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शुक्रवार, नवंबर 06, 2026

खेमराज पोखरेल की लघुकथाएँ : भाग-1 अ / बलराम अग्रवाल

जीवन-संत्रास को संकेत और सहज व्यंग्य से प्रकट करती लघुकथाएँ

डॉ॰ खेमराज पोखरेल

डॉ
. खेमराज पोखरेल नेपाली साहित्य के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। उन्होंने अनेक विधाओं 
में लेखन किया है। अब तक प्रकाशित उनकी कृतियों में 7 लघु संग्रह, यात्रा-वृत्तांत और 
साहित्यिक आलोचना पुस्तकें शामिल हैं। नेपाली लघुकथा के सम्मान्य स्तम्भों में वे एक हैं 
और अपने निरन्तर सक्रिय योगदान के लिए जाने जाते हैं। वह एक संवेदनशील कथाकार हैं। 
उनकी लघुकथाओं में समकालीन समाज के जीवन-अनुभव, मानवीय संवेदनाएँ, 
मनोवैज्ञानिक एवं यथार्थवादी चित्रण तथा सर्वथा सकारात्मक दृष्टिकोण झलकता है। 
अब तक नेपाली भाषा में प्रकाशित उनके लघुकथा संग्रहों के हिन्दी नाम हैं  : मजबूत लाठी 
(दह्रो लौरो),  पचौरी की आइसक्रीम (पच्छ्यौरिको आइसक्रिम), रामशाह का आँगन 
(रामशाहको चौतारो), सीमा पर माँ (सिमानामा आमा), ईश्वर की मौत (ईश्वरको मृत्यु), 
श्रीवल्ली (श्रीवल्ली) तथा एकालाप (एकालाप)। लेखक के अनुसार, प्रस्तुत हिन्दी लघुकथा 
संग्रह ‘जीवन की छोर’ में उनके उपर्युक्त संग्रहों से चुनी हुई लघुकथाएँ शामिल हैं। इस तरह 
इसे उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं का संग्रह भी माना जा सकता है तथापि पुस्तक प्रकाशन 
सम्बन्धी कुछेक विवशताओं के चलते अनेक प्रतिनिधि लघुकथाएँ इसमें सम्मिलित करने से 
छोड़ भी दी गई होंगी।  
पोखरेल जी द्वारा लिखित इस पुस्तक की भूमिका को पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने 
हिन्दी लघुकथा की शास्त्रीयता को जानने की ओर भी खासा श्रम किया है तथा कोशिश की 
है कि लघुकथा को हिन्दी और नेपाली के वर्गों में विभाजित करके देखने की बजाय उसकी 
समग्रता में देखें और व्याख्यायित करें। लघुत्व, तात्कालिकता तथा प्रभावकारिता—को 
उन्होंने लघुकथा के त्रिआयामी सिद्धांत बताते हुए कहा है कि नेपाली लघुकथा-जगत् एक 
सही राजमार्ग की तरह इनका अनुसरण कर रहा है। अगले पैरा में वह एक और महत्वपूर्ण 
बात कहते हैं। यह कि—‘हिन्दी लघुकथा में मैंने तात्कालिकता पर उतना ध्यान देते नहीं 
देखा है। हिन्दी में शायद कथ्य-विधान के माध्यम से प्रभावकारिता के निर्माण पर अधिक 
जोर दिया जाता है, जबकि नेपाली लघुकथा में कथ्य-विधