गुरुवार, मार्च 26, 2009

ज़हर की जड़ें/बलराम अग्रवाल



फ्तर से लौटकर मैं अभी खाना खाने के लिए बैठा ही था कि डॉली ने रोना शुरू कर दिया।
अरे-अरे-अरे, किसने मारा हमारी बेटी को? उसे दुलारते हुए मैंने पूछा।
डैडी, हमें स्कूटर चाहिए। सुबकते हुए ही वह बोली।
लेकिन तुम्हारे पास तो पहले ही बहुत खिलौने है!
इस पर उसकी हिचकियाँ बँध गईं। बोली,मेरी गुड़िया को बचा लो डैडी!
बात क्या है? मैंने दुलारपूर्वक पूछा।
पिंकी ने पहले तो अपने गुड्डे के साथ हमारी गुड़िया की शादी करके हमसे हमारी गुड़िया छीन ली… डॉली ने जोरों से सुबकते हुए बताया,अब कहती हैदहेज में स्कूटर दो, वरना आग लगा दूँगी गुड़िया को।…गुड़िया को बचा लो डैडी…हमें स्कूटर दिला दो।
डॉली की सुबकियाँ धीरे-धीरे तेज होती गईं और शब्द उसकी हिचकियों में डूबते चले गए।

रविवार, मार्च 15, 2009

हड़बड़ी/बलराम अग्रवाल



रेलवे के ओवरब्रिज पर चढ़ते ही उसने संकेत-पट्टिकाओं की ओर नजरें उठा दीं। नीचे पैर दौड़ रहे थे, ऊपर नजरें। प्लेटफॉर्म नंबर पाँच की संकेत-पट्टिका पर नजर पड़ते ही उसकी नजर नीचे, प्लेटफॉर्म पर जा कूदीं। ट्रेन अभी रुकी खड़ी थी। शुक्र है ऊपरवाले काउसने मन ही मन सोचा। चाल खुद-ब-खुद कुछ-और बढ़ गई।
सीढ़ियाँ उतरकर प्लेटफॉर्म पर पाँव रखते ही उसने सामने खड़े कम्पार्टमेंट पर नजर डाली। एस-5। एस-9 किधर होगा--दाएँ या बाएँ? एक पल ठिठककर उसने सोचा, फिर दाएँ डिब्बे की ओर बढ़ गया। एस-4। उसे देखते ही वह पीछे की ओर पलट गया।
उसकी नजर सामने इलैक्ट्रॉनिक घड़ी पर चली गई21:20।
गाड़ी छूटने का समय हो गया! एस-9 तक पहुँचने के लिए उसे पूरे पाँच कम्पार्टमेंट की दूरी तय करनी है। फेफड़ों ने साँसों को अब जल्दी-जल्दी फेंकना शुरू कर दिया था। पैर उखड़ने लगे थे। दिमाग के चकराने जैसे आसार महसूस होने लगे थे। आँखों के आगे अँधेरे के तिलमिले-से तैरने लग थे। लेकिन वह हाँफता-हड़बड़ाता चलता रहा। रुका नहीं।
एकाएक उसे खयाल आया कि सारे के सारे स्लीपर-कोच इंटर-कनेक्टेड होते हैं। ट्रेन छूटने का समय हो चुका था। उससे उत्पन्न तनाव के चलते वह एस-7 में ही चढ़ गया। ट्रेन के मिस हो जाने का खतरा अब खत्म हो गया था। अन्दर ही अन्दर आगे बढ़ते हुए खुद को उसने काफी तनावमुक्त महसूस किया। फिर भी, चाल में तेजी अभी बरकरार थी। आखिरकार वह सीट नंबर 63 के पास पहुँच गया। हाथ में थामे ब्रीफकेस और कंधे पर लटके बैग को उसने नीचे टिका दिया।
सीट पर एक पहलवाननुमा महाशय पसरे हुए थे।
यह सीट खाली करेंगे, प्लीज़!`` साँस जब कुछ जुड़ गई तो उसने उन महाशय से कहा।
क्यों?
यह एस-9 ही है न? उसने आश्वस्त होने की दृष्टि से पूछा।
जी हाँ।
तब यह 63 नम्बर की बर्थ मेरी है। कहते हुए उसने जेब से अपना टिकट निकालकर उन महाशय की आँखों के आगे कर दिया।
उन्होंने टिकट को अपने हाथ में पकड़ा। देखा। परखा। फिर मुसकराकर उसे लौटाते हुए बोले,जनाब,आपकी सारी बातें ठीक हैं सिवाय गाड़ी के।
क्या मतलब? उसने चौंककर पूछा।
मतलब यह कि आपको इस में नहीं, उस सामने वाली ट्रेन में सवार होना थाइंदौर एक्सप्रेस में।
सामने वाली ट्रेन न सिर्फ चल चुकी, बल्कि रफ्तार भी पकड़ चुकी थी। इस ट्रेन की खिड़की से वह मुँह बाए उस ट्रेन को जाते देखता रहा।
तो यह इंदौर एक्सप्रेस नहीं है? उसने मरी आवाज में उन महाशय से पूछा,हर बार तो वह इसी प्लेटफॉर्म पर खड़ी की जाती है!
यह स्वर्ण जयंती है। वह बोले,चढ़ने से पहले उद्घोषणा पर भी कान दे लेते एक बार तो…। अब उतरिए, यह गाड़ी भी चल दी है…।



