रविवार, फ़रवरी 24, 2013

देवों की घाटी/बलराम अग्रवाल

 मित्रो, 'कथायात्रा' में 29 जनवरी,2013 से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' को प्रस्तुत करना शुरू किया था। इसे मैं पाक्षिक रूप से जारी करने का वादा था लेकिन दूसरी ही किस्त में एक सप्ताह लेट हूँ, माफी चाहता हूँ। आप सभी से अनुरोध है कि इसकी प्रस्तुति में जो भी सम्भावना शेष नजर आये, नि:संकोच बताएँ ताकि इसे सुधारा जा सके।
गतांक से आगे…
(दूसरी कड़ी)
                                                                                                                                    चित्र:बलराम अग्रवाल
 ‘‘मई के अन्त में…’’ निक्की ने बताना शुरू किया लेकिन बताने का अन्दाज़ उसका पहलेजैसा किसी गहरे रहस्य पर से परदा हटाने की तरह का ही रहा। मणिका ने इस बार कुछ सब्र्र से काम लिया। उसने निक्की की चुप्पी पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। कुछ पल बाद अन्तत: निक्की स्वयं ही बोला,‘‘मई के अन्त में दादाजी हमें ले जाएँगे…ऽ…बदरीनाथ यात्रा पर ।’’
‘‘हुर्रे…ऽ…!’’ यह सुनते ही मणिका खुशी से उछल पड़ी । दौड़ती हुई वह वापस दादाजी के निकट जा पहुँची और पूछने लगी,‘‘निक्की सच कह रहा है दादाजी ?’’
‘‘एकदम सच!’’ दादाजी मुस्कराते हुए बोले।
‘‘हुर्रे…ऽ…!’’ दादाजी का जवाब सुनते ही मणिका एक बार पुन: किलक उठी ।
‘‘आप कितने अच्छे हैं दादाजी!’’ दादाजी को अपनी नन्हीं बाहों में घेरने की कोशिश करते हुए वह बोली,‘‘यह बात मम्मी को बता दूँ?’’
‘‘अभी नहीं।’’ दादाजी ने कहा,‘‘पहले अपनी परीक्षाएँ समाप्त करो। अच्छा ग्रेड लेकर अगली कक्षा में पहुँचो। पहले सेशन की एक महीना पढ़ाई करो। उसके बाद गर्मी की छुट्टियों में तय करेंगे कि कहाँ जाना हैबदरीनाथ या कहींऔर!…और, तुम लोगों को साथ ले चलना है या नहीं।’’
‘‘दादाजी!!’’ दोनों बच्चों ने शिकायती स्वर में एकसाथ कहा ।
‘‘अब जाओ। घर की और अपने शरीर की सफाई करो। खाओपीओ और पढ़ो।’’ दादाजी ने हँसते हुए कहा।
निक्की और मणिका दोनों दादाजी के पास से उठ खड़े हुए। एकदूसरे की गरदन में बाँहें डालकर वे बुझे मन से घर के भीतर की ओर चल दिए। उन्हें इस तरह जाते देखकर दादाजी धीरेसे मुस्कराए और कुर्सी को धूप में खिसकाकर अखबार पढ़ने में तल्लीन हो गए।

परीक्षाएँ समाप्त हुईं। परिणाम घोषित हुए। मणिका और निक्की दोनों ही अपनीअपनी कक्षाओं में एप्लस ग्रेड लेकर पास हुए। एक भव्य समारोह में स्कूल के प्राचार्य ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सभी छात्रछात्राओं को पुरस्कार तथा प्रशस्तिपत्र प्रदान किये।
आगामी दिन से स्कूल पुन: खुला। अत्यन्त प्रफुल्लित मन से बच्चे नयी कक्षाओं में जाकर बैठे। नयी पुस्तकों के बीच उनका चहकना उनकी खुशी की गवाही देता था। लेकिन उनके मन पर यह दबाव भी हमेशा बना रहता था कि कब एक महीने का यह नया सेशन समाप्त हो और कब पढ़ाई के इस बंधन से मुक्त हो कुछ दिनों के लिए वे सैलानी बन जाएँ।
इस चिन्ता के चलते दोनों बच्चों ने बड़ी बेसब्री के साथ पहले सेशन की पढ़ाई समाप्त की।
छुट्टियाँ घोषित करने वाले दिन प्राचार्य महोदय के लिखित अनुरोध को स्वीकार कर अधिकतर बच्चे अपने मातापिता के साथ स्कूल पहुँचे। सभी अभिभावकों को अध्यापकों व अन्य स्कूलस्टाफ की मदद से आदर सहित स्कूलभवन के सेमिनार कक्ष में निर्धारित सीटों पर बैठाया गया। छात्रछात्राएँ अपनीअपनी कक्षा में बैठे। प्राचार्य महोदय ने सभी छात्रों को पंक्तिबद्ध होकर स्कूलभवन के सेमिनार कक्ष में एकत्र होने का आदेश भिजवाया था। अध्यापकों ने अपनी अनुपस्थिति में इस कार्य को सम्पन्न करने का जिम्मा प्रत्येक कक्षा के मॉनीटर को सौंपा था। पंक्तिबद्ध होकर सभी छात्र कक्षामॉनीटर्स की देखरेख में वहाँ पहुँच गये। निगम पार्षद एवं विधायक सहित क्षेत्र के कुछ अन्य गण्यमान्य लोग भी स्कूलप्रशासन के आमन्त्रण पर आए हुए थे। उन सबको मंच के ठीक सामने सोफों पर बैठाया गया था। प्राचार्य एवं अध्यापकगण भी सोफों पर बैठे तथा समस्त छात्र उनके पीछे लगी कुर्सियों पर। 
कार्यक्रम शुरू हुआ।
सबसे पहले आमन्त्रित गण्यमान्य लोगों द्वारा विद्या की देवी माँ सरस्वतीकी ताम्रप्रतिमा के आगे रखे दीपों को प्रज्वलित कर उन्हें पुष्प अर्पित किए गए। तत्पश्चात् विद्यालय की संगीतअध्यापिका के निर्देशन में तैयार कुछ छात्रछात्राओं द्वारा संगीतमय सरस्वतीवन्दना प्रस्तुत की गई
माँ शा…ऽ…रदे! वर दे ।
वरदे…ऽ…! वर दे ।
श्वे…ऽ…त पद्मा……ऽ…सने! चरणों…ऽ… में शरण दे ।
वरदे…ऽ…! वर दे ।
                                                              आगामी अंक में जारी

मंगलवार, जनवरी 29, 2013

देवों की घाटी/बलराम अग्रवाल


 मित्रो, 'कथायात्रा' में आज से अपने यात्रापरक बाल एवं किशोर उपन्यास 'देवों की घाटी' के कुछेक अंशों को प्रस्तुत करना शुरू कर रहा हूँ। इसे यथासम्भव मैं पाक्षिक रूप से जारी करूँगा।
(पहली कड़ी)

दीदी…ऽ…ऽ…दीदी…ऽ…!!
                        चित्र:बलराम अग्रवाल
बाहर लॉन में धूप सेंक रहे दादाजी के पास से उठकर निक्की मणिका को पुकार उठा। वहाँ खड़े रहकर उसने एकदो आवाज़ें और लगाईं, फिर भागकर घर के अन्दर आ गया। यह कमरा, वह कमरा, स्टोर, बाथरूमउसने सब देख डाले लेकिन मणिका का कहीं कोई पता न चला।
‘‘मम्मी! दीदी किधर है ?’’ हताश होकर वह रसोई में गया और ममता से पूछा।
‘‘क्यों, दोनों की कुट्टी दोबारा दोस्ती में बदल गई क्या ?’’ आटा गूँथती हुई ममता ने मुस्कराते हुए पूछा।
‘‘बताओ न मम्मी।’’ निक्की ने पैर पटकते हुए पुन: पूछा।
‘‘पहले तुम बताओ।’’ ममता उसी तरह मुस्कराती रही।
‘‘बताओ न!’’ निक्की रसोई के अन्दर आकर उनकी टाँगों से लिपट गया और नोंचने लगा।
‘‘अरेअरे, चप्पलें बाहर उतारो।’’

