद को स्टोर से निकालकर बाबूजी ने अपने पलंग पर दीवार के सहारे रख लिया है। अपने कमरे में अब वे कुर्सी पर कम, पलंग पर मसनद से पीठ टिकाकर ज्यादा बैठे नजर आने लगे हैं।
“पीठ में दर्द हो तो आपके लिए ‘मूव’ मँगा दूँ बाबूजी?” रमा ने मौका पाकर एक शाम उनसे पूछा।
“अरे नहीं,” वे बोले,“दर्द-उर्द कुछ नहीं है...इसे तो मैं ऐसे ही उठा लाया हूँ स्टोर से।”
“इनसे कहकर नया मसनद मँगवा दूँ बाजार से? ज्यादा आरामदायक रहेगा।” उसने पुनः पूछा।
“अरे नहीं बहू,” वे इस बार सीधा बैठते हुए बोले,“कहा न, भला-चंगा हूँ।”
उसके बाद रमा ने उनसे कुछ नहीं कहा। अलबत्ता पति को फोन करके ‘मूव’ की एक छोटी ट्यूब लेते आने को जरूर कह दिया। वह ले आया।
“किसके लिए चाहिए थी?” ट्यूब को पत्नी के हाथ में पकड़ाते हुए रवि ने पूछा।
“बाबूजी की कमर में दर्द है शायद।” वह बोली,“उनकी मेज पर रख आती हूँ। जरूरत समझेंगे तो लगाते रहेंगे।” इतना कहकर वह बाबू जी के कमरे की ओर बढ़ गई।
कमरे में कदम रखते ही, बाहर से पड़ते हल्के प्रकाश में उसने देखा-सिरहाने से पीठ लगाए बाबू जी पलंग पर बैठे हैं। मसनद उनकी गोद में रखी है। उनकी आँखें मुँदी हैं और आँसुओं की अविरल धारा उनसे बह रही है।

सोमवार, जनवरी 16, 2012

अथ ध्यानम्/बलराम अग्रवाल


भालुका तीर्थ मन्दिर, सोमनाथ(गुजरात)                              चित्र:बलराम अग्रवाल
 आलीशान बंगला। गाड़ी। नौकर-चाकर। ऐशो-आराम। एअरकंडीशंड कमरा। ऊँची, अलमारीनुमा तिजौरी। करीने से सजा रखी करेंसी नोटों की गड्डियाँ। माँ लक्ष्मी की हीरे-जटित स्वर्ण-प्रतिमा।
दायें हाथ में सुगन्धित धूप। बायें में घंटिका। चेहरे पर अभिमान। नेत्रों में कुटिलता। होंठ शान्त लेकिन मन में भयमिश्रित बुदबुदाहट।
“नौकरों-चाकरों के आगे महनत को ही सब-कुछ कह-बताकर अपनी शेखी आप बघारने की मेरी बदतमीजी का बुरा न मानना माँ, जुबान पर मत जाना। दिल से तो मैं आपकी कृपा को ही आदमी की उन्नति का आधार मानता हूँ, महनत को नहीं। आपकी कृपा न होती तो मुझ-जैसे कंगले और कामचोर आदमी को ये ऐशो-आराम कहाँ नसीब था माँ। आपकी जय हो…आपकी जय हो।” 

गुरुवार, सितंबर 29, 2011

पेड़ बोलता है/बलराम अग्रवाल

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                                                                                    चित्र:आदित्य अग्रवाल
 पात्र—
दादाजी—नंदू के वृद्ध दादाजी, उम्र लगभग 60 वर्ष
नंदू—लगभग दस बरस का एक बालक
पेड़—किसी भी पेड़ की बड़ी-सी अनुकृति
पत्ता—एक हरे पत्ते की अनुकृति
कोमल पत्ती—एक कोमल-पत्ती की अनुकृति
टहनी—एक पतली टहनी की अनुकृति
फूल—उसी पेड़ के एक फूल की अनुकृति
फल— उसी पेड़ के एक फल की अनुकृति
छाल—उसी पेड़ के छाल की अनुकृति