रविवार, मार्च 08, 2009

गाँव एक गहरा घड़ा है/बलराम अग्रवाल



ह कौन-सा चारा है, सर? ट्रक से गिराई जा रही पत्थर की रोड़ी की ओर इशारा करके चमचे ने सांसद महोदय से पूछा।
चारा नहीं, ये कंकड़ है गिरधर। नेताजी ने मुस्कराकर जवाब दिया,यहाँ से गाँव तक सड़क बनवा देने का वादा…।
सो तो मैं देख ही रहा हूँ, सर। गिरधर हें-हें करता हुआ बोला,लेकिन…
लेकिन क्या?
लेकिन यह कि…आपको जीत दर्ज किए अभी महीना भी नहीं गुजरा है। लोकसभा ढंग-से अभी गठित भी नहीं हो पायी है…और आप हैं कि चुनावी-वादों को पूरा करने में जुट गये हैं! काम करवाना शुरू कर दिया है इलाके में…!
काम करवाना नहीं, कंकड़ डलवाना… नेताजी ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ चमचे को टोका।
कंकड़ भी डलवाया तो सड़क बनवाने के लिए ही जा रहा है न!
सड़क बनवाने के लिए नहीं, बल्कि सड़क की शक्ल में गाँव तक इसे बिछवा देने के लिए…।
मतलब?
मतलब तू यों समझ कि गाँव एक गहरा घड़ा है और वोट इसमें भरा पानी हैं। अपनी बाँह को कन्धे तक इसके मुँह में डाल देने पर भी वोटों को पकड़ से दूर पाता हूँ। ये कंकड़ वोटों के तल को ऊपर लाने में मददगार सिद्ध होंगे।
यह सब तो मैं समझ रहा हूँ हुजूर, चमचा बोला,मैं तो सिर्फ यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि वोटों के तल को ऊपर लाने की कवायद इतनी जल्दी क्यों शुरू कर दी सरकार ने!
विरोधियों की कारगुजारियों पर लगाम कसे रखने के लिए यह कवायद बेहद जरूरी है गिरधर। नेताजी ने समझाया,अभी ये कंकड़ गिराये जा रहे हैं, अगले साल इन्हें बिछवाना शुरू किया जायेगा, उसके बाद उन्हें समतल करने का काम जारी होगा, चौथे साल…यों समझ ले कि पूरी पंचवर्षीय योजना है!
गजब! चमचे के मुँह से निकला।
और सड़क तो इस गाँव तक अगली पंचवर्षीय योजना के अंत तक ही पहुँच पायेगी। नेताजी ने कहा।
वह भी तब, जब उस बार भी आप ही जीतकर आवें। चमचे ने जोड़ा।
समझदार है! उसकी पीठ पर धौल जमाकर नेताजी मुस्कराये,चल, वापस चलते हैं।