आगामी अंक में जारी…

मंगलवार, फ़रवरी 21, 2012

लगाव/बलराम अग्रवाल

                                                                      चित्र:बलराम अग्रवाल
माता जी के रहते दूसरा कोई भी बाबूजी के कमरे को नहीं झाड़ता-बुहारता था। उनकी किस चीज़ को कहाँ रखना है-वही जानती थीं। लेकिन, जब से माता जी स्वर्ग सिधारी हैं, रमा ही उनका कमरा बुहारती है।
इधर, एक बात ने रमा का ध्यान कई दिनों से अपनी ओर आकर्षित कर रखा है। एक ओर को रख दी गई अम्माजी की ढुलमुल-सी पुरानी मसनद को स्टोर से निकालकर बाबूजी ने अपने पलंग पर दीवार के सहारे रख लिया है। अपने कमरे में अब वे कुर्सी पर कम, पलंग पर मसनद से पीठ टिकाकर ज्यादा बैठे नजर आने लगे हैं।
“पीठ में दर्द हो तो आपके लिए ‘मूव’ मँगा दूँ बाबूजी?” रमा ने मौका पाकर एक शाम उनसे पूछा।
“अरे नहीं,” वे बोले,“दर्द-उर्द कुछ नहीं है...इसे तो मैं ऐसे ही उठा लाया हूँ स्टोर से।”
“इनसे कहकर नया मसनद मँगवा दूँ बाजार से? ज्यादा आरामदायक रहेगा।” उसने पुनः पूछा।
“अरे नहीं बहू,” वे इस बार सीधा बैठते हुए बोले,“कहा न, भला-चंगा हूँ।”
उसके बाद रमा ने उनसे कुछ नहीं कहा। अलबत्ता पति को फोन करके ‘मूव’ की एक छोटी ट्यूब लेते आने को जरूर कह दिया। वह ले आया।
“किसके लिए चाहिए थी?” ट्यूब को पत्नी के हाथ में पकड़ाते हुए रवि ने पूछा।
“बाबूजी की कमर में दर्द है शायद।” वह बोली,“उनकी मेज पर रख आती हूँ। जरूरत समझेंगे तो लगाते रहेंगे।” इतना कहकर वह बाबू जी के कमरे की ओर बढ़ गई।
कमरे में कदम रखते ही, बाहर से पड़ते हल्के प्रकाश में उसने देखा-सिरहाने से पीठ लगाए बाबू जी पलंग पर बैठे हैं। मसनद उनकी गोद में रखी है। उनकी आँखें मुँदी हैं और आँसुओं की अविरल धारा उनसे बह रही है।

सोमवार, जनवरी 16, 2012

अथ ध्यानम्/बलराम अग्रवाल


भालुका तीर्थ मन्दिर, सोमनाथ(गुजरात)                              चित्र:बलराम अग्रवाल
 लीशान बंगला। गाड़ी। नौकर-चाकर। ऐशो-आराम। एअरकंडीशंड कमरा। ऊँची, अलमारीनुमा तिजौरी। करीने से सजा रखी करेंसी नोटों की गड्डियाँ। माँ लक्ष्मी की हीरे-जटित स्वर्ण-प्रतिमा।
दायें हाथ में सुगन्धित धूप। बायें में घंटिका। चेहरे पर अभिमान। नेत्रों में कुटिलता। होंठ शान्त लेकिन मन में भयमिश्रित बुदबुदाहट।
नौकरों-चाकरों के आगे महनत को ही सब-कुछ कह-बताकर अपनी शेखी आप बघारने की मेरी बदतमीजी का बुरा न मानना माँ, जुबान पर मत जाना। दिल से तो मैं आपकी कृपा को ही आदमी की उन्नति का आधार मानता हूँ, महनत को नहीं। आपकी कृपा न होती तो मुझ-जैसे कंगले और कामचोर आदमी को ये ऐशो-आराम कहाँ नसीब था माँ। आपकी जय हो…आपकी जय हो। 

