बुधवार, जून 09, 2010

निवारण/बलराम अग्रवाल

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राजनीतिक-गर्दिश का दौर था। संकट-निवारण के उद्देश्य से पिता ने हवन का आयोजन किया। उसमें अपने कुल-देता की प्रतिमा को उसने हवन-स्थल पर स्थापित किया। और, प्रतिमा के एकदम बाईं ओर उसके बेटों ने एक विचित्र-सा मॉडल लाकर रख दिया।
यह क्या है? पिता ने पूछा।
बचपन में संगठन के महत्व को समझाने के लिए आपने एक बार लकड़ियों के एक गट्ठर का प्रयोग किया था पिताजी। बड़े पुत्र ने उसे बताया,आपकी उस शिक्षा को हमने आत्मसात कर लिया। और तभी-से, आराध्य के रूप में इस मॉडल को अपना लिया।
उफ्। पिता ने अपने माथे पर हाथ मारा और वहीम बैठ गया। मौजूदा संकट का कारण पार्टी के बाहर नहीं, पार्टी के भीतर, या कहूँ कि घर के ही भीतर मौजूद है… वह बुदबुदाया,कुल-देवता ने बड़ी कृपा की कि सही समय पर इस सच पर से परदा हटा दिया। इसके साथ ही वह देवता की प्रतिमा के आगे दण्डवत बिछ गया।
अरे मूर्खो! जो बताया जा रहा होता है, सिर्फ उसी को सुनना सीखे हो? लानत है। जो घट रहा है, गुजर रहा है, उस पर भी निगाह डालनी सीखो।…मैंने लकड़ियों का एक गट्ठर तुमको दिया था? देवता के अभिवादन से उठते हुए वह चीखा।
जी! बेटों ने स्वीकारा।
…और उसको तोड़ने के लिए बोला था?
जी।
…और जब तुममें-से कोई भी उसको न तोड़ पाया तो उस गट्ठर को खोलकर उसकी एक-एक लकड़ी को तुम्हें सौंप दिया था। पिता बोला,क्या हुआ था तब?
तब हम भाइयों ने पलक झपकते ही अपने-अपने हिस्से की लकड़ी को तोड़ डाला था। सभी बेटे एक-स्वर में बोले।
और तब आपने समझाया था कि एकता में ही बल है, एक रहना सीखो। अंत में मँझले बेटे ने अपना वाक्य जोड़ा।
चुप! चुप!! पिता एकदम-से उस पर झल्ला उठा। बोला,कुछ बातें बिना बोले भी कही और सुनी जाती हैं मूर्ख। मैंने बोला और तुमने सुना, बस? क्या तुमने यह नहीं देखा कि मैंने अच्छे-खासे बँधे-बँधाए गट्ठर को खोल डाला था? उसकी लकडियों को अलग-अलग कर डालने का मेरा करिश्मा तुमने नहीं देखा? एकता में शक्ति की बात भूल जाओ। याद रखो, मैंने हमेशा तुम्हें खोलने और तोड़ने की ही शिक्षा दी है। इन दिनों गहरे संकट में फँसा हूँ। बंधनों-गठबंधनों को खोलना शुरू करो। एक-एक आदमी को तोड़ो। मेरी शिक्षा के फैलाव को पहचानो…जा…ऽ…ओ…।

बुधवार, मार्च 31, 2010

माँ नहीं जानती फ्रायड/बलराम अग्रवाल


माँ…ऽ…! जैसे कुछ देखा ही न हो वैसे पुकारते हुए वह माँ के कमरे की ओर बढ़ा, ताकि उसके पहुँचने तक माँ सँभलकर बैठ जाए।
लेकिन माँ ज्यों की त्यों बैठी रही।
श्श्श्श्श! अपने होठों पर तर्जनी को खड़ी करने के बाद उसने हथेली के इशारे से उसे आवाज को धीमी रखने का इशारा किया।
माँ का इशारा पाकर वह दोबारा नहीं चीखा।
यह क्या कर रही हो माँ! माँ के पास पहुँचते-पहुँचते उसने लगभग उग्र स्वर में सवाल किया।
धीमे बोल…बड़ी मुश्किल-से आँखें लगी हैं बच्ची की, जाग जाएगी। उसके सवाल का जवाब दिए वगैर माँ ने फुसफुसाकर उसे डाँटा।
मैं पूछ रहा हूँ…ऽ…ये कर क्या रही हो? भले ही फुसफुसाकर, लेकिन उग्र स्वर में ही उसने अपने सवाल को दोहराया।
देख नहीं रहा है? माँ ने मुस्कराकर कहा।
देख रहा हूँ इसीलिए तो पूछ रहा हूँ।
सीमा से जो काम नहीं हो पा रहा है, वह कर रही हूँ।
कैसी तोहमत लगा रही हो माँ! वह पत्नी का पक्ष लेते हुए बोला,एक घण्टा पहले खुद मेरी आँखों के सामने पिंकी को दूध पिलाया है उसने।
दूध पिलाया है…छाती से नहीं लगाया। माँ मुस्कराते हुए भी गंभीर स्वर में बोली,बोतल मुँह में लगाने से बच्चे का सिर्फ पेट भरता है, नेह नहीं मिलता।
माँ की इस बात का वह तुरन्त कोई जवाब नहीं दे पाया।
बुढ़ापे की छातियाँ हैं बेटे। सो चुकी पिंकी को आँचल के नीचे से निकालकर बिस्तर पर लिटाते हुए माँ ने अपने बयान को जारी रखा,दूध एक बूँद भी नहीं है इनमें; लेकिन नेह भरपूर है।
माँ की सहजता को देख-सुनकर उसमें उसे थोड़ी देर पहले के अपने संकोच के विपरीत ममताभरी युवा-माँ दिखाई देने लगी।
तू जो इतना बड़ा होकर भी माँ-माँ करता चकफेरियाँ लगाता फिरता है मेरे आसपास, वो इन छातियों से लगाकर पालने का ही कमाल है मेरे बच्चे। उसके सिर पर हाथ फिराकर माँ बोली,छाती से लगकर बच्चा हवा से नहीं, माँ के बदन से साँस खींचता है…तू पिंकी की फिकर मत कर, इसे मैं अपने पास ही सुलाए रखूँगी…जा।
माँ की इस बात को सुनकर उसने अगल-बगल झाँका। वहाँ सिर्फ वह था और माँ थी। माँ! वह सिर्फ इतना ही बोल पाया। सदा-सदा से पूजनीया माँ की इस मुद्रा को देखकर उसके गले में तरलता आ गई। इस युवावस्था में भी माँ के आगे वह बच्चा ही हैउसे लगा; और यह भी कि वृद्धा-माँ में युवा-माँ हमेशा जीवित रहती है।