शुक्रवार, फ़रवरी 27, 2009

यही होना है आखिरकार/बलराम अग्रवाल



हाप्रलय में लगातार ऊपर चढ़ रहे जल से अपने आप को बचाती दुनिया की आखिरी औरत एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ती चली गयी। कई दिनों बाद अन्धकार जब कुछ छँटता-सा लगा तो उसने एक नंग-धड़ंग और बदहाल पुरुष को अपनी ओर घिसटता आते पाया।
मेरी तलाश आखिर कामयाब साबित हुई। मुझे पूरा यकीन था कि महाप्रलय में सब-कुछ लील जाने के बावजूद ऊपरवाले ने मेरे लिए कम से कम एक औरत जरूर बचा रखी होगी। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि वह सब कुछ नष्ट कर सकता है, लेकिन आदम-जात को कभी भी पूरी तरह खत्म नहीं करता, क्योंकि यह उसकी सबसे बेहतरीन रचना है... औरत की आँखों में आँखें डालकर वह बोला।
नहीं, वह बात को बीच में ही काटकर बोली,दरअसल इंसान नहीं, उल्टे ऊपरवाला ही इंसान की सबसे ज्यादा स्वार्थ-भरी कल्पना है। और...।
और क्या...?
…और यह महाप्रलय इस कल्पना को विराम देने का सबसे अच्छा मौका है।
ईश्वर कल्पना नहीं यथार्थ है…।
यहाँ से लेकर दू्…ऽ…र उस छोर तक देख। एकाएक उसकी बायीं उँगलियों को अपने दायें पंजे में फँसाकर वह बोली,पर्वत की इस चोटी के अलावा हमारे टिकने के लिए धरती का कोई भी टुकड़ा कहीं नहीं बचा है!…आ, ठाठें मार रहे इस महासागर के जबड़ों में अपने आप को झोंक देते हैं।
लेकिन…! अपने हाथ को उसकी जकड़ से छुड़ाने की कोशिश करते पुरुष के कंठ से घिघियाई-सी आवाज निकली।
कोई लेकिन-वेकिन नहीं…वह कल्पना है या यथार्थ, अपने इस विश्वास को परखने का तेरे पास यह सबसे उपयुक्त और शायद आखिरी अवसर है… वह निर्णायक स्वर में बोली।
देखो, इस इकलौते ठिकाने से जानबूझकर मौत के मुँह में छलाँग लगाना किसी भी तरह बुद्धिमानीभरा कदम नहीं है। ऐसी बेवकूफियों का भगवान भी बुरा मानता है…। वह पुन: घिघियाया।
अगर बच गए तो यकीन मान, मैं बिना किसी उहापोह के अपना यह शरीर तुझे सौंप दूँगी… उसकी घिघियाहट पर ध्यान दिए बिना उसने बोलना जारी रखा,सिर्फ शरीर। लेकिन याद रखना कि बच जाने का इत्तफाक भी मेरी इस सोच को नहीं बदल पाएगा कि ईश्वर मनुष्य की सर्वाधिक स्वार्थभरी कल्पना है…इससे अधिक और कुछ नहीं।” 
इतना कहकर खुदा के उस खैरख्वाह का हाथ भरपूर मजबूती के साथ अपनी मुट्ठी में जकड़े खड़ी उस बहादुर औरत ने गहरी साँस ली। बेहद तीखी नजर उस परेशान-हैरान बन्दे के चेहरे पर डाली। फिर चीखी,आ…ऽ…! और एक झटके में उसे साथ लेकर उसने पर्वत के इकलौते शिखर से उबाल खा रही अथाह जलराशि में छलाँग लगा दी।
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रविवार, फ़रवरी 08, 2009