गुरुवार, सितंबर 29, 2011

पेड़ बोलता है/बलराम अग्रवाल

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                                                                                    चित्र:आदित्य अग्रवाल
 पात्र
दादाजीनंदू के वृद्ध दादाजी, उम्र लगभग 60 वर्ष
नंदूलगभग दस बरस का एक बालक
पेड़किसी भी पेड़ की बड़ी-सी अनुकृति
पत्ताएक हरे पत्ते की अनुकृति
कोमल पत्तीएक कोमल-पत्ती की अनुकृति
टहनीएक पतली टहनी की अनुकृति
फूलउसी पेड़ के एक फूल की अनुकृति
फल उसी पेड़ के एक फल की अनुकृति
छालउसी पेड़ के छाल की अनुकृति

पेड़ की एक बड़ी-सी अनुकृति मंच के बीचों-बीच खड़ी है। उसके पीछे उसके हरे पत्ते की, कोमल पत्ती की, पतली टहनी की, फूलों के गुच्छे की, फल की तथा छाल की अनुकृतियों को इस प्रकार खड़ा किया गया है कि सामने से दर्शकों को मात्र पेड़ ही नजर आता है। यह पेड़ निर्देशक अपनी सुविधा के अनुसार पीपल, आम, बरगद किसी का भी ले सकते हैं तथा उसके अंग बने अन्य पात्रों को मंच के दायें, बायें, पिछले या सामने वाले हिस्से से भी बारी-बारी मंच पर ला सकते हैं।
दादाजी गाते हुए मंच पर प्रवेश करते हैं।
दादाजीपेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
उनके पीछे-पीछे ही बगल में एक चटाई दबाए नंदू भी यह पंक्ति दोहराता, मटकता हुआ प्रवेश करता है।
नंदूपेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
दादाजी(पीछे घूमकर उसकी ओर देखते हुए) अरे बदमाश तू भी आ गया?
नंदूमम्मी ने आपके लेटने-बैठने के लिए चटाई देकर भेजा है।
दादाजीबहुत अच्छा किया। आ, फिर मेरे साथ-साथ गापेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
नंदूपेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
दादाजीपेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
नंदूपेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
दादाजीपेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
नंदूपेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
गाते-गाते ही वे दोनों पेड़ के नीचे एक चटाई बिछाकर उस पर बैठ जाते हैं।
दादाजीनंदू, हमारे पूर्वज बहुत विद्वान थे बेटे।
नंदूकितने विद्वान थे?
दादाजीइतने…ऽ…कि दुनियाभर के पेड़-पौधे, सारी वनस्पतियाँ, उनके फूल, फल, बड़े-बड़े पहाड़, बहती हुई नदियाँ, उड़ती हुई चिड़ियाँ, यह घास (जमीन से उठाकर घास का एक तिनका नंदू को दिखाते हैं), यह मिट्टी (जमीन से उठाकर मुट्ठीभर मिट्टी नंदू को दिखाते हैं)सारी चीजों से वे बातें करते थे और सारी चीजें उनसे बातें करती थीं।
नंदू(व्यंग्यात्मक स्वर में) गिनाने से कोई नाम छूट तो नहीं गया दादाजी?
दादाजीमजाक समझ रहा है?
नंदूऔर नहीं तो क्या? बेजान और बेजुबान चीजों से कोई कैसे बातें कर सकता है?
दादाजीक्यों नहीं कर सकता?
नंदूअगर कर सकता होता तो भैंस के आगे बीन बजाना यह मुहावरा क्यों बनता।
दादाजीइस मुहावरे का मतलब अलग है नंदू और मेरी बात का मतलब अलग।
नंदूयह कैसे हो सकता है दादाजी कि नॉन लिविंग यानी निर्जीव वस्तुएँ लिविंग यानी जीवित वस्तु, आदमी से बातें करें?
