गुरुवार, अगस्त 01, 2013

देवों की घाटी/बलराम अग्रवाल



मित्रो, 'कथायात्रा' में 29 जनवरी,2013 से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' को प्रस्तुत करना शुरू किया था। प्रस्तुत है उक्त उपन्यास की सातवीं कड़ी
गतांक से आगे
                                                                                                                                          (सातवीं कड़ी)
                                                                         चित्र:बलराम अग्रवाल
‘‘सड़क के उस पार चायवाले ने दुकान खोल ली है।’’ अल्ताफ ने सुधाकर से पूछा,‘‘आप कहें तो मैं चाय पी आऊँ?’’
‘‘हाँहाँ, ज़रूर।’’ सुधाकर ने कहा,‘‘…और, वो अगर यहाँ देने आ सके तो दो चाय हमारे लिए भी भेजवा देना।’’
‘‘जी।’’ कहकर वह चला गया।
उसके जाते ही सुधाकर ने धीमेसे आवाज़ देकर ममता को जगा दिया। जागते ही उसने अचरज से चारों ओर देखा, फिर पूछा,‘‘कौनसी जगह है?’’
‘‘नजीबाबाद का आउटर है।’’ सुधाकर ने बताया।
‘‘गाड़ी यहाँ क्यों रोक दी?’’ ममता ने दूसरा सवाल किया।
‘‘अल्ताफ को फ्रेश होने जाना था इसलिए।’’
‘‘बाबूजी किधर हैं?’’
‘‘अल्ताफ के बाद वो फ्रेश होने गए हैं।’’
‘‘मुझे क्यों जगाया?’’
‘‘अल्ताफ ने बाबूजी को घुट्टी पिला दी है कि यहीं फ्रेश हो लो। यहाँ फ्री है, आगे पैसे खर्च करने पड़ेंगे।’’
‘‘हे भगवान! आपको तो पता है कि मुझे चाय पिये बिना प्रेशर बनता नहीं है।’’
‘‘मँगा ली है, लाता ही होगा।’’ शरारती मुस्कान के साथ सुधाकर बोले।
‘‘आप भी बस…’’ ममता नाराजगी भरे स्वर में बोली।
‘‘मैं भी बस नहीं, बाबूजी भी बस…’’ सुधाकर अपना बचाव करते हुए बोले, ‘‘मेमसाब, इस समय हम सफर में हैं वो भी बाबूजी के साथ। एक कहानी सुनाकर सुबहसुबह मुझे बेवकूफकहने का अपना पैतृकअधिकार तो वे जता ही चुके हैं। इसलिए घर की बातें घर पर। यहाँ वो…जो बाबूजी हुक्म करें। चायवाला चाय लेकर आने वाला है। सुस्ती छोड़ो और तनकर बैठ जाओ। थोड़ी ही देर में बाबूजी भी आते ही होंगे।’’
ममता ने गहरी अँगड़ाई लेकर सुस्ती को जैसे दूर फेंक दिया और सीट पर सीधी बैठ गई।
चायवाला जल्दी ही दो गिलासों में चाय लेकर दौड़ता चला आया। सुधाकर के हाथों में गिलास पकड़ाते हुए उसने पूछा,‘‘बिस्कुट वगैरा कुछऔर लेंगे साब?’’
‘‘नहीं।’’ सुधाकरजी ने कहा।
‘‘कोई बात नहीं…’’ गाड़ी में सोते बच्चों की ओर देखकर उसने पूछा,‘‘बच्चालोगों के लिए भी बनाऊँ?’’
‘‘वो अभी सो रहे हैं।’’ सुधाकर ने टाला।
‘‘कोई बात नहीं…’’ वह दाँत निपोरतासा बोला,‘‘जाग जाएँ तो आवाज़ लगा देना। दो मिनट में बना लाऊँगा।’’
यों कहकर वह चला गया।
वे दोनों चाय पीने लगे। अल्ताफ चायवाले के खोखे के पास पड़ी लकड़ी की बेंच पर ही बैठ गया था।
ममता और सुधाकर ने अपनीअपनी चाय खत्म करके गिलास अभी नीचे रखे भी नहीं थे कि दादाजी आ गए। उनके हाथों में चाय के गिलास देखकर एकदमसे बोले,‘‘अरे वाह, यहाँ भी बेडटी मिल गई!’’