सोमवार, मार्च 01, 2010

सुंदरता/बलराम अग्रवाल

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ड़की ने काफी कोशिश की लड़के की नजरों को नजर-अन्दाज करने की। कभी वह दाएँ देखने लगती, कभी बाएँ। लेकिन जैसे ही उसकी नजर सामने पड़ती, लड़के को अपनी ओर घूरता पाती। उसे गुस्सा आने लगा। पार्क में और भी स्टुडैंट्स थे। कुछ ग्रुप्स में तो कुछ अकेले। सब के सब आपस की बातों में मशगूल या पढ़ाई में। एक वही था, जो खाली बैठा उसको तके जा रहा था।
गुस्सा जब हद से ऊपर चढ़ आया तो लड़की उठी और लड़के के सामने जा खड़ी हुई।
ए मिस्टर! वह चीखी।
वह चुप रहा और पूर्ववत ताकता रहा।
जिन्दगी में इससे पहले कभी लड़की नहीं देखी है क्या? उसकी ढीठता पर वह पुन: चिल्लाई।
इस बार लड़के का ध्यान टूटा। उसे पता चला कि लड़की उसी पर नाराज हो रही है।
घर में माँ-बहन हैं कि नहीं? लड़की फिर भभकी।
सब हैं, लेकिन आप गलत समझ रही हैं। इस बार वह अचकचाकर बोला,मैं दरअसल आपको नहीं देख रहा था।
अच्छा! लड़की व्यंग्यपूर्वक बोली।
आप समझ नहीं पायेंगी मेरी बात। वह आगे बोला।
यानी कि मैं मूर्ख हूँ!
मैं खूबसूरती को देख रहा था। उसके सवाल पर वह साफ-साफ बोला,मैंने वहाँ बैठी निर्मल खूबसूरती को देखा, जो अब वहाँ नहीं है।
अब वो यहाँ है। उसकी धृष्टता पर लड़की जोरों से फुंकारी,बहुत शौक है खूबसूरती देखने का तो अम्मा से कहकर ब्याह क्यों नहीं करा लेते हो।
मैं शादी-शुदा हूँ और एक बच्चे का बाप भी। वह बोला,लेकिन खूबसूरती किसी रिश्ते का नाम नहीं है। किसी एक चीज या किसी एक मनुष्य में भी वह हमेशा ही कैद नहीं रहती। अब आप ही देखिए, कुछ समय पहले तक आप निर्मल सौंदर्य का सजीव झरना थींअब नहीं हैं।
उसके इस बयान से लड़की झटका खा गई।
नहीं हूँ तो न सही। तुमसे क्या? वह बोली।
लड़का चुप रहा और दूसरी ओर कहीं देखने लगा। लड़की कुछ सुनने के इन्तजार में वहीं खड़ी रही। लड़के का ध्यान अब उसकी ओर था ही नहीं। लड़की ने खुद को घोर उपेक्षित और अपमानित महसूस किया और बदतमीज कहीं का कहकर पैर पटकती हुई वहाँ से चली गई।

शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2010

जानवर/बलराम अग्रवाल

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लॉन में बैठे वे आसमान को ताक रहे थे। इस हालत में उनसे कुछ अर्ज़ करने की जुर्रत ननुआ नहीं कर सकता था। ध्यान भंग करने से उस पर वे पूरी तरह झल्ला पड़ते। अनजाने ही ऐसा करके उनकी झल्लाहट को वह कई बार झेल चुका था। उसका दुखी मन इस समय वह सब झेलने की हालत में नहीं था। मन मारकर एक ओर को बैठ गया।
दसेक मिनट ऐसे ही बीत गए। कल्पनालोक से उतरकर आखिर वे ज़मीन पर आये। ननुआ को सामने बैठा देखकर चौंक पड़े; बोले,अरे! तू कब आया?
ज्यादा देर नहीं हुई सरकार। ननुआ ने हाथ जोड़े।
बोल।
आप कोई गहरी बात सोच रहे थे… अपना दर्द बयान करने से पहले ननुआ ने उन्हीं की बात सुनना ज़रूरी समझा।
हाँ… वे पुन: आसमान की ओर देखते हुए बोले,ऊपर हजारों चीलें उड़ती हैं। उनमें से सैकड़ों कभी-न-कभी बीट-पेशाब छोड़ती ही रहती होंगी।…मैं दरअसल सोच रहा था कि…पता नहीं कहाँ-कहाँ गिरता होगा वह सब! यों कहते हुए उन्होंने अपने सिर पर रखे ओढ़ावन को ठीक किया, फिर एकाएक ननुआ से पूछ बैठे,कभी तेरा ध्यान गया इस ओर?
बीट-पेशाब पर तो हमारा ध्यान कभी गया नहीं, ससुरा जहाँ गिरता हो, गिरा करे… ननुआ उनके इस सवाल पर तपाक-से बोला,दुनिया हम गरीबों के सिर पर मूत रही है तो इन चील-कौऔं के मूतने की ही क्या फिक्र-शिकायत करें। हाँ, एक-साथ ज्यादा चीलों को एक ही जगह पर मँडराते देखते हैं तो…किसी गरीब का जनावर जाता रहा शायदमन में यही ख्याल पहले आता है मालिक। इतना कहते-कहते अपने सिर पर से साफी उतारकर उसने दोनों हथेलियों से अपने मुँह में ठूँस ली, फिर भी रुलाई को न रोक सका। रोते-रोते ही बोला,अपना भीमा कल रात…
कभी ऊँचा नहीं सोच सकते…जानवर के जानवर रहेंगे हमेशा। उसकी बात को पूरा सुनने से पहले ही वे भुनभुनाहटभरे स्वर में बुदबुदाए और उसको वहीं रोता छोड़कर हवेली के भीतर घुस गए।

