रविवार, जनवरी 25, 2009

महाप्रलय में औरत/बलराम अग्रवाल


ऊपर, लरजते-गरजते, पानी बरसाते और बिजलियाँ गिराते काले-कलूटे बादलों के झुण्ड थे। नीचे, चारों ओर पानी ही पानी था, लेकिन न पीने लायक । फलों से लदे पेड़ थे, लेकिन प्रलय के पानी में शीर्षासन करते…अँधेरे आसमान से मदद की उम्मीद में जड़ें ऊपर उठाए, बहे जाते । कितनी ही तरह की चिड़ियाँ और मछलियाँ थीं,लेकिन गंदले और उफनते पानी की सतह पर निश्चल पड़ी बही जातीं, बेदम ।
धरती पर पर्वत-श्रृंखला की बची-खुची एक चोटी पर निश्चल बैठी दुनिया की आखिरी औरत यह सब देख रही थी ।
समस्त मानवजाति नष्ट हो गयी।
एकाएक उसे पुरुष-स्वर सुनाई दिया । उसने आवाज़ की दिशा में अपनी दृष्टि घुमाई । वह दुनिया का शायद आखिरी पुरुष था जो धीरे-धीरे चोटी की ओर चढ़ रहा था ।
सृष्टि में मानवजाति के आस्तित्व को बचाए रखने की जिम्मेदारी अब हम दोनों पर ही बची है... औरत के सामने की एक शिला पर किसी तरह टिककर वह बोला ।
औरत ने एक गहरी दृष्टि उसके चेहरे पर डाली और गंभीर-स्वर में बोली, भोग की तुम्हारी लालसा महाप्रलय के इस भयावह चरण में भी जस की तस है!
मानवजाति को बचाए रखने की मेरी भावना को भोग की लालसा कहकर बाढ़ के पानी में तैरते इन झागों और बुलबुलों की तरह मत बहाओ... औरत की आँखों में आँखें डालकर उसने कहा,हमेशा यों ही नहीं चढ़ते रहना है यह जल, उतरेगा जरूर । डरो मत…डरो मत।
जल का स्तर ऊँचा होते-होते बड़ी तेजी के साथ पर्वत के उस शेष-शिखर की ओर बढ़ रहा था । इस बीच बड़ी से बड़ी शिला भी उसका स्पर्श पाते ही अपनी जगह को छोड़कर तलहीन जल में समाए जा रही थी। छोटी-मोटी पहाड़ियाँ तो चीनी के ढेर की तरह कब की उसमें गल चुकी थीं। औरत लगातार इस उथल-पुथल पर नजर रखे हुए थी, लेकिन मर्द उस ओर पीठ किए बैठा था । औरत को लगा कि मानवजाति को बचाए रखने का जुनून पाले बैठे इस मर्द के समीप रहते, महाप्रलय के इस भीषण और भयावह मौके पर भी उसकी इज्जत पहले जितनी ही असुरक्षित है। ईश्वर की प्राथमिकता भी इस समय किसी वस्तु को बचाने की बजाय उसे डुबोने और नष्ट-भृष्ट कर डालने की महसूस होती है। ऐसे में, जो कुछ भी करना है खुद उसे ही करना है।
मानवजाति को बचाने का खयाल छोड़…और फिलहाल तो तू अपने आप को बचा...। औरत निर्णायक-स्वर में दहाड़ी और जोरों की एक लात उसने पुरुष के सीने पर दे मारी।
उस समय जल का भयावह गर्जन सुनने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं था, पुरुष के उसमें गिरने की हल्की-सी आवाज़ को कौन सुनता ।
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2 टिप्‍पणियां:

आदर्श राठौर ने कहा…

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं...

बलराम अग्रवाल ने कहा…

धन्यवाद। हार्दिक शुभकामनाएँ आपको भी।