दादाजीतू तो विज्ञान का विद्यार्थी है न? उसमें तो वैज्ञानिकों ने जीवित और निर्जीव वस्तुओं के कुछ गुण बताए हुए हैं।
नंदूसो तो है।
दादाजीउनके आधार पर विज्ञान भी पेड़-पौधों को जीवित ही मानता है।
नंदूमानता तो है, पर…
दादाजीपर क्या?
नंदू(कुछ सोचते हुए) देखो दादाजी, हमारे सिरहाने…ये खड़े हैं पेड़ बाबा, और आप है हमारे पूर्वज। ठीक है?
दादाजीठीक है।
नंदूतो अब आप मेरे सामने पेड़ बाबा से बातें करके दिखाइए।
दादाजीदेखो बेटा, बातें करने के मतलब को समझो।
नंदूसमझाइए।
दादाजीहमारे पूर्वजों ने अनेक प्रयोग करके बहुत-सी चीजों के गुणों की खोज की।
नंदूसो तो आज के वैज्ञानिक भी करते हैं।
दादाजीहाँ, लेकिन आज का वैज्ञानिक कहता है कि मैंने इस वस्तु के या इस प्राणी के इस गुण की खोज की।
नंदूऔर पूर्वज क्या कहते थे?
दादाजीवे कहते थे कि इस पौधे ने या इस पेड़ ने या इस बेजुबान प्राणी ने मुझसे बातें कीं और अपने बारे में मुझे ये-ये बातें बताईं।
नंदूबात तो वही हुई न।
दादाजीनहीं। बात वही नहीं हुई। आज का वैज्ञानिक अगर मनुष्य पर भी शोध करता है, तो उसे वह निर्जीव वस्तु मानकर चलता है।
नंदूऔर पूर्वज क्या मानकर चलते थे?
दादाजीसजीव। सही बात तो यह है नंदू कि भारतीय दर्शन इस पूरी सृष्टि में एक कण को भी निर्जीव मानता ही नहीं है।
नंदूजी।
दादाजीइसीलिए मनुष्य की या पशुओं-पक्षियों जैसे चलने-फिरने-बोलने वाले जीवों की तो बात ही छोड़ो, वे अगर नदियों पर, पेड़-पौधों पर, पत्थरों पर, अलग-अलग जगह की मिट्टी जैसी निश्चल वस्तुओं पर भी शोध करते थे तो उन्हें निर्जीव वस्तु नहीं सजीव और प्राणवान मानकर चलते थे।
नंदूहूँ…ऽ…इसीलिए कहते थे कि इसने मुझसे और मैंने इससे बातें कीं।
दादाजीबिल्कुल ठीक। …और, अब देखो, यह पेड़ तुमसे और तुम इस पेड़ से बातें करोगे।
यों कहते हुए दादाजी पेड़ की अनुकृति के पीछे जाकर खड़े हो जाते हैं।
पेड़ बाबाहलो नंदू। मैं हूँ हरा-भरा सुगंधित हवा और ठंडी छाया देता हुआ पेड़।
नंदू अपने दोनों हाथ हवा में फैलाकर ऐसे साँस लेता है जैसे उसे वाकई बहुत सुगंधित और शीतल वायु मिल गई हो।
नंदूप्रणाम करता हूँ पेड़ बाबा।
पेड़ बाबासदा स्वस्थ रहो बेट
नंदूपेड़ बाबा, आप अपने बारे में कुछ बताइए न।
पेड़ बाबाक्या बताऊँ? ज्यादातर तो लोग हमें काठ और ईंधन देने वाला ही समझते हैं।
नंदूबिल्कुल गलत। मेरे दादाजी कहते हैं कि पेड़ बड़े दयावान होते हैं।
पेड़ बाबादेखो बेटा, धरती पर जितने भी पेड़ हैं, उन सबके छ: अंग अवश्य होते हैं और वे सब के सब उपयोगी होते हैं।
नंदू(आश्चर्य से) पेड़ों के अंग भी होते हैं?
पेड़ बाबाहाँ नंदू। सबसे पहलेजड़।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर जड़ की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबाफिर छाल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर छाल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबाशाखा यानी टहनी।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर टहनी की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबापत्ते।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर हरी व कोमल पत्तियों की अनुकृतियाँ मंच पर सामने आ जाती है।