पेड़ की एक बड़ी-सी अनुकृति मंच के बीचों-बीच खड़ी है। उसके पीछे उसके हरे पत्ते की, कोमल पत्ती की, पतली टहनी की, फूलों के गुच्छे की, फल की तथा छाल की अनुकृतियों को इस प्रकार खड़ा किया गया है कि सामने से दर्शकों को मात्र पेड़ ही नजर आता है। यह पेड़ निर्देशक अपनी सुविधा के अनुसार पीपल, आम, बरगद किसी का भी ले सकते हैं तथा उसके अंग बने अन्य पात्रों को मंच के दायें, बायें, पिछले या सामने वाले हिस्से से भी बारी-बारी मंच पर ला सकते हैं।
दादाजी गाते हुए मंच पर प्रवेश करते हैं।
दादाजी—पेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
उनके पीछे-पीछे ही बगल में एक चटाई दबाए नंदू भी यह पंक्ति दोहराता, मटकता हुआ प्रवेश करता है।
नंदू—पेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
दादाजी—(पीछे घूमकर उसकी ओर देखते हुए) अरे बदमाश तू भी आ गया?
नंदू—मम्मी ने आपके लेटने-बैठने के लिए चटाई देकर भेजा है।
दादाजी—बहुत अच्छा किया। आ, फिर मेरे साथ-साथ गा—पेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
नंदू—पेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
दादाजी—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
नंदू—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
दादाजी—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
नंदू—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
गाते-गाते ही वे दोनों पेड़ के नीचे एक चटाई बिछाकर उस पर बैठ जाते हैं।
दादाजी—नंदू, हमारे पूर्वज बहुत विद्वान थे बेटे।
नंदू—कितने विद्वान थे?
दादाजी—इतने…ऽ…कि दुनियाभर के पेड़-पौधे, सारी वनस्पतियाँ, उनके फूल, फल, बड़े-बड़े पहाड़, बहती हुई नदियाँ, उड़ती हुई चिड़ियाँ, यह घास (जमीन से उठाकर घास का एक तिनका नंदू को दिखाते हैं), यह मिट्टी (जमीन से उठाकर मुट्ठीभर मिट्टी नंदू को दिखाते हैं)—सारी चीजों से वे बातें करते थे और सारी चीजें उनसे बातें करती थीं।
नंदू—(व्यंग्यात्मक स्वर में) गिनाने से कोई नाम छूट तो नहीं गया दादाजी?
दादाजी—मजाक समझ रहा है?
नंदू—और नहीं तो क्या? बेजान और बेजुबान चीजों से कोई कैसे बातें कर सकता है?
दादाजी—क्यों नहीं कर सकता?
नंदू—अगर कर सकता होता तो ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ यह मुहावरा क्यों बनता।
दादाजी—इस मुहावरे का मतलब अलग है नंदू और मेरी बात का मतलब अलग।
नंदू—यह कैसे हो सकता है दादाजी कि ‘नॉन लिविंग’ यानी निर्जीव वस्तुएँ ‘लिविंग’ यानी जीवित वस्तु, आदमी से बातें करें?
दादाजी—तू तो विज्ञान का विद्यार्थी है न? उसमें तो वैज्ञानिकों ने जीवित और निर्जीव वस्तुओं के कुछ गुण बताए हुए हैं।
नंदू—सो तो है।
दादाजी—उनके आधार पर विज्ञान भी पेड़-पौधों को जीवित ही मानता है।
नंदू—मानता तो है, पर…
दादाजी—पर क्या?
नंदू—(कुछ सोचते हुए) देखो दादाजी, हमारे सिरहाने…ये खड़े हैं पेड़ बाबा, और आप है हमारे पूर्वज। ठीक है?
दादाजी—ठीक है।
नंदू—तो अब आप मेरे सामने पेड़ बाबा से बातें करके दिखाइए।
दादाजी—देखो बेटा, बातें करने के मतलब को समझो।
नंदू—समझाइए।
दादाजी—हमारे पूर्वजों ने अनेक प्रयोग करके बहुत-सी चीजों के गुणों की खोज की।
नंदू—सो तो आज के वैज्ञानिक भी करते हैं।
दादाजी—हाँ, लेकिन आज का वैज्ञानिक कहता है कि मैंने ‘इस’ वस्तु के या ‘इस’ प्राणी के इस गुण की खोज की।
नंदू—और पूर्वज क्या कहते थे?
दादाजी—वे कहते थे कि इस ‘पौधे’ ने या इस ‘पेड़’ ने या इस ‘बेजुबान प्राणी’ ने मुझसे बातें कीं और अपने बारे में मुझे ये-ये बातें बताईं।
नंदू—बात तो वही हुई न।
दादाजी—नहीं। बात वही नहीं हुई। आज का वैज्ञानिक अगर मनुष्य पर भी शोध करता है, तो उसे वह ‘निर्जीव वस्तु’ मानकर चलता है।
नंदू—और पूर्वज क्या मानकर चलते थे?
दादाजी—सजीव। सही बात तो यह है नंदू कि भारतीय दर्शन इस पूरी सृष्टि में एक कण को भी ‘निर्जीव’ मानता ही नहीं है।
नंदू—जी।
दादाजी—इसीलिए मनुष्य की या पशुओं-पक्षियों जैसे चलने-फिरने-बोलने वाले जीवों की तो बात ही छोड़ो, वे अगर नदियों पर, पेड़-पौधों पर, पत्थरों पर, अलग-अलग जगह की मिट्टी जैसी निश्चल वस्तुओं पर भी शोध करते थे तो उन्हें ‘निर्जीव वस्तु’ नहीं ‘सजीव और प्राणवान’ मानकर चलते थे।
नंदू—हूँ…ऽ…इसीलिए कहते थे कि इसने मुझसे और मैंने इससे बातें कीं।
दादाजी—बिल्कुल ठीक। …और, अब देखो, यह पेड़ तुमसे और तुम इस पेड़ से बातें करोगे।
यों कहते हुए दादाजी पेड़ की अनुकृति के पीछे जाकर खड़े हो जाते हैं।
पेड़ बाबा—हलो नंदू। मैं हूँ हरा-भरा सुगंधित हवा और ठंडी छाया देता हुआ पेड़।
नंदू अपने दोनों हाथ हवा में फैलाकर ऐसे साँस लेता है जैसे उसे वाकई बहुत सुगंधित और शीतल वायु मिल गई हो।
नंदू—प्रणाम करता हूँ पेड़ बाबा।
पेड़ बाबा—सदा स्वस्थ रहो बेटा।
नंदू—पेड़ बाबा, आप अपने बारे में कुछ बताइए न।
पेड़ बाबा—क्या बताऊँ? ज्यादातर तो लोग हमें काठ और ईंधन देने वाला ही समझते हैं।
नंदू—बिल्कुल गलत। मेरे दादाजी कहते हैं कि पेड़ बड़े दयावान होते हैं।
पेड़ बाबा—देखो बेटा, धरती पर जितने भी पेड़ हैं, उन सबके छ: अंग अवश्य होते हैं और वे सब के सब उपयोगी होते हैं।
नंदू—(आश्चर्य से) पेड़ों के अंग भी होते हैं?
पेड़ बाबा—हाँ नंदू। सबसे पहले—जड़।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर जड़ की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—फिर छाल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर छाल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—शाखा यानी टहनी।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर टहनी की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—पत्ते।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर हरी व कोमल पत्तियों की अनुकृतियाँ मंच पर सामने आ जाती है।