देश का सिपाही/बलराम अग्रवाल



मुजरिम को हवालात में करीबन दो हफ्ते बंद रखने के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जा सका। स्वाधीनता-समारोह के समापन में इतना समय लग जाना कोई बड़ी बात नहीं थी।
पुलिस ने कहाँ से गिरफ्तार किया तुम्हें? मजिस्ट्रेट ने पूछा।
जी, मानसरोवर पार्क से। वह बोला।
क्यों?
जी, मालूम नहीं।
इसमें लिखा है कि राष्ट्र-ध्वज का अपमान करते हुए तुम्हें रंगे हाथों पकड़ा गया।मजिस्ट्रेट ने आरोप-पत्र की ओर इशारा करके उसे बताया ।
पार्क में बैठकर योगासन करने से राष्ट्र-ध्वज का अपमान कैसे हो गया सर! वह चौंककर बोल उठा।
उसकी सफाई पर मजिस्ट्रेट का ध्यान जाए, उससे पहले ही उसके साथ आया कांस्टेबल हरकत में आ गया ।
एन स्वाधीनता-दिवस की सुबह यह आदमी राष्ट्र-ध्वज को लातें दिखा रहा था जनाब। वह मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होकर बोला,ऐसा करते हुए खुद मैंने इसे देखा और गिरफ्तार किया, सरकार।
उसके इस बयान से मजिस्ट्रेट की त्यौरियाँ चढ़ गईं। जहर-बुझी नजरों से उसने मुजरिम की ओर देखा।
जिस समय पुलिस ने मुझे पकड़ा, मैं शीर्षासन की मुद्रा में था सर। मुजरिम ने घिघियाई आवाज में सफाई दी।
सुन लीजिए...सुन लीजिए जनाब। कांस्टेबल तपाक से बोला,यह खुद ही अपने जुर्म का इकबाल कर रहा है।
कांस्टेबल की इस मुस्तैदी पर मुजरिम की जुबान बंद हो गई। अपने बचाव में क्या दलील दे, वह समझ नहीं पा रहा था।
लेकिन...उस पार्क में तो कोई राष्ट्र-ध्वज उस समय था ही नहीं सर! ध्यान आने पर वह एकाएक बोला।
उसकी इस बात पर मजिस्ट्रेट ने कांस्टेबल की ओर सवालिया निगाह डाली। वह थोड़ा सकपकाया। वाकई, उस पार्क में उस समय क्या, इस समय तक भी कोई राष्ट्र-ध्वज नहीं होगा। लेकिन वह हताश नहीं हुआ। हिम्मत के साथ मजिस्ट्रेट की ओर दो कदम और बढ़ाकर उसने कहना शुरू किया,सवाल इस या उस पार्क का है ही नहीं जनाब। आजादी के दिन तो ज्यादातर जगहों पर राष्ट्र-ध्वज खुले आसमान में फहर रहा होता है।…और…और प्रधानमंत्री के छोड़े हुए गैस-वाले सैकड़ों तिरंगे गुब्बारे भी तो एन इसके ऊपर से ही गुजर रहे थे उस समय…। ऐसे में, इस आदमी का अपनी दोनों लातें आसमान की ओर उठाना...मुझसे...बर्दाश्त नहीं हुआ हुजूर...!
कांस्टेबल का बयान सुनकर मजिस्ट्रेट भरपूर गुस्से के बावजूद भी उस पर चीख या चिल्ला न सका। राजनीति-प्रधान वर्तमान परिस्थितियों में कौन किस राजनेता का कुत्ता निकल आएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।
उसने कलम उठाया और फैसला लिखना शुरू कर दिया। इसके अलावा कुछ और वह शायद कर ही नहीं सकता था।
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कुंडली/बलराम अग्रवाल



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बिटिया का बायो-डाटा और फोटो उसके पिता ने लड़के की माँ के हाथ में थमा दिया। फोटो को अपने पास रोककर बायो-डाटा उसने पति की ओर बढ़ा दिया। पति ने सरसरी तौर पर उसको पढ़ा और कन्या के पिता से पूछा_
कुंडली लाए हैं?”
हाँ जी, वह तो मैं हर समय ही अपने साथ लिए घूमता हूँ।वह बोला।
वह भी दे जाइए।उसने कहा।
सॉरी भाईसाहब!” वह बोला,उसे मैं देकर नहीं जा सकता। जिन पंडिज्जी से उसका मिलान कराना हो, या तो उन्हें यहाँ बुला लीजिए या मुझे उनके पास ले चलिए।
लड़के के पिता और माता दोनों को उसकी यह बात एकदम अटपटी लगी। वे आश्चर्य से उसका मुँह देखने लगे।
वैसे, जब से बेटी के लिए वर की तलाश में निकलना शुरू किया है, मैं अपनी भी कुंडली साथ में रख लेता हूँ।उनकी मुख-मुद्रा को भाँपकर लड़की का पिता बोला,आप लोग अपनी कुंडली इस मेज पर फैला लीजिए, मैं भी अपनी को आपके सामने रख देता हूँ। अगर हम लोगों की कुंडलियाँ आपस में मेल खा गईं तो मुझे विश्वास है कि बच्चों की कुंडलियाँ भी मेल खा ही जाएँगी।
इतना कहकर उसने अपनी जेब में हाथ डाला और बिटिया के विवाह पर खर्च की जाने वाली रकम लिखा कागज का एक पुर्जा, सोफे पर कुंडली मारे बैठे उस दम्पति की ओर बढ़ा दिया।