रविवार, जनवरी 31, 2010

युद्धखोर मुर्दे/बलराम अग्रवाल


लॉन छोड़कर हम अन्दर की ओर उठ चले। नरेश और सुरेश ने लपककर तभी खाली हुई कोने वाली एक मेज पर कब्जा जमा लिया। उनके पीछे-पीछे मैं भी एक सीट पर जा बैठा।
असल आजादी के लिए संघर्ष अभी शेष है पत्रकार महोदय! हमारे बाईं ओर वाली सीट पर बैठे सिगारधारी सज्जन ने मेज थपककर प्रभावपूर्ण स्वर में कहा तो मेरा सिर उन्हीं की ओर घूम गया—“और उसे मैं अन्त तक जारी रखूँगा। वह बोले।
वह तो रखनी ही चाहिए। पत्रकार महोदय ने कहा—“लेकिन व्यवस्था-परिवर्तन हेतु तैयार की गई हमारी संघर्ष-वाहिनी के तहत यह संघर्ष करो तो हम सब तुम्हारे साथ हैं।
मुझे मंजूर है। भयंकर झंझावात में घिरे अपने हाथों में अनायास आ गये किसी सहारे की तरह उन्होंने तपाक-से पत्रकार महोदय का हाथ अपने हाथों में दबोच लिया।
सिगार से दागेंगे गोली! साले कायर…!! इस बार सुरेश की बुदबुदाहट ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया—“कॉफी-हाउस की मेजों पर बैठे ये मुर्दे इस देश में पता नहीं कब युद्ध की योजनाओं से मुक्त होंगे?
मुद्दा तो इनका ठीक ही है। नरेश बोला—“जरूरत उस आदमी की है जो यहाँ से बाहर सड़क पर इन्हें इकट्ठा कर सके।
आजादी पाने के लिए जिंदादिलों की दरकार होती है नरेश।
उसी स्वर में तमककर सुरेश बोला—“और उन्हें बाड़े में कैद बकरियों की तरह हाँककर सड़क पर नहीं लाना पड़ता।
मेरा ख्याल है कि हमें अब चलना चाहिए। बहस को तूल पकड़ता महसूस कर मैंने उठते हुए कहा—“ऐसी मन:स्थिति में मुझे नहीं लगता कि हम अपने मामले पर विचार कर पायेंगे।
सुरेश और नरेश भी चुपचाप वहाँ से उठ लिए। हालाँकि मेरी तरह ही वे भी अच्छी तरह जानते थे कि हम जब भी, जहाँ भी विमर्श के लिए मिलेंगे, मुर्दे हमारे चारों ओर युद्ध की योजनाओं में मशगूल होंगे।

बुधवार, जनवरी 13, 2010

मुलाकातें/बलराम अग्रवाल

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हैलो!
हैलो!
कब तक खामोश रहोगी?
शादी होने तक।
कल, मैं शाम तक यहीं पर टहलता रहा।
सच!
तुम्हारे बिना पागल-सा महसूस करता हूँ।
लेकिन…परसों तो तुमने कहा था कि तुम्हें देखते ही मैं पागल हो जाता हूँ?
महसूस करना अलग बात है, हो जाना अलग।
तुम्हें पाने के लिए मैं सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ।
दहेज भी?
दहेज सब कुछ नहीं होता…इसलिए उसे छोड़ने का सवाल ही कहाँ पैदा होता है।
सुनो, टी वी की बजाय डैडी से तुम्हें ए सी माँगना चाहिए।
वही तो माँगा है।
हाथों-हाथ कार भी कह देते…तो…घूमने-फिरने में…।
कमाल है! हर चीज माँगने से ही मिलेगी? तुम्हारे डैडी अपनी तरफ-से कुछ नहीं देंगे?
तुम समझती क्यों नहीं हो?
मैं क्यों समझूँ तुम्हारा आदर्शवाद?
मैंने दहेज लेने से इंकार किया है, शादी करने से नहीं।
वह शुभ-काम…लगता है मुझे करना पड़ेगा।…कल मैं नहीं आ पाऊँगी।
मैं भी।
परसों मिलोगे?
न…हाँ…दरअसल…।
शादी कहीं-और तय हो गई है क्या? किससे?
कुछ देर ठहरो। वह यहीं पर आती होगी।
वैरी गुड! अभी कुछ देर बाद मेरे भी वुड-बी हस्बैंड उस पेड़ के नीचे पहुँचने वाले हैं!
काफी देर कर दी।
वह भी अभी तक पेड़ के नीचे नहीं पहुँचे।
तुम्हारे साथ डेटिंग बहुत अच्छी रहीएकदम लव-अफेअर जैसी।
लो, वह आ गए।
कमाल है, उनके साथ वाली लड़की के साथ ही तो मेरी शादी तय हुई है!
ये भी डेटिंग खत्म करके आ रहे लगते हैं।
शायद।