पेड़ बाबाफूल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर फूल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबाऔर फल।
उनके ऐसा कहते ही पेड़ के पीछे से निकलकर फल की अनुकृति मंच पर सामने आ जाती है।
पेड़ बाबासभी पेड़ों के ये छ: अंग अवश्य होते हैं। लेकिन किसी-किसी के कम या ज्यादा भी होते हैं।
नंदूजैसे?
पेड़ बाबाजैसे किसी-किसी पेड़ को दाढ़ी भी होती है।
नंदूपेड़ों को दाढ़ी-मूछें भी आती हैं?
पेड़ बाबादाढ़ी-मूँछें नहीं, सिर्फ दाढ़ी। तुमने बरगद के पेड़ तो देखे ही हैं न। उनके तनों और शाखाओं से लम्बे-लम्बे रेशे जमीन की ओर लटक रहे होते हैं।
नंदूहाँ।
पेड़ बाबाउन्हें ही बरगद की दाढ़ी कहा जाता है। किसी-किसी पीपल की तथा कुछ दूसरे पेड़ों की भी दाढ़ी आती है।
नंदूऔर फूल?
पेड़ बाबाप्रकृति का नियम है नंदू कि पेड़-पौधों पर पहले फूल आएगा, फिर फल। लेकिन, पीपल और बरगद के पेड़ की यह विशेषता है नंदू कि इनकी डालियों पर फूल नहीं आते, सीधे फल ही आते हैं।
नंदूयह तो कमाल की बात है!
पेड़ बाबामेरी एक बात और गाँठ में बाँध लो।
नंदूकौन-सी बात को?
पेड़ बाबादेखो बेटा, कोई कितना भी बुजुर्ग क्यों न हो, उसकी बताई बातों को जब तक उस विषय के किसी विशेषज्ञ से निश्चित न कर लो, तब तक उन पर अमल मत करो। मेरी बातों पर भी।
नंदूक्यों?
पेड़ बाबातुमने नीम हकीम खतरा-ए-जान वाली कहावत तो सुनी ही होगी?
नंदू(हँसता है) ही-ही-ही…
पेड़ बाबाहँस क्यों रहे हो?
नंदूहमारी कक्षा में वो चंदू है न, उसने टीचरजी को इसका अर्थ बताया किए हकीम, इस नीम से तेरी जान को खतरा है। उसका उलटा जवाब सुनकर टीचरजी ने उसे कक्षा के बाहर खड़ा कर दिया था।
पेड़ बाबाइस मुहावरे का सही अर्थ यह है बेटा कि आधी-अधूरी जानकारी रखने वाला हकीम मरीज की जान के लिए खतरा होता है। उसकी सलाह और दवाइयाँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और जानलेवा हो सकती हैं।
नंदूमैं समझ गया।
इसी के साथ दादाजी पेड़ के पी्छे से निकलकर नंदू के निकट आ जाते हैं और कहते हैं
दादाजीपेड़ दयावान ही नहीं, परोपकारी भी होते हैं नंदू। इसीलिए तो मैं कहता हूँ किपेड़ को जानो, पेड़ को समझो और पहचानो भाई।
नंदूपेड़ से अच्छा दोस्त नहीं कोई, नहीं वैद्य है भाई।
दादाजीपेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
नंदूपेड़ हमारे जीवनदाता रहते सदा सहाई।
दादाजीपेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
नंदूपेड़ को जो बेबात उजाड़े समझो उसे कसाई।
अंतिम पंक्तियों के साथ ही प्रकाश मद्धिम होता जाता है।
दृश्य समाप्त