शनिवार, जनवरी 31, 2009

कोहनी/बलराम अग्रवाल


बच्ची चीजों को ठीक-से अभी समझने लायक बड़ी नहीं हुई थी। बोलने में भी तुतलाहट थी। लेकिन भाभी ने अभी से उस पर मेहनत करना शुरू कर दिया था। वे शायद जता देना चाहती थीं कि न तो वह साधारण माँ हैं और न ही रेखा साधारण बच्ची। अपने इस प्रोजेक्ट पर उन्होंने कितने दिनों तक कितने घंटे रोज़ाना उस मासूम को तपाया, नहीं मालूम। बहरहाल, एक दिन अपने ‘उत्पाद’ को उन्होंने घर आने वालों के आगे उतार दिया।
“सारे बॉडी-पार्ट्स याद हैं हमारी रेखा को।” वह सौरभ से बोलीं।
“अच्छा!”
“अभी देख लीजिए...” कहते हुए भाभी ने बच्ची से कहा,“रेखा, अंकल को हैड बताओ बेटे।”
रेखा ने मासूमियत के साथ मम्मी की ओर देखा।
“हैड...हैड किधर है?” भाभी ने जोर डालकर पूछा।
रेखा ने दोनों नन्हीं हथेलियाँ अपने सिर पर टिका दीं।
“हेअर?”
उसने बालों को मुट्ठी में भर लिया और किलकिलाकर ताली बजा दी।
“नोज़ बताओ बेटे, नोज़।”
बच्ची ने नाक पर अपनी अँगुलियाँ टिका दीं।
“आप भी पूछिए न भैया!” भाभी ने सौरभ से कहा।
“आप ही पूछती रहिए।” सौरभ मुस्कराहट के साथ बोला,“मेरे पूछने पर बता नहीं पायेगी।”
“ऐसा कहकर आप रेखा की एबिलिटी पर शक कर रहे हैं या हमारी?” उसकी बात पर भाभी ने इठलाते हुए सवाल किया।
उनके इस सवाल पर सौरभ पहले जैसा ही मुस्कुराता हुआ अपनी जगह से उठकर रेखा के पास आया और बोला,“कोहनी बताओ बेटा, कोहनी किधर है?”
सौरभ का सवाल सुनकर बच्ची ने अपनी माँ की ओर देखा, जैसेकि इस तरह का कोई शब्द उसकी मेमोरी में ट्रेस हो ही नहीं पा रहा हो।
“क्या भैया...आप भी बस...!” बच्ची की परेशानी को महसूस करके भाभी ने सौरभ को झिड़का, “हिन्दी में क्यों पूछ रहे हैं?” यह कहती हुई वह रेखा की ओर झुकीं। कहा,“अंकल एल्बो पूछ रहे हैं बेटा,एल्बो!”
परेशानहाल बच्ची ने अपनी कोहनी को खुजाना शुरू किया, और भाभी तुरन्त ही उल्लासभरे स्वर में चीखीं,“येस, दैट्स इट माय गुड गर्ल!”

शुक्रवार, जनवरी 30, 2009

गिरावट/बलराम अग्रवाल

राज-मिस्त्री ठीक आठ बजे पहुँच गया था। मजदूर, एक वह खुद था और दूसरी उसकी बीवी। शाम तक दो तरफ की दीवारें करीब आधी-आधी खड़ी हो चुकी थीं। तभी, एक ट्रक उसके प्लॉट के आगे आ रुका। उसमें से, गरदन में रामनामी दुपट्टा डाले पच्चीस-तीस नौजवान धड़ाधड़ नीचे आ कूदे।
“किसका कमरा बन रहा है ये?” उनमें से एक ने आगे आकर पूछा।
“मेरा है।“ शरीर पर जगह-जगह गारा लगे रामाधार ने उसके सामने पहुँचकर कहा।
“ये शिलाएँ तुमको कहाँ से मिलीं?” उसने वहाँ पड़ी ईंटों की ओर इशारा करके पूछा।
“रघुनाथ मंदिर के पुजारी से...।” रामाधार ने कड़क आवाज में उत्तर दिया, “खरीदकर लाया हूँ, नगद।”
“बात नगद और उधार की नहीं, इनके गलत इस्तेमाल की है।” रेले के नेता ने उससे भी ज्यादा कड़क आवाज में कहा, “ये ईंटें नहीं, राम-शिलाएँ हैं। इनका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ राम-मंदिर बनाने में ही हो सकता है, कहीं और नहीं, समझे।”
उसके इस अंदाज से रामाधार तो अलग, उसकी बीवी और राजमिस्त्री भी दहशत में आ गये।
फोटो:रतन चन्द्र रत्नेश
“देखते क्या हो, सारी शिलाओं को डालो ट्रक में...।” नेता ने बस इतना ही कहा था कि साथ आये राम-सेवकों ने ताजा खड़ी की उन दीवारों को एक धक्के में जमीन दिखा दी। उसके बाद वे प्रशिक्षित वानरों की तरह ईंटों पर टूट पड़े।
आनन-फानन में उन्होंने सारी की सारी ईंटें उनके टुकड़ों समेत ट्रक में लाद दीं और खुद भी उस पर जा लदे।
“हिन्दू होकर ऐसा काम करते शर्म आनी चाहिए।” वापस जाते ट्रक में चढ़्ते हुए नेता ने रामाधार पर लानत भेजी, “थूकता हूँ तेरी इस हरकत पर...थू!”