सोमवार, नवंबर 16, 2009

दिल्ली वाले/बलराम अग्रवाल


ले ही उसने शराब न पी रखी हो, लेकिन हाव-भाव से वह नशे में ही नजर आ रहा था। आँखें बाहर को उबली पड़ रही थीं। चेहरे पर तनाव था और शरीर में कम्पन। सभा-भवन में घुसते ही वह चिल्लाया—“ओए…,तुम में दिल्ली से आया हुआ कौन-कौन है?
हालाँकि वह खाली हाथ था। न कोई पिस्तौल, न चाकू-छुरा, न डण्डा-लाठी। लेकिन उसकी आवाज़ बेहद धारदार थी। सभा-भवन में मौजूद हर शख्स का चेहरा उसकी ओर घूम गया। बातचीत पर विराम लग गया। सन्नाटा छा गया।
एक जगह खड़े होकर उसने भीतर बैठे समस्त प्रतिनिधियों पर अपनी उबाल-खायी आँखें दौड़ायीं, जैसेकि दिल्ली से आने वाले प्रतिनिधियों को वह देखते ही पहचान लेगा और घसीटकर बाहर फेंक देगा।
बदतमीजी और दादागीरी से लबालब थी उसकी यह हरकत। वहाँ मौजूद करीब-करीब हर आदमी का चेहरा तमतमा उठा। संयोजकों में से एक ने हालात की नाजुकता को भाँप लिया। वह फुर्ती-से उठा और पास जाकर संयत स्वर में उससे पूछा,क्या हुआ कामरेड!…किस दिल्ली वाले को ढूढ़ रहे हैं आप?
किसी खास को नहीं…सभी को। वह बोला,जो-जो भी दिल्ली से आया है, उसे बाहर निकालो इस हॉल से…।
आखिर हुआ क्या? इस बीच एक अन्य संयोजक ने वहाँ पहुँचकर पूछा,किसी दिल्ली वाले ने कुछ उलट-सुलट कर दिया क्या?


इस मीटिंग को अगर सफल बनाना है कामरेड, तो दिल्ली से आए हर आदमी को यहाँ से बाहर करना ही होगा। वह बोला।
लेकिन क्यों कामरेड!…आखिर बात क्या है?
दिल्ली का आदमी… वह किंचित उत्तेजित आवाज में बोला,सभा के बीच में बैठकर लफ्जों की मिसाइलें तो दाग सकता है, लेकिन मैदान में कदम से कदम और कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चल सकता…।
संयोजक चुपचाप उसकी दलील को सुनते रहे।
लफ्जों के लुभावने जाल से अपनी मीटिंग और आन्दोलन को बचाना है…उसे ठोस रूप देना है, तो दिल्ली की हवा से इसे दूर रखना होगा कामरेड! अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वह निर्णायक अन्दाज़ में प्रतिनिधियों से बोला; फिर देश के हर प्रांत से आए, हॉल में बैठे प्रतिनिधियों पर चीखा,सुना नहीं क्या? …दिल्ली से जो-जो भी आया है, बाहर निकल जाओ…!


मंगलवार, अक्टूबर 20, 2009

बीती सदी के चोंचले/बलराम अग्रवाल

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इमाम साहब…दरवाज़ा खोलिए इमाम साहब…जरा जल्दी बाहर आइए…!
सुबह की नमाज का वक्त अभी ठीक-से हुआ भी नहीं था कि आठ-दस लोगों की भीड़ ने इमाम साहब का दरवाज़ा पीट डाला।
इमाम साहब करीब-करीब तैयार थे। लोगों की पुकार सुनते ही दरवाजा खोलकर सामने आ गए।
मैं तो आ ही रहा था निकलकर… वह हैरानी भरे अन्दाज़ में बोले,क्या हुआ?
मस्जिद की सीढ़ियों पर सुअर काटकर फेंक रखा है किसी काफिर ने…! कई लोग एक साथ चीखे।
इस बदतमीजी का मज़ा चखना पड़ेगा हरामियों को…। एक आवाज़ आई।
उन्होंने मस्जिद को नापाक किया है…हम उनकी गली-गली, घर-घर को रंग डालेंगे…। एक और आवाज़ आई।
इस बीच दो-चार लोग और आ मिले भीड़ में।
चुप रहो…खामोश हो जाओ। इमाम साहब सख्ती से बोले।
हम…दहशत और दबाव में नहीं जी सकते…। बीच में से कोई एक बोला।
इमाम साहब ने एक निगाह आवाज़ वाली जगह पर डाली। अपने गुस्से पर काबू पाया। फिर बड़ी ठण्डी आवाज़ में बोले,बेवकूफ़ हैं वो, जो इस नई सदी में भी पिछली सदी के चोंचलों पर अटके पड़े हैं।…और उनसे ज्यादा बेवकूफ़ हैं आपजो इन छोटे-मोटे टोटकों पर उछल-उछल पड़ते हैं। अक्लमंदी यह है कि जिसने भी दंगा फैलाने का यह प्रपंच रचा है, उसे उसके मक़सद में क़ामयाब मत होने दो। जाओ, और मस्जिद की सीढ़ियों को धोकर साफ कर दो। ठहरो, मैं भी साथ चलता हूँ…।