‘‘जी बाबूजी, आपके आशीर्वाद से।’’ ममता ने कहा,‘‘पाँव छूती हूँ।’’
‘‘सदा सुखी रहो बेटा।’’ दादाजी बोले,‘‘देर न करो, जल्दी जाओ। मैं इस बीच बच्चों को जगाता हूँ।’’
‘‘बच्चों को सोने दीजिए बाबूजी।’’ ममता ने कहा,‘‘ये लोग तो वैसे भी देर तक सोने के आदी हैं।’’
‘‘देर तक सोने के आदी घर में हैं या सफ़र में?’’ दादाजी तीखे स्वर में बोले,‘‘इनकी बात तुम मुझ पर छोड़ दो और इस बुद्धू को लेकर फ्रेश होने को जाओ।’’
ममता ने सुधाकर की ओर देखा और केवल मुस्कराकर रह गईं। सुधाकर भी चुपचाप टॉयलेट्स की ओर बढ़ गए।

‘‘मणिकानिक्की! उठो।…उठो बेटे, देखो नजीबाबाद आ गया।’’ उनके चले जाने के बाद दादाजी ने सीटों पर पसरे पड़े बच्चों को जगाने के लिए हिलाना शुरू कर दिया।
‘‘नजीबाबाद!…यहाँ से बद्रीनाथ कितनी दूर है दादाजी?’’ थोड़ीबहुत कुननमुनन करने के बाद निक्की ने फुर्ती के साथ बैठते हुए पूछा।
‘‘वह तो अभी बहुत दूर है।’’ दादाजी बोले,‘‘तुम लोग फटाफट पेस्ट वगैरा से निबटो।…दिन अभी निकल ही रहा है बेटे। देर करोगे तो टॉयलेट के बाहर लाइन लगनी शुरू हो सकती है। सफर के दौरान इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए।’’
‘‘पहले आप हो आइए न दादाजी।’’ मणिका अपनी सीट पर करवट बदलकर बोली,‘‘जैसे ही आप आएँगे, हम चले जाएँगे।’’
‘‘अरे, तू भी जाग गई चुहिया?’’
‘‘गुड मार्निंग दादाजी।’’ वह आलस्यभरी आवाज़ में बोली।
‘‘वेरी गुड मार्निंग बेटा। मैं तो हो भी आया। कुल्लामंजन करके मुँहहाथ धोकर एकदम तैयार खड़ा हूँ तुम्हारे सामने।’’ दादाजी बोले।
‘‘ठीक है, पहले मैं जाता हूँ।’’ निक्की खड़ा होकर बोला।
‘‘बड़ा फुर्तीला बच्चा है।’’ दादाजी खुश होकर बोले,‘‘अभी रुक थोड़ी देर, मम्मीपापा गए हुए हैं उन्हें आने दो, तब जाना।…या फिर ऐसा कर, तू जा।’’
‘‘मेरा ब्रश, पेस्ट, तौलिया और साबुन किधर है दादाजी ?’’ निक्की ने पूछा।
‘‘उस सूटकेस के भीतर, एकदम उ़पर।’’
सामान लेकर निक्की टॉयलेट की ओर बढ़ गया।
‘‘गाड़ी यहाँ कितनी देर रुकेगी दादाजी?’’ मणिका ने पूछा।
‘‘कुछ देर तो रुकेगी ही। क्यों ?’’
‘‘नजीबाबाद के बाद कोटद्वार ही आएगा न,  प्लेन का आखिरी स्टेशन?’’
‘‘ठीक कहा। वहीं से हम उत्तराखण्ड राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं।’’ दादाजी बोले।
‘‘कोटद्वार में भी कुछ देखने लायक स्थान हैं दादाजी?’’ उठकर सीट पर सीधी बैठते हुए मणिका ने पूछा।
‘‘देखने लायक भी और जानने लायक भी।’’ दादाजी बोले,‘‘लो, निक्की तो इतनी जल्दी लौट भी आया। उधर तुम्हारी मम्मी शायद तुम्हारे इन्तज़ार में खड़ी रह गई है, अब तुम जाओ।’’
‘‘जाती हूँ लेकिन मेरे आने तक भैया को आप कुछ नहीं बतायेंगे दादाजी।’’ मणिका अधिकारपूर्वक बोली और टॉयलेट की ओर चल दी।
‘‘दीदी, तेरा ब्रशपेस्ट।’’ गाड़ी के निकट आकर निक्की ने सूटकेस को देखा और मणिका का ब्रश उठाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।
मणिका ब्रश लेकर आगे बढ़ गई।
अल्ताफ अभी भी चायवाले की बेंच पर ही बैठा था। वह दरअसल, इन लोगों के पूरी तरह तैयार होने का इन्तज़ार कर रहा था। दादाजी ने जैसे ही मणिका को टॉयलेट से बाहर आकर ब्रश करते देखा, आवाज़ लगाकर तीन चाय ले आने का ऑर्डर चायवाले को दे दिया। जैसा कि उसने कहा था, अगले दो ही मिनट में तीन गिलास चाय लेकर वह उपस्थित हो गया।
‘‘बच्चालोग के लिए बिस्कुट वगैरा कुछ लाऊँ साबजी?’’ चाय का एक गिलास दादाजी के हाथ में पकड़ाते हुए उसने पूछा।
‘‘वह सब है हमारे पास।’’ दादाजी ने कहा,‘‘वैसे भी इतनी सुबह ये लोग कुछ खायेंगे नहीं।’’
गाड़ी में पहले रखे चाय के खाली गिलासों को लेकर वह चला गया।
‘‘अब बताइए दादाजी।’’ मणिका चाय की चुस्की लेकर बोली।
‘‘अभी नहीं।’’ दादाजी बोले,‘‘गाड़ी चलना शुरू होगी तब।’’
वह बेचारी चुप हो गई। ममता और सुधाकर इस दौरान इधरउधर चहलकदमी करने लगे थे।
दोनों बच्चों ने अपनेअपने गिलास की चाय खत्म की। दादाजी ने भी। वहीं बैठेबैठे उन्होंने अल्ताफ को इशारा किया, अल्ताफ ने चायवाले को। वह दौड़कर आया और खाली गिलासों को हाथ में पकड़ते हुए अल्ताफ की ओर इशारा करके बोला,‘‘पैसे उन्होंने दे दिये हैं साबजी।’’
‘‘ठीक है।’’ दादाजी ने कहा।
अल्ताफ को चायवाले के पास से उठकर गाड़ी की ओर बढ़ता देखकर ममता और सुधाकर भी चले आए।
गाड़ी आगे चल दी।
बच्चों ने उत्सुकतापूर्वक दादाजी के चेहरे को निहारना शुरू किया।
आगामी अंक में जारी

सोमवार, जुलाई 15, 2013

देवों की घाटी / बलराम अग्रवाल



मित्रो, 'कथायात्रा' में 29 जनवरी,2013 से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' को प्रस्तुत करना शुरू किया था। प्रस्तुत है उक्त उपन्यास की छठी कड़ी
गतांक से आगे
                                                                                                                                            (छठी कड़ी)
                                                 चित्र:बलराम अग्रवाल
कमाल हो गया। कंकाल पर खाल का आवरण चढ़ गया। सबके देखतेदेखते वह कंकाल एक बब्बर शेर का शव बन गया।
अरे वाह! देखो मैं भी अपनी विद्या में सफल हो गया।कहता हुआ वह खुशी से उछल पड़ा। अपने दो साथियों के प्रयोग की सफलता को देखकर तीसरे ब्राह्मणपुत्र के मन में भी अपनी विद्या के प्रदर्शन का भाव जाग उठा। वह बोला—‘तुम दोनों ने अपनीअपनी विद्या की परख सफलतापूर्वक कर ली। अब मेरी बारी है।
हाँहाँ, क्यों नहीं।वे दोनों बोले, लेकिन चौथे ने टोका—‘तुम क्या करोगे?’
मैं अपनी विद्या से इस शव में प्राण डाल दूँगा।तीसरा बोला।
यह शव बकरी का नहीं, शेर का है मेरे भाई। प्राण डाल दोगे तो यह हमें खा नहीं जाएगा?’ चौथे ने चेताया।
अपने जीवनदाताओं को ही खा जाएगा!!पहले दो एक साथ बोल उठे,‘आदमी जितना कृतघ्न प्राणी नहीं होता शेर।