गुरुवार, जनवरी 29, 2009

आदमी का बच्चा/बलराम अग्रवाल


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हूँऽ…! चरणों में चढ़ाए गए पचास रुपए के नोट को कुर्ते की जेब के हवाले करते पंडितजी के गले से आवाज निकली। पूछा,कितने बजे के करीब हुआ?
बजे तो ठीक-ठीक नहीं मालूम… पहली बार पिता बने काले-धूसर नौजवान ने उनसे यथेष्ट दूरी पर उकड़ू बैठते हुए बताया,लेकिन, चिड़ियों ने पेड़ों पर चहचहाना शुरू कर दिया था और…सूरज बस उगने-उगने को ही था। पूरब दिशा में लाली तो फैल ही चुकी थी नीचे-नीचे…।
तफ्सीस सुनकर पंडित जी ने पंचांग उठाया। पन्ने पलटकर कुछ पंक्तियों पर तर्जनी को फेरा। फिर कनिष्ठा और अनामिका पर कुछ जोड़ा-घटाया और तनकर बैठ गये।
इतनी देर तक वह नौजवान उत्सुकतावश आँखें फाड़कर उनकी ओर देखता बैठा रहा
बधाई हो कनाईराम, बड़े शुभ-मुहूर्त में पैदा हुआ है बालक… पंडितजी ने अपनी भवें उँची करके बताया,कारों में घूमेगा जिन्दगीभर!
उनकी इस उद्घोषणा पर कनाई का मुँह खुला का खुला रह गया। खुशी से नहीं, संदेह और आशंका से।
कैसी बात करते हैं पंडज्जी…! कुछ देर के भौंचक्केपन के बाद उसके मुँह से स्वत: ही फूटा,कुछ इधर-उधर पड़ गया लगता है हिसाब।
तेरा हिसाब भी मैंने ही लगाया था बेटा…और तेरे बाप का भी। उसकी इस बात पर पंडितजी त्यौरियाँ चढ़ाकर बोले,पिछले पचास सालों से पलट रहा हूँ ये पन्ने। उँगलियों पर आ गया है सारा हिसाब, कॉपी-पेंसिल की जरूरत अब मुझे नहीं पड़ती…।
फिर भी…पंडज्जी…। कनाई हकलाया।
विद्याधर की कही हुई कोई बात आज तक तो गलत निकली नहीं कभी! अपने ज्योतिष-ज्ञान की तड़ी उस पर पेलते हुए पंडितजी बोले,मेरी इस घोषणा को तू आम बात मत समझ, तेरे बेटे के बारे में यह मेरी भविष्यवाणी है भविष्यवाणी!
उनकी इस बात पर कनाई जैसे फिर-से मूक हो गया। कुछेक पल वह अन्यमनस्क-सा चुप बैठा रहा। खदान-मालिकों की बीवियों और बेटियों की कारों की खिड़कियों पर पंजे जमाए बैठे, जमीन पर उछलने-कूदने की हसरत अपनी देह और दृष्टि में भरे, उनकी गोद से निकल भागने को कुलबुलाते-कसमसाते और कारों की खिड़कियों से बाहर झाँकते कुत्तों और पिल्लों के कितने ही दृश्य उसके जेहन में घूम गये।
ये हाथ देखिए पंडज्जी। कोयले-सी काली अपनी कठोर हथेलियों को पंडितजी के आगे करते हुए वह बोला, लोहे के घन से चट्टानों को चटखाने और चूर कर डालने वाले इस कनाई का बेटा है वो सीने को अपनी खुरदुरी हथेली से ठोकते हुए उसने लगभग उत्तेजित अंदाज में बोलना शुरू किया,और खदान में पसीना बहाने वाली एक जवान औरत ने उसे जना है।…शुभ-शुभ बोलो पंडज्जी! उसने कहा,किसी कुत्ते का नहीं, इस आदमी का बच्चा है वह …
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