मंगलवार, जून 30, 2009

अकेले भी जरूर घुलते होंगे पिताजी/बलराम अग्रवाल

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पाँच सौ…पाँच सौ रुपए सिर्फ…यह कोई बड़ी रकम तो नहीं है, बशर्ते कि मेरे पास होतीअँधेरे में बिस्तर पर पड़ा बिज्जू करवटें बदलता सोचता हैदोस्तों में भी तो कोई ऐसा नजर नहीं आता है जो इतने रुपए जुटा सके…सभी तो मेरे जैसे हैं, अंतहीन जिम्मेदारियों वाले…लेकिन यह सब माँ को, रज्जू को या किसी और को कैसे समझाऊँ?…समझाने का सवाल ही कहाँ पैदा होता है…रज्जू अपने ऊपर उड़ाने-बिगाड़ने के लिए तो माँग नहीं रहा है रुपए…फाइनल का फार्म नहीं भरेगा तो प्रीवियस भी बेकार हो जाएगा उसका और कम्पटीशन्स में बैठने के चान्सेज़ भी कम रह जाएँगे…हे पिता! मैं क्या करूँ…तमसो मा ज्योतिर्गमय…तमसो मा…।
सुनो! अचानक पत्नी की आवाज सुनकर वह चौंका।
हाँ! उसके गले से निकला।
दिनभर बुझे-बुझे नजर आते हो और रातभर करवटें बदलते…। पत्नी अँधेरे में ही बोली, हफ्तेभर से देख रही हूँ…क्या बात है?
कुछ नहीं। वह धीरे-से बोला।
पिताजी के गुजर जाने का इतना अफसोस अच्छा नहीं। वह फिर बोली,हिम्मत से काम लोगे तभी नैय्या पार लगेगी परिवार की। पगड़ी सिर पर रखवाई है तो…।
उसी का बोझ तो नहीं उठा पा रहा हूँ शालिनी। पत्नी की बात पर बिज्जू भावुक स्वर में बोला,रज्जू ने पाँच सौ रुपए माँगे हैं फाइनल का फॉर्म भरने के लिए। कहाँ से लाऊँ?…न ला पाऊँ तो मना कैसे करूँ?…पिताजी पता नहीं कैसे मैनेज कर लेते थे यह सब!
तुम्हारी तरह अकेले नहीं घुलते थे पिताजी…बैठकर अम्माजी के साथ सोचते थे। शालिनी बोली,चार सौ के करीब तो मेरे पास निकल आएँगे। इतने से काम बन सलता हो तो सवेरे निकाल दूँगी, दे देना।
ठीक है, सौ-एक का जुगाड़ तो इधर-उधर से मैं कर ही लूँगा। हल्का हो जाने के अहसास के साथ वह बोला।
अब घुलना बन्द करो और चुपचाप सो जाओ। पत्नी हिदायती अन्दाज में बोली।
बात-बात पर तो अम्माजी के साथ नहीं बैठ पाते होंगे पिताजी। कितनी ही बार चुपचाप अँधेरे में ऐसे भी अवश्य ही घुलना पड़ता होगा उन्हें। शालिनी! तूने अँधेरे में भी मुझे देख लिया और मैं…मैं उजाले में भी तुझे न जान पाया! भाव-विह्वल बिज्जू की आँखों के कोरों से निकलकर दो आँसू उसके कानों की ओर सरक गए। भरे गले से बोल नहीं पा रहा था, इसलिए कृतज्ञता प्रकट करने को अपना दायाँ हाथ उसने शालिनी के कन्धे पर रख दिया।
दिन निकलने को है। रातभर के जागे हो, पागल मत बनो। स्पर्श पाकर वह धीरे-से फुसफुसाई और उसका हाथ अपने सिर के नीचे दबाकर निश्चेष्ट पड़ी रही।

