चलते-चलते वे रुक गये।
मेरा हाथ पकड़कर उपदेशक के अंदाज में बोले :
“जीवन, चलने और चलते रहने का नाम है!…लेकिन ‘चलने’ से तात्पर्य सिर्फ ‘पैर’ नहीं है, ‘साँस’ भी है!”
“साँस!” मेरे मुँह से अनायास निकला।
“हाँ, उसका चलते रहना जीवन के लिए जरूरी है!”
“लेकिन, ‘साँस’ का चरित्र तो एकदम अनोखा होता है आचार्य जी!” मैंने कहा।
“साँस के चरित्र में अनोखापन?” वे अपने आचार्यत्व को मुझ पर हावी करते हुए बोले, “हो ही नहीं सकता!”
“होता है, मान जाइए!” मैं मुस्कुराया।
“जो हो नहीं सकता, उसे मैं मान कैसे सकता हूँ?” वे नाराजगी भरे स्वर में बोले।
“कभी-कभी साँस रुकती नहीं, चलते-चलते चली…ऽ…जाती है!” मैं हँसा।
आचार्य जी मेरा मुँह ताकते रह गये।
इस बार मैंने उनका हाथ पकड़ा और हँसते हुए कहा, “चलो, चलते हैं!”
✺21-6-2025/09:40
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