जीवन-संत्रास को संकेत और सहज व्यंग्य से प्रकट करती लघुकथाएँ
गतांक से आगे…
जनवरी की सुबह मठाशीश स्नान करके झीनी धोती पहन सूर्य देवता से ‘अंधेरा’ समाप्त करने की प्रार्थनाएँ करता शिष्यों के साथ गौशाला की ओर निकलता है। लेकिन उसके स्वयं के मानस पर अंधेरा छाया हुआ है, इसका आभास वहाँ बरामदे में लेटा गरीब आदमी उसे दुत्कार कर कराता है।
इस संग्रह में पोखरेल जी की अनेक लघुकथाएँ उत्तम पुरुष में लिखी गयी हैं यानी मुख्य पात्र ‘मैं’ को लेकर। इसमें कथाकार को सुविधा यह रहती है कि वह पात्र के साथ बिना प्रयास ही एकाकार हो जाता है। अनेक लघुकथाएँ ऐसी हैं जिनमें ‘मैं’ नौकरीशुदा है और सहायक पात्र व्यापारी। उदाहरणार्थ, ‘गोल्डन कार्ड’। मृत्यु के बाद ‘वह’ के सारे गोल्डन कार्ड्स जमीन पर गिर पड़ते हैं।
अनेक लघुकथाओं में वह प्रतिपादित करते हैं कि अन्तिम समय में धन-सम्पत्ति किसी काम नहीं आती, यहीं रह जाती है। ‘जन्म’ में कथानायक ‘मैं’ का मित्र जनार्दन उसे भौतिकवाद समझाता है। वस्तुवादी दर्शन के अनुसार, बाहरी दुनिया केवल कल्पना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र रूप से सत्य और ठोस है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन इन लघुकथाओं में इस दर्शन को पूर्ण सत्य मानने वाले पात्र जीवन के अन्त में असहाय पाये जाते हैं। ‘जन्म’ में कोमाग्रस्त जनार्दन के बारे में उसकी पत्नी ‘मैं’ को बताती है—“वह सब बात समझते हैं। उनके भीतर उद्वेग और पीड़ा मँडराती है, लेकिन वे बोल नहीं सकते।” न बोल पाने वाले व्यक्ति की संज्ञा मृत होती है, भले ही वह साँस ले रहा हो और पलकें भी झपका रहा हो। कवि उदय प्रकाश की एक कविता है—
आदमी मरने के बाद कुछ नहीं सोचता
आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता
कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी मर जाता है।
इसी सन्दर्भ में अवतार सिंह ‘पाश’ कहते हैं—
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
इस संग्रह में कई लघुकथाएँ ऐसी हैं जो आने वाले समय पर दस्तक जैसी हैं, जो बताती हैं कि आने वाले समय में मनुष्य ऐसा-ऐसा होगा। निश्चित रूप से वह समझ नहीं पायेगा कि उसे ‘रोबोट जैसे आदमी की तलाश है या आदमी जैसे रोबोट की? अनेक लघुकथाओं में अति सुन्दर फैंटेसी भी बुनी गयी है। आने वाली दुनिया में मनुष्य जीवन सम्भवत: ऐसा ही होगा कि उसके हाथ, पैर, नाक, आँख, दाँत आदि सभी अंग कृत्रिम होंगे। कोई अंग उसका अपना यानी प्राकृतिक नहीं होगा; लेकिन काम-चेष्टा जैसी कमजोर मानवीय भावनाएँ उसका पीछा उस स्थिति में भी नहीं छोड़ेंगी। ॠग्वेद में—‘कामस्तदाग्रे समवर्तताधि…’ अर्थात् सृष्टि की शुरुआत में सबसे पहले काम उत्पन्न हुआ, कहा गया है ।
संग्रह की अनेक लघुकथाओं के पात्र विगत में जाकर कथानक का विकास करते हैं। ‘मिर्च का पौधा’ में कथानायक विगत में चला जाता है। अन्त में विलायत में बैठे बेटे से माँ का यह कहना कि—"बेटा, मिर्च के पौधे तो आज भी पसीने से लथपथ हैं, तुम्हें कुछ मालूम है या नहीं?" माँ के अस्सी वर्ष की उम्र में भी श्रमरत रहने और आर्थिक तंगी से जूझने की ओर इशारा करता है। ऐसी संकेत-युक्त भाषा की दरकार लघुकथा को प्रत्येक लघुकथाकार से रहती है।
अनेक लघुकथाओं में मानवेतर पात्र प्रस्तुत करके उनका मानवीकरण किया गया है। ‘खोली’ में गिलाफ का मानवीकरण हुआ है। वह समाज के विभिन्न वर्गों के विकृत चेहरों के बारे में कथानायक को बताता है। ‘फार्मेलिटी’ में कौवे का मानवीकरण है। इस लघुकथा में कौए के माध्यम से वैधव्य प्राप्त स्त्री और पुरुष के जीवन पर रोचक और विचारणीय संवाद है। ‘एक सिकंदर’ में हवा का मानवीकरण है। यह हताश-निराश व्यक्ति में जीवन के प्रति आशा के बीज बोने वाली लघुकथा है जो बताती है—‘जिंदगी प्राप्ति का पुलिंदा नहीं है।’ ‘चित्रगुप्त की डायरी’ में आत्माओं की बातचीत प्रस्तुत की गयी है। ‘शोकेस की गुड़िया’ में गुड़िया का मानवीकरण हुआ है। ‘अंधेरा उजाला’ दृष्टांत शैली की सुन्दर व्यंग्य कथा है। इसमें प्राकृतिक मानवेतर पात्र हैं। ‘कब्रस्थान’ भी मानवेतर श्रेणी की लघुकथा है।