गुरुवार, मई 28, 2009

अपनी-अपनी जमीन/बलराम अग्रवाल


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बुरा तो मानोगे…मुझे भी बुरा लग रहा है, लेकिन…कई दिनों तक देख-भाल लेने के बाद हिम्मत कर रही हूँ बताने की…सुनकर नाराज न हो जाना एकदम-से…। नीता ने अखबार के पन्ने उलट रहे नवीन के आगे चाय का प्याला रखते हुए कहा और खुद भी उसके पास वाली कुर्सी पर बैठ गई।
कहो। अखबार पढ़ते-पढ़ते ही नवीन बोला।
पिछले कुछ दिनों से काफी बदले-बदले लग रहे हैं पिताजी… वह चाय सिप करती हुई बोली, शुरू-शुरू में तो नॉर्मल ही रहते थेसुबह-सवेरे घूमने को निकल जाना, लौटने के बाद नहा-धोकर मन्दिर को निकल जाना और फिर खाना खाने के बाद दो-चार पराँठे बँधवाकर दिल्ली की सैर को निकल जाना। लेकिन…
लेकिन क्या? नवीन ने पूछा।
अब वह कहीं जाते ही नहीं हैं!…जाते भी हैं तो बहुत कम देर के लिए। वह बोली।
इसमें अजीब क्या है? अखबार को एक ओर रखकर नवीन ने इस बार चाय के प्याले को उठाया और लम्बा-सा सिप लेकर बोला, दिल्ली में गिनती की जगहें हैं घूमने के लिए…और पिताजी-जैसे ग्रामीण घुमक्कड़ को उन्हें देखने के लिए वर्षों की तो जरूरत है नहीं…वैसे भी, लीडो या अशोका देखने को तो पिताजी जाने से रहे…मन्दिर…या ज्यादा से ज्यादा पुरानी इमारतें,बस। सो देख ही डाली होंगी उन्होंने।
सो बात नहीं। नीता उसकी ओर तनिक झुककर किंचित संकोच के साथ बोली,मैंने महसूस किया है…कि…अपनी जगह पर बैठे-बैठे उनकी नजरें…मेरा…पीछा करती हैं…जिधर भी मैं जाऊँ!
क्या बकती हो!
मैंने पहले ही कहा थानाराज न होना। वह तुरन्त बोली,आज और कल, दो दिन तुम्हारी छुट्टी है…खुद ही देख लो, जैसा भी महसूस करो।
यों भी, छुट्टी के दिनों में नवीन कहीं जाता-आता नहीं था। स्टडी-रूम, किताबें और वह्। पिछले कई महीनों से पिताजी उसके पास ही रह रहे हैं। गाँव में सुनील है, जो नौकरी भी करता है और खेती भी। माँ के बाद पिताजी कुछ अनमने-से रहने लगे थे, सो सुनील की चिट्ठी मिलते ही नीता और वह गाँव से उन्हें दिल्ली ले आये थे। यहाँ आकर पिताजी ने अपनी ग्रामीण दिनचर्या जारी रखी, सो नीता को या उसको भला क्या एतराज होता। जैसा पिताजी चाहते, वे करते। लेकिन अब! नीता जो कुछ कह रही है…वह बेहद अजीब है। अविश्वसनीय। वह पिताजी को अच्छी तरह जानता है।
आदमी कितना भी चतुर क्यों न हो, मन में छिपे सन्देह उसके शरीर से फूटने लगते हैं। इन दोनों ही दिन नीता ने अन्य दिनों की अपेक्षा पिताजी के आगे-पीछे कुछ ज्यादा ही चक्कर लगाए; लेकिन कुछ नहीं। उसके हाव-भाव से ही वह शायद उसके सन्देहों को भाँप गए थे। अपने स्थान पर उन्होंने आँखें मूँदकर बैठे या लेटे रहना शुरू कर दिया।…लेकिन इस सबसे उत्पन्न मानसिक तनाव के कारण रविवार की रात को ही उन्हें तेज बुखार चढ़ आया। सन्निपात की हालत में उसी समय उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना जरूरी हो गया। डॉक्टरों और नर्सों ने तेजी-से उनका उपचार कियाइंजेक्शन्स दिये, ग्लूकोज़ चढ़ाया और नवीन को उनके माथे पर ठण्डी पट्टियाँ रखते रहने की सलाह दी…तब तक, जब तक कि टेम्प्रेचर नॉर्मल न आ जाए।
करीब-करीब सारी रात नवीन उनके माथे पर बर्फीले पानी की पट्टियाँ रखता-उठाता रहा। सवेरे के करीब पाँच बजे उन्होंने आँखें खोलीं। सबसे पहले उन्होंने नवीन को देखा, फिर शेष साजो-सामान और माहौल को। सब-कुछ समझकर उन्होंने पुन: आँखें मूँद लीं। फिर धीमे-से बुदबुदाये,कहीं कुछ खनकता है…तो लगता है कि…पकी बालियों के भीतर गेहूँ खिलखिला रहे हैं…वैसी आवाज सुनकर अपना गाँव, अपने खेत याद आ जाते हैं बेटे…।
यानी कि नीता की पाजेबों में लगे घुँघरुओं की छनकार ने पिताजी के मन को यहाँ से उखाड़ दिया! उनकी बात सुनकर नवीन का गला भर आया।
आप ठीक हो जाइए पिताजी… वह बोला,फिर मैं आपको सुनील के पास ही छोड़ आऊँगा…गेहूँ की बालें आपको बुला रही हैं न…मैं खुद आपको गाँव में छोड़कर आऊँगा…आपकी खुशी, आपकी जिन्दगी की खातिर मैं यह आरोप भी सह लूँगा कि…छह महीने भी आपको अपने साथ न रख सका…। कहते-कहते एक के बाद एक मोटे-मोटे कई जोड़ी आँसू उसकी आँखों से गिरकर पिताजी के बिस्तर में समा गए।
पिताजी आँखें मूँदे लेटे रहे। कुछ न बोले।

सोमवार, मई 04, 2009

दु:ख के दिन/बलराम अग्रवाल


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बाकी बची माँसो चार-चार महीना वह बारी-बारी से सबके साथ रह लेगी। सम्पत्ति के मौखिक बँटवारे के बाद बड़े ने माँ के प्रति तीनों भाइयों की जिम्मेदारी तय करते हुए सुझाया।
यह तो माँ को अलग-अलग खूँटों से बाँधनेवाली बात हुई! मँझले ने टोका,तर्क के तौर पर ठीक सही, शिष्टता के तौर पर कोई कभी भी इसे ठीक नहीं ठहरा सकता।
बँटवारे जैसे छोटे काम के लिए माँ की मौत का इंतजार करना भी तो शिष्टता की सीमा से बाहर की बात है। छोटा तुनककर बोला।
माँ के रहते ऐसा करने शायद बड़ा शिष्टाचार है! मँझले ने व्यंग्य कसा।
छोटा तीखे स्वभाववाला व्यक्ति था। संयोगवश पत्नी भी वैसी ही मिल जाने के कारण माँ उसके पास एक-दो दिन से ज्यादा टिक नहीं पाती थी। इसलिए माँ के रख-रखाव का मुद्दा उसके लिए पूरी तरह निरर्थक था। सम्पत्ति के बँटवारे से अलग किसी-और समय यह विवाद उठा होता तो अब तक वह कभी का उठकर जा भी चुका होता।
ठीक है। माँ के बारे में आप दोनों बड़े जो भी फैसला करेंगे, मुझे मंजूर है। मँझले के व्यंग्य से आहत हो वह दो-टूक बोला।
सम्पत्ति के बँटवारे पर बहस के समय इससे पहले तो इसने एक बार भी ऐसा अधिकार हमें नहीं दिया था!बड़े ने अपना माथा मला।
नन्ने! काफी देर सोचने के बाद वह मँझले से बोला।
जी भैया!
तीन बेटे और थोड़ी-सी सम्पत्ति होने का दण्ड माँ को सुबह के दीये-जैसी उपेक्षित जिन्दगी तो नहीं मिलना चाहिए।
मैं तो शुरू से ही आपको यह समझा रहा हूँ भैया! बड़े की बात पर भावावेशवश मँझले की आँखें और गला भर आए।
सवाल यह है कि बँटवारे की यह नौबत हमारे बीच बार-बार आती ही क्यों है? बड़े ने सवाल किया। फिर आगे बोला,हम अगर किसी अच्छे काम के लिए एक जगह बैठें तो माँ बेहद खुश हो। वह भी हमार पास बैठे, हँसे-बोले।…लेकिन, हालत यह है कि हम एक जगह बैठे नहीं कि माँ डर ही जाती है।
मँझला और छोटा सिर झुकाए बड़े की बातें सुनते रहे।
तू वाकई मेरे फैसले को मानेगा न? बोलते-बोलते बड़ा छोटे से मुखातिब हुआ।
जी भैया। छोटे ने धीमे-स्वर में हामी भरी।
और तू भी? बड़े ने मँझले से पूछा।
हाँ भैया। वह बोला।
तब, सबसे पहली बात तो यह कि हमारे बीच जो कुछ भी अब से पहले हुआ, उसे भूल जाओ। माँ को जिससे दु:ख पहुँचता हो, वैसा कोई काम हमें नहीं करना है।
जी भैया!
आओ! बड़े ने दोनों भाइयों को अपने पीछे आने का इशारा किया। तेजी-से चलते हुए तीनों भाई गाँव से बाहर, नहर के किनारे उदास बैठी माँ के पीछे जा खड़े हुए। बँटवारे के सवाल पर जब-भी वे एकजुट होते, वह यहाँ आ रोती थी।
बहते पानी के आगे दु:खड़ा रोने के तेरे दिन खत्म हुए माँ! उसके बूढ़े कंधों पर अपनी अधेड़ हथेलियाँ टिकाकर बड़ा रूँधे शब्दों को मुश्किल-से बाहर ठेल पाया,घर चल!
माँ ने गरदन घुमाई। तीनों बेटों को साथ खड़े देखा। नहर के पानी से उसने आँसू-भरी अपनी आँखें धोईं। धोती के पल्लू से उन्हें पोंछा और तीनों बेटों को अपने अंक में भर लिया, हर बार की तरह।

मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

बदलेराम/बलराम अग्रवाल

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कीचड़-भरे गड्ढों के जाल के कारण कार को और-आगे लेजाना सम्भव नहीं था। गाँव से करीब दो किलोमीटर पहले ही ड्राइवर को कार के साथ छोड़कर मैं और बदलेराम अन्य कार्यकर्ताओं के साथ पैदल ही उस ओर चल दिए।
सुनो, इस गाँव की मुख्य-समस्या क्या है? गाँव के लोगों को उनकी जरूरतों के माध्यम से भावुक बनाकर अपने पक्ष में करने की नीति निर्धारित करने के उद्देश्य से मैंने बदलेराम से पूछा।
सबसे आगे चल रहा बदलेराम सवाल सुनकर एकाएक रुक गया। मेरी ओर वापस घूमकर बोला,पानी…पानी इस गाँव की मुख्य समस्या है, लेकिन आपको उससे क्या?
मैं उनको सिंचाई के लिए नलकूप लगवा देने का आश्वासन दूँगा।
नलकूप…! बेहद जहरीले तरीके से मुस्कराया बदलेराम। बोला,बिना बिजली के कैसे चलेगा वह?
ठीक है, बिजली की लाइन खिंचवा देने का ही सही।
यह झाँसा भी तो तीस साल पुराना हो गया है उनके लिए!
यानी…गाँवभर में नल-कुएँ-बावड़ी…
यह भी। वह दो-टूक बोला।
ठीक है, मैं उनके लिए गाँव के किनारे-किनारे नहर खुदवा देने का वादा करता हूँ। इस बार तनिक अतिरिक्त विश्वास के साथ मैंने कहा।
मेरे इस लहजे ने बदलेराम को प्रभावित करना तो दरकिनार, उल्टे क्षुब्ध कर दिया। मेरी तरह बाहर से लाया गया गँवई उम्मीदवार तो वह था नहीं। पार्टी का कर्मठ कार्यकर्ता था। चलते-चलते वह पुन: मेरी ओर घूम गया। बोला,एक-दो नहीं, कम-से-कम दस चुनाव सिर पर से गुजर गए हैं…वोटर अब उतना कच्चा नहीं रहा, पक गया है पूरी तरह। वोट लेने के लिए…
रुको! राजनीति के गुर बघारने को उद्यत बदलेराम अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि एक खेत के किनारे बैठे चरवाहा किस्म के कुछ युवकों में से एक ने हाँक लगाई और उठकर हमारे पास चला आया।
तुममें से बदलेराम कौन है? उसने कड़क आवाज में पूछा।
उसकी आतंकवादी मुद्रा देखकर बदलेराम की तो जैसे घिग्घी ही बँध गई। मैं भी डर गया।
क्…क्…कौन बदलेराम? कुछ हिम्मत जुटाकर मैंने पूछा।
वही…जिस साले ने आजादी की हवा तक नहीं पहुँचने दी गाँव में। कभी कमल लेकर आजाता है, तो कभी हाथ का पंजा…कभी हाथी, साइकिल, मशाल, लालटेन…। युवक रोषपूर्वक बोला,तुम सब भी सुनो, वोट के वास्ते आने वालों की अगवानी के लिए गाँव के हर मकान की छत पर बच्चे हाथों में ढेले लिए खड़े हैं…।
भय और आश्चर्य से हमारे मुँह उसकी ओर उठ गए। वह उपेक्षापूर्वक हमारी ओर पीठ किए बैठे अपने साथियों के साथ जा बैठा।

शुक्रवार, अप्रैल 10, 2009

एक और देवदास/बलराम अग्रवाल


सुनो मिस्टर! कंधे पर खादी का थैला लटकाए घूमते चश्माधारी महाशय को उस नवयुवती ने अपनी ओर आने का इशारा किया।
जी। पास आकर वह बोले।
मुझे ताकते हुए मेरे आसपास मँडराते रहने का तुम्हारा मक़सद क्या है?
जी, कुछ खास नहीं। आपके बारे में सोचते रहना मुझे अच्छा लगता है, बस। वह बोले।
तब तो मेरा साथ भी जरूर चाहते होगे?…मैं तुम्हारे घर रहने को तैयार हूँ। उसने मुस्कराकर कहा।
जी नहीं। वह तपाक-से बोले,मेरा शगल आपके बारे में सोचनाभर है, आपसे उलझ जाना नहीं।
अच्छा! जानते हो लोग मुझे…
समस्या…समस्या नाम से जानते हैं, जानता हूँ। तभी तो…तभी तो मुझे अच्छा लगता है आपके बारे में सोचते रहना। वह अकड़कर बोले।
समझी। क्या आप अपना परिचय देंगे?
जी हाँ, क्यों नहीं। लोग मुझे बुद्धिजीवी कहते हैं।