पेड़ बाबा—फूल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर फूल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—और फल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर फल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबा—सभी पेड़ों के ये छ: अंग अवश्य होते हैं। लेकिन किसी-किसी के कम या ज्यादा भी होते हैं।
नंदू—जैसे?
पेड़ बाबा—जैसे किसी-किसी पेड़ को दाढ़ी भी होती है।
नंदू—पेड़ों को दाढ़ी-मूछें भी आती हैं?
पेड़ बाबा—दाढ़ी-मूँछें नहीं, सिर्फ दाढ़ी। तुमने बरगद के पेड़ तो देखे ही हैं न। उनके तनों और शाखाओं से लम्बे-लम्बे रेशे जमीन की ओर लटक रहे होते हैं।
नंदू—हाँ।
पेड़ बाबा—उन्हें ही बरगद की दाढ़ी कहा जाता है। किसी-किसी पीपल की तथा कुछ दूसरे पेड़ों की भी दाढ़ी आती है।
नंदू—और फूल?
पेड़ बाबा—प्रकृति का नियम है नंदू कि पेड़-पौधों पर पहले फूल आएगा, फिर फल। लेकिन, पीपल और बरगद के पेड़ की यह विशेषता है नंदू कि इनकी डालियों पर फूल नहीं आते, सीधे फल ही आते हैं।
नंदू—यह तो कमाल की बात है!
पेड़ बाबा—मेरी एक बात और गाँठ में बाँध लो।
नंदू—कौन-सी बात को?
पेड़ बाबा—देखो बेटा, कोई कितना भी बुजुर्ग क्यों न हो, उसकी बताई बातों को जब तक उस विषय के किसी विशेषज्ञ से निश्चित न कर लो, तब तक उन पर अमल मत करो। मेरी बातों पर भी।
नंदू—क्यों?
पेड़ बाबा—तुमने ‘नीम हकीम खतरा-ए-जान’ वाली कहावत तो सुनी ही होगी?
नंदू—(हँसता है) ही-ही-ही…
पेड़ बाबा—हँस क्यों रहे हो?
नंदू—हमारी कक्षा में वो चंदू है न, उसने टीचरजी को इसका अर्थ बताया कि—ए हकीम, इस नीम से तेरी जान को खतरा है। उसका उलटा जवाब सुनकर टीचरजी ने उसे कक्षा के बाहर खड़ा कर दिया था।
पेड़ बाबा—इस मुहावरे का सही अर्थ यह है बेटा कि आधी-अधूरी जानकारी रखने वाला हकीम मरीज की जान के लिए खतरा होता है। उसकी सलाह और दवाइयाँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और जानलेवा हो सकती हैं।
नंदू—मैं समझ गया।
इसी के साथ दादाजी पेड़ के पी्छे से निकलकर नंदू के निकट आ जाते हैं और कहते हैं—
दादाजी—पेड़ दयावान ही नहीं, परोपकारी भी होते हैं नंदू। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि—पेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
नंदू—पेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
दादाजी—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
नंदू—पेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
दादाजी—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
नंदू—पेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
अंतिम पंक्तियों के साथ ही प्रकाश मद्धिम होता जाता है।
दृश्य समाप्त