भूमिका / खेमराज पोखरेल की लघुकथाएँ : भाग-1 आ / बलराम अग्रवाल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शुक्रवार, नवंबर 06, 2026

खेमराज पोखरेल की लघुकथाएँ : भाग-1 आ / बलराम अग्रवाल

जीवन-संत्रास को संकेत और सहज व्यंग्य से प्रकट करती लघुकथाएँ

 गतांक से आगे…

‘बैसाखी’ में लेखक बताता है कि अनैच्छिक व्यक्ति से विवाह व्यक्ति को पंगु बनाकर उसे जीवन भर के लिए एक बैसाखी पकड़ा देने के समान है। लड़की को कहीं भी अकेले जाने की छूट न देने की संकुचित विचारधारा पर भी इसमें टिप्पणी है। ‘बेटी की कीमत’ को वर्तमान समय की अन्यतम लघुकथाओं में गिना जा सकता है। एक लड़की, जो पढ़ना चाहती थी, लेकिन स्कूल में ‘नामांकन’ लायक रकम कभी जुटा नहीं पायी। उसने कितनी ही जगह घरेलू नौकरियाँ कीं और हर जगह से अपने आपको बलात्कृत होने से बचाती रही। आज वह तेइस साल की हो चुकी है। आज भी वह स्कूल के होर्डिंग बोर्ड से पूछ रही है—"सरकार! मैं स्कूल में नामांकन कब कर सकती हूँ?" उसकी विवशता पर शायर सुदर्शन फाखिर की एक गजल का यह शेर अनायास ही सामने आ खड़ा होता है—‘रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें, जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया।’ ‘खोजी’ में आज की लड़की की कहती है—"माँ, मुझे आपके जैसा हसबैंड और बड़ी बहन जैसा श्रीमान् नहीं चाहिए, मुझे तो पूर्ण जीवनसाथी की तलाश है।…" तात्पर्य यह कि लेखक लड़कियों के जीवन की ओर सतर्क दृष्टि डाल रहा है।

आर्थिक दृष्टि से कमजोर और विकासशील देशों की प्रमुख त्रासदी यह है कि मातृभाषा के पक्ष में आन्दोलन करने वाले उनके नेता अपने बच्चों को अमेरिका, इंग्लैंड आदि अंग्रेजी-भाषी देश में पढ़ाते हैं और देशी भाषा से उन्हें दूर रखते हैं। चारों ओर से धकियाया हुआ शिक्षित आदमी आखिरकार ‘मुखौटा’ बन जाने को विवश हो जाता है। ‘ज्ञान’ में लेखक बताता है कि बच्चे स्नेह के भूखे होते हैं, सुविधा-सम्पन्नता के नहीं; और वर्जनाओं से भरा घर आखिरकार ‘जेल’ ही होता है।

 ‘हँसी’ के नायक की पूर्वदीप्ति में पिता, माँ, पत्नी, बेटा और बेटी की शिकायतभरी बातें ही आती हैं, प्रशंसाभरी नहीं। नायक स्वयं तरक्की के पीछे भाग रहा है। ऐसे में, मन्दिर के प्रवेश द्वार पर बैठी भिखारिन बुढ़िया के माध्यम से यथार्थ सिद्धान्त उसके समक्ष प्रकट कराया गया है—“जो हँस रहा है, वह दौलतमंद नहीं है; जो दौलतमंद है, वह हँस नहीं सकता।"

पोखरेल जी देश में व्याप्त राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक विरोधाभास सामने लाने में नितान्त सहज रहते हैं। शोर नहीं मचाते। नारेबाजी नहीं करते। उनके एक ओर वह आदमी है जो बेटे को एमबीबीएस में नामांकन के लिए एक मेडिकल कॉलेज में छह मिलियन जमा करके आया है। दूसरी ओर एक पहाड़ी पर एकान्त झोपड़ी में रहने वाली अकेली ऐसी औरत है, जिसके पति की माओवादियों ने हत्या कर दी है और जिसका बेटा डॉक्टर बनना चाहता है; लेकिन त्रासद स्थिति यह है कि उस बेचारी के पास उसे तीसरी कक्षा में दाखिल कराने को भी पैसे नहीं हैं।

एक ओर हिन्दी कथाकार प्रेमचंद की लघुकथा ‘राष्ट्र का सेवक’ (‘कौम का खादिम’ शीर्षक से 1917 में उर्दू में लिखित) लघुकथा है और दूसरी ओर पोखरेल जी लिखित ‘जज’। तात्पर्य यह कि लगभग सौ वर्ष के अन्तराल बाद भी नेताओं की कथनी-करनी में कोई अन्तर नहीं आया, उनका चरित्र जहाँ का तहाँ खड़ा है। नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की कथनी और करनी के अन्तर को सामने लाती एक अन्य लघुकथा है ‘भ्रूण हत्या’। यह कन्या-भ्रूण हत्या को अलग तरह से सामने रखती है । ‘नवकन्या’ में पात्र दुत्कारता है कि “बेटियों को तो शहर में ले जाकर भ्रूण में ही ख़त्म कर देता है और अभी दिखावे के लिए नवकन्या की पूजा!” ‘भ्रूणाकृति’ भी कन्या भ्रूण हत्या पर व्यंग्ययुक्त सशक्त लघुकथा है।

प्रत्येक रचनाकार में स्वयं द्वारा निर्मित मूर्ति को तोड़ डालने का साहस होना चाहिए। इस अर्थ में संग्रह की लघुकथा ‘आजादी’ प्रतिरोध दर्ज करने वाली की उल्लेखनीय रचना है।

कठोपनिषद में नचिकेता यम से कहते हैं—‘न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो…’ (मनुष्य कभी भी धन से तृप्त नहीं हो सकता)। लकवाग्रस्त पिता सोचता है—‘इस जन्म में न कुछ अच्छा काम किया, न दूसरे जन्मों के लिए दान-पुण्य किया। इधर भी गया, और उधर भी गया।’ और पुत्र  ‘पिताजी की बुद्धि’ पर आरोप लगाता है। ‘बेड़ा पार’ में दिखाया गया है कि आदमी उम्र भर बिना रुके, बिना विश्राम किए कमाता ही रहता है। उसको विश्राम मृत्यु के समय ही मिल पाता है।

जनता के नुमाइंदे अगर भ्रष्ट हों, येन-केन-प्रकारेण काम करा लेना ही अन्तिम ध्येय समझते हों तो ‘टेबल के अन्दर’ रिश्वत लेकर काम न करने वाले अफसर ही आखिरकार भ्रष्ट करार दिए जाते हैं। उनके चलते ही ‘सरकार नाकारा’ सिद्ध कर दी जाती है; दुर्भाग्य यह कि भ्रष्ट नुमाइंदे ही सड़कों पर भीड़ इकट्ठी कर ईमानदार अफसर के खिलाफ नारे लगाते हैं।

शेष आगामी अंक में…