गुरुवार, मार्च 26, 2009

ज़हर की जड़ें/बलराम अग्रवाल



फ्तर से लौटकर मैं अभी खाना खाने के लिए बैठा ही था कि डॉली ने रोना शुरू कर दिया।
अरे-अरे-अरे, किसने मारा हमारी बेटी को? उसे दुलारते हुए मैंने पूछा।
डैडी, हमें स्कूटर चाहिए। सुबकते हुए ही वह बोली।
लेकिन तुम्हारे पास तो पहले ही बहुत खिलौने है!
इस पर उसकी हिचकियाँ बँध गईं। बोली,मेरी गुड़िया को बचा लो डैडी!
बात क्या है? मैंने दुलारपूर्वक पूछा।
पिंकी ने पहले तो अपने गुड्डे के साथ हमारी गुड़िया की शादी करके हमसे हमारी गुड़िया छीन ली… डॉली ने जोरों से सुबकते हुए बताया,अब कहती हैदहेज में स्कूटर दो, वरना आग लगा दूँगी गुड़िया को।…गुड़िया को बचा लो डैडी…हमें स्कूटर दिला दो।
डॉली की सुबकियाँ धीरे-धीरे तेज होती गईं और शब्द उसकी हिचकियों में डूबते चले गए।

रविवार, मार्च 15, 2009

हड़बड़ी/बलराम अग्रवाल



रेलवे के ओवरब्रिज पर चढ़ते ही उसने संकेत-पट्टिकाओं की ओर नजरें उठा दीं। नीचे पैर दौड़ रहे थे, ऊपर नजरें। प्लेटफॉर्म नंबर पाँच की संकेत-पट्टिका पर नजर पड़ते ही उसकी नजर नीचे, प्लेटफॉर्म पर जा कूदीं। ट्रेन अभी रुकी खड़ी थी। शुक्र है ऊपरवाले काउसने मन ही मन सोचा। चाल खुद-ब-खुद कुछ-और बढ़ गई।
सीढ़ियाँ उतरकर प्लेटफॉर्म पर पाँव रखते ही उसने सामने खड़े कम्पार्टमेंट पर नजर डाली। एस-5। एस-9 किधर होगा--दाएँ या बाएँ? एक पल ठिठककर उसने सोचा, फिर दाएँ डिब्बे की ओर बढ़ गया। एस-4। उसे देखते ही वह पीछे की ओर पलट गया।
उसकी नजर सामने इलैक्ट्रॉनिक घड़ी पर चली गई21:20।
गाड़ी छूटने का समय हो गया! एस-9 तक पहुँचने के लिए उसे पूरे पाँच कम्पार्टमेंट की दूरी तय करनी है। फेफड़ों ने साँसों को अब जल्दी-जल्दी फेंकना शुरू कर दिया था। पैर उखड़ने लगे थे। दिमाग के चकराने जैसे आसार महसूस होने लगे थे। आँखों के आगे अँधेरे के तिलमिले-से तैरने लग थे। लेकिन वह हाँफता-हड़बड़ाता चलता रहा। रुका नहीं।
एकाएक उसे खयाल आया कि सारे के सारे स्लीपर-कोच इंटर-कनेक्टेड होते हैं। ट्रेन छूटने का समय हो चुका था। उससे उत्पन्न तनाव के चलते वह एस-7 में ही चढ़ गया। ट्रेन के मिस हो जाने का खतरा अब खत्म हो गया था। अन्दर ही अन्दर आगे बढ़ते हुए खुद को उसने काफी तनावमुक्त महसूस किया। फिर भी, चाल में तेजी अभी बरकरार थी। आखिरकार वह सीट नंबर 63 के पास पहुँच गया। हाथ में थामे ब्रीफकेस और कंधे पर लटके बैग को उसने नीचे टिका दिया।
सीट पर एक पहलवाननुमा महाशय पसरे हुए थे।
यह सीट खाली करेंगे, प्लीज़!`` साँस जब कुछ जुड़ गई तो उसने उन महाशय से कहा।
क्यों?
यह एस-9 ही है न? उसने आश्वस्त होने की दृष्टि से पूछा।
जी हाँ।
तब यह 63 नम्बर की बर्थ मेरी है। कहते हुए उसने जेब से अपना टिकट निकालकर उन महाशय की आँखों के आगे कर दिया।
उन्होंने टिकट को अपने हाथ में पकड़ा। देखा। परखा। फिर मुसकराकर उसे लौटाते हुए बोले,जनाब,आपकी सारी बातें ठीक हैं सिवाय गाड़ी के।
क्या मतलब? उसने चौंककर पूछा।
मतलब यह कि आपको इस में नहीं, उस सामने वाली ट्रेन में सवार होना थाइंदौर एक्सप्रेस में।
सामने वाली ट्रेन न सिर्फ चल चुकी, बल्कि रफ्तार भी पकड़ चुकी थी। इस ट्रेन की खिड़की से वह मुँह बाए उस ट्रेन को जाते देखता रहा।
तो यह इंदौर एक्सप्रेस नहीं है? उसने मरी आवाज में उन महाशय से पूछा,हर बार तो वह इसी प्लेटफॉर्म पर खड़ी की जाती है!
यह स्वर्ण जयंती है। वह बोले,चढ़ने से पहले उद्घोषणा पर भी कान दे लेते एक बार तो…। अब उतरिए, यह गाड़ी भी चल दी है…।