बुधवार, अगस्त 24, 2011

अभिनेय बाल-एकांकी/बलराम अग्रवाल

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 तू भी अण्णा मैं भी अण्णा

छत्रसाल स्टेडियम, नई दिल्ली दिनांक 16 अगस्त, 2011चित्र : बलराम अग्रवाल
पात्र :
बालक 1, बालक 2, बालक 3 व बालक 4
बालिका 1, बालिका 2, बालिका 3 व बालिका 4
(सभी की आयु दस से चौदह के बीच)


परदा उठना शुरू होता है। उसके साथ ही नेपथ्य में गीत उभरता है
तू भी अण्णा मैं भी अण्णा, देश का बच्चा-बच्चा अण्णा।
चुनिया अण्णा, मुनिया अण्णा, गुड्डू-डब्बू-दत्ता अण्णा।।
दलित भी अण्णा श्रमिक भी अण्णा, हम सब अण्णा-अण्णा-अण्णा।
हिन्दू अण्णा, मुस्लिम अण्णा, सिख-इसाई अण्णा-अण्णा।।

अण्णा नहीं है आँधी है,
देश का दूजा गाँधी है।
भ्रष्टाचार भरे शासन से,
माँग रहा आजादी है।।
नहीं पुरुष है ना स्त्री है, नहीं नपुंसक है भाई।
धोती-कुर्ता-टोपी पहने, सीधी-सादी सच्चाई॥

अण्णा सद्-आचार है,
अण्णा एक विचार है।
अण्णा नाम मनोबल का,
अण्णा दुश्मन छल-बल का।
अमर एंथनी अकबर गुरजित गुप्ता शर्मा खन्ना।
ये भी अण्णा वो भी अण्णा, सारे अण्णा-अण्णा॥