अरे छोड़ो।तीसरा उपहासपूर्वक बोला,‘यह तो दो पोथियाँ ज्योतिष और भविष्यवाणी की पढ़कर आया है। इस बेचारे को प्राणिशास्त्र का क्या पता?’ यह कहकर उसने कमण्डल से थोड़ा जल अपनी दायीं हथेली में डालकर मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया।
रुको,’ चौथा बोला,‘पहले आप सब उस पेड़ पर चढ़ जाओ। इतने भयंकर जानवर को जीवित करने का खतरा यों ही मत उठाओ।
हमारा यह कुछ नहीं बिगाड़ने वाला।वे हँसकर बोले,‘तूने इस पर कोई अहसान नहीं किया इसलिए यह तुझे ही खाएगा। जा, उस पेड़ पर चढ़ जा।
            यह जानकर कि अपने ज्ञान के अहंकार में वे तीनों अपना विवेक खो चुके हैं, चैथा दौड़कर गया और पेड़ पर चढ़ गया। तीसरे ने उसके बाद मंत्र पढ़ा और हथेली में ले रखे जल को शेर के शव पर छिड़क दिया। शेर जीवित हो उठा। यह देखते ही तीसरा जोरों से चिल्लाया,‘मैंने कर दिखाया। देखो, मैंने कर दिखाया।
उसकी आवाज़ सुनकर शेर ने उधर गरदन घुमाई। तीन अनजान मनुष्यों को वहाँ खड़ा पाकर वह जोर से गुर्राया। उसने एक ही छलाँग में उन्हें धर दबोचा और खा गया।
यह कहानी सुनाकर दादाजी चुप हो गए।
‘‘फिर?’’ कुछ देर तक उनके पुन: बोलने का इंतज़ार करने के बाद सुधाकर ने पूछा।
‘‘तू निरा बुद्धू है।’’ इस सवाल से किलसकर दादाजी उन्हें झिड़कतेसे बोले,‘‘फिर क्या?…सीधीसादी बात है कि जो किताबी ज्ञान पर चलते थे, वे तीनों मारे गए और जो समझदारी का, अपने विवेक का सहारा लेकर पेड़ पर चढ़ गया था वो बच गया।’’
‘‘हाँ, लेकिन आपकी कहानी का उस बात से क्या सम्बन्ध है कि अल्ताफ पिछले किसी पेट्रोल पंप पर क्यों नहीं रुका?’’ सुधाकर ने पूछा।
‘‘कहानी उस बात पर नहीं, बल्कि तेरी इस बात पर सुनाई थी कि अल्ताफ ने पेट के प्रेशर को इतनी देर क्यों रोका जबकि बुजुर्गों ने किसी भी प्रेशर को रोकने की मनाही की हुई है।’’ बात में सुधार करते हुए दादाजी बोले।
‘‘चलिए, यही सही।’’
‘‘देखो, सबसे पहली बात तो यह है कि वह पेट के प्रेशर को कुछ देर तक बर्दाश्त कर सकने की हालत में था सो उसने उसे बर्दाश्त किया और यहाँ तक चला आया। अगर वह बुजुर्गों की कही बात पर यानी किताबी ज्ञान पर चलता तो बर्दाश्त करने न करने की बात ही खत्म हो जाती। गाड़ी को वह कहीं भी खड़ी करता और फ़ारिग हो लेता लेकिन उसे पता था कि उसकी गाड़ी में दो छोटे बच्चे, एक औरत और एक बूढ़ा आदमी बैठा है जो ख़तरा आने पर न तो ज़्यादा लड़  सकते हैं और न ही ज़्यादा भाग सकते हैं। रहा तुझजैसा जवान आदमी, सो तुझ पर वो इसलिए भरोसा नहीं कर सकता कि तू उसके लिए अनजान है। यही वजह है कि गाड़ी को उसने थोड़ा शहरी इलाका आ जाने पर रोका। आया समझ में?’’
‘‘बात तो आपकी ठीक है।’’ सहमति में सिर हिलाते हुए सुधाकर बोले।
‘‘देखो बेटा, ये लोग दिनरात सड़कों पर ही चलते हैं। हजार तरह के लोगों से रोजाना मिलते हैं, कितने ही अच्छेबुरे किस्से सुनते हैं। इसलिए छोटीछोटी बातों का ध्यान रखने की तमीज़ इनमें पैदा हो जाती है।’’ दादाजी ने बताया।
इसी दौरान अल्ताफ फ्रेश होकर लौट आया। आते ही बोला,‘‘सर, आप लोगों में से भी किसी को,  भाभीजी को, बच्चों को फ्रेश होकर आना हो तो हो आइए। यहाँ एकदम साफसुथरा और सुरक्षित है। आगे आपको या तो नदी किनारे या किसी होटल वगैरा में किराए का कमरा लेकर फ्रेश होने के लिए जाना पड़ेगा। वैसे तो 8–9 बजे तक हम श्रीनगर पहुँच ही जाएँगे।’’
‘‘सुनो,’’ उसकी बात सुनकर दादाजी ने सुधाकर से कहा,‘‘ठीक कहा इसने। पहले मैं फ्रेश हो आता हूँ। तब तक तुम बहू को जगाकर रखो। मेरे आने के बाद तुम दोनों चले जाना। बच्चों को अभी सोने दो, वापस आकर मैं जगा लूँगा।’’
‘‘जी, ठीक है।’’ सुधाकर ने कहा।
दादाजी गाड़ी से उतरकर उधर चले गए जिधर पहले अल्ताफ गया था।
आगामी अंक में जारी