बेटा पैदा करने की इच्छा समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के सामान्य जन के खून में ही रच-बस गयी है। जीवन चाहे कितनी भी गरीबी में बिताना पड़े। ‘भाई’ में चार बेटियाँ हैं। बहनों को परस्पर लूडो खेलने की भी छूट नहीं मिलती है शायद। गरीब औरत मजदूरी करने जाए या हैल्थ चैक-अप कराने, यह बड़ा सवाल कथाकार ने खड़ा किया है।
कई लघुकथाएँ हैं जिनमें कथानायक साधारण है और बचपन में उसका साथी रहा सहनायक बहुत अमीर हो गया है। ‘औलाद’ में सहनायक अपने संस्कार नहीं भूला है लेकिन उसकी पत्नी श्रद्धाविहीन और व्यावहारिक दृष्टि वाली है। वह सलाह देती है—“श्राद्ध घर में तो नहीं होगा। घर गंदा हो जाएगा। कोई मंदिर ढूँढ लो।" ‘गरीब’ कथानायक की पत्नी रमा का अपने धनी देवर पर तंज कसती है—“…इस संसार में बहुत से गरीब लोग रहते हैं जिनके पास पैसे के अलावा कुछ नहीं होता है।”
‘जीवन का अर्थ’ बहुत सुन्दर लघुकथा है। ‘शौहर’ में तीखा व्यंग्य प्रस्तुत है। ‘देर’ को भाववादी गद्य का नमूना कह सकते हैं। ‘कंधियार’ में लेखक ने एक कुप्रथा की ओर संकेत किया है।
‘कसूर’ में वर्णित ट्विन टावर का सम्बन्ध वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर से है जो 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमले में नष्ट हो गया और जिसमें अनेक बेकसूर लोग काल के गाल में समा गये थे। वहाँ अपने 5 बच्चों के साथ खड़ी एक औरत चीखती है—"ऐ लोगो! तुम जीतो या हारो, लेकिन इसी जगह पर मेरा पति अनवरुद्दीन मारा गया है। हे ईश्वर! हे अल्लाह! हे जीसस! मुझे बता दो, मेरे पति का कसूर क्या था?" यहाँ ‘5 बच्चों’ के रूप में उल्लेखनीय संकेत यह है कि अमेरिका जैसे उन्नत जीवन शैली वाले देश में भी मुस्लिम लोग बच्चों की पैदाइश रोकने की ओर जागरूक नहीं हैं।
‘जीवन मरण’ में मन्दबुद्धि संजय के मुख से लेखक बहुत गहरा सवाल निकालता है। उसके लेखन की यही ताकत अन्य लघुकथाओं में भी देखने को मिलती है।
भारतीय उपमहाद्वीप मुख्य रूप से भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका को मिलाकर भारतीय उपमहाद्वीप कहलाता है। इनमें भारत और नेपाल में हिन्दू संस्कृति और धर्म का प्रभाव सबसे अधिक है। शेष सब में हिन्दू, मुस्लिम, क्रिश्चियन आदि साझा संस्कृति है। अमेरिका यूरोप का हिस्सा नहीं है; लेकिन याद रखना चाहिए कि उसे 15वीं शताब्दी में यूरोपियन्स ने ही बसाया था; इसलिए वहाँ उसी संस्कृति का बोलबाला भी है। भारतीय उपमहाद्वीप की महिला द्वारा संस्कृति निर्वाह और अमेरिकी महिला द्वारा संस्कृति निर्वाह के अन्तर को दिखाने के लिए ही लेखक ने ‘शादी का भोज’ की रचना की है। जहाँ एक पुत्र अपनी 60 वर्षीय माँ के विवाह के भोज में स्वाद से तृप्ति महसूस करता है वहीं भारतीय उपमहाद्वीप का पुत्र इस सब को सुनकर चौंक जाता है। लेकिन एक मनोवैज्ञानिक तथ्य का उल्लेख भी लेखक करता है जिसकी अनदेखी करना अनुचित होगा—"उससे क्या फ़र्क पड़ता है? अकेले जीवन यापन बहुत कठिन हो जाता है। तुमको विश्वास नहीं है, तो किसी एकल महिला की आत्मा से पूछकर देखो।" ‘अंकमाल’ में दिखाया गया है कि अमेरिका में भी जीवन सरल नहीं है। ‘गोरी का मकान’ में अमेरिका के रहन-सहन और संस्कृति पर संवाद है।
‘मजबूत छड़ी’ माँ ने उदासी भरी नज़रों से मेरी तरफ़ देखा और कहा—"बेटा, तुम इकलौते बेटे हो, जिंदगी ऐसी ही होती है। जाने के लिए तो जाओ, लेकिन मुझे एक मज़बूत छड़ी की आवयकता है, क्या दे सकोगे?" यह ऊपर उद्धृत ‘मिर्च का पौधा’ में माँ द्वारा कहे गये वाक्य जैसा ही संकेत प्रधान वाक्य है। पात्र और उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत, दर्शन अथवा व्यंग्य इन कथाओं के लेखक द्वारा जबरन थोपा गया न होकर सहज-सामान्य रूप में पाठक के सामने आता है, यही इन लघुकथाओं को विशेष, पठनीय और प्रभावकारी बनाता है। इस कथा-कौशल के लिए खेमराज पोखरेल जी साधुवाद के पात्र हैं।

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