इस गीत के चलते ही कुछ बच्चे मंच के दायें-बायें, आगे-पीछे सभी हिस्सों से उछलते-कूदते मंच पर एकत्रित होते हैं और गीत के भावानुरूप ही अभिनय भी करते हैं।
बालक 1आ…हहा-हा…। आज तो मज़ा आ गया।
बालिका1सो कैसे?
बालक 1अरे अभी जिस गीत पर थिरक रही थी उसे सुना ध्यान से?
बालिका1हाँ।
बालक 1बस, आज हम अण्णा-अण्णा ही खेलेंगे।
बालक 2, 3 व 4(आश्चर्य से) सच्ची?
बालक 1एकदम सच्ची। क्या गजब का गीत है। मेरी तो नस-नस फड़क उठती है इसे सुनकर।
बालक 2लो सुनो। तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे बस तुम्हारी ही नसें फड़कती हों।
बालिका 2और हमें बिल्कुल भी मजा नहीं आता हो।
सभी इस बात पर खिलखिलाकर हँसते हैं।
बालिका 3 व 4इसे सुनकर हमें भी बड़ा मजा आ रहा है।
बालक 3 व 4अरे, पूरे भारत में आज कौन ऐसा व्यक्ति है जो अन्ना के बारे में ना जानता हो और उनकी एक पुकार पर भ्रष्टाचार से लड़ने को न उठ खड़ा होता हो।
बालक 1इसीलिए तो कह रहा हूँ कि आज हम अण्णा-अण्णा खेलेंगे।
बालिका 3डायलॉग्स भी याद नहीं करने पड़ेंगे।
बालक 3हाँ, अपने-अपने कैरेक्टर के अनुसार सब अपने-आप बनाकर संवाद बोलेंगे।
बालिका 4इससे हमारे सामान्य ज्ञान का भी पता चलेगा।
बालक 1तब ठीक है। (बालक 2 के कंधे पर हाथ रखकर) तू बनेगा पिप्पल।
बालक 2(चौंककर) पिप्पल? यानी कि…ना बाबा ना, मैं इस नाम का रोल नहीं करूँगा।
बालक 1(उसकी बात पर ध्यान दिये बिना बालिका 2 से) और तू बनेगी  अंतिका।
बालिका 2(चौंककर) मैं? मैं कोई घटिया रोल नहीं करने वाली।
बालक 1घटिया रोल? अरे, ये सारे लीडिंग रोल्स हैं यार।
बालिका 2लीडिंग रोल्स हैं तो तू खुद क्यों नहीं करता?
बालिका 1अरे यार, बॉडी के अनुसार ही तो दिया जायेगा रोल। कहाँ मैं पतला-दुबला, कहाँ मोटे पिप्पल का रोल!
बालक 2मैं समझ गया इसकी चालाकी। किसी को मोटा, किसी को पतला बता-बताकर यह हर किसी को नेगेटिव रोल थमा देगा…
बालिका 2किसी को सत्तारूढ़ पार्टी का प्रवक्ता…
बालक 2और किसी को उसका जनरल सेक्रेटरी बना देगा।
बालिका 2हाँ, यानी कि पब्लिक की गालियाँ खाने वाले रोल यह हमें बाँट देगा…
बालक 2और खुद बन जायेगा हीरो…अन्ना।
बालक 2(बालक 3 की ओर इशारा करके) अपने इस दोस्त को बनाएगा केजरीवाल और…
बालिका 2(बालिका 4 की ओर इशारा करके)…और अपनी इस सहेली को किरन बेदी…
बालक 1अरे यार, तुम लोग समझते क्यों नहीं हो।
बालक 3भाई यह नाटक है। इसमें अच्छे-बुरे रोल करने से कोई हमेशा के लिए अच्छा-बुरा थोड़े ही हो जाएगा।
बालिका 2नहीं हो जाएगा तो तू और तेरे साथी क्यों नहीं ले लेते विलेन वाले रोल?
बालक 1अरे, सुनो-सुनो। झगड़ा मत करो। तुम्हारे ऐतराज से एक बात साफ हो गई।
बालक 2 व बालिका 2(एक साथ) क्या?
बालक 1यही कि हमारी नयी पीढ़ी झूठ-मूठ भी बुरे रोल नहीं करना चाहती।
बालक 3 व 4बिल्कुल ठीक।
बालक 1सचाई के साथ भ्रष्टाचार-मुक्त देश की सेवा के रास्ते पर चलना चाहती है।
बालिका 3 व 4हमारी पीढ़ी अच्छे आदर्शों को अपने चरित्र का हिस्सा बनाना चाहती है।
बालक 1बिल्कुल ठीक। जानते हो क्यों?
सभी एक साथक्यों?
बालक 1इसलिए…ऽ…कि…
सभी एक साथतू भी अण्णा, मैं भी अण्णा, देश का बच्चा-बच्चा अण्णा।
चुनिया अण्णा, मुनिया अण्णा, गुड्डू-डब्बू-दत्ता अण्णा।
बालिका 1वन्दे…।
सभी एक साथ…मातरम्।
बालिका 1वन्दे…।
सभी एक साथ…मातरम्।
बालिका 1वन्दे…।
सभी एक साथ…मातरम्।
बालिका 1भारत माता की…
सभी एक साथजय!
परदा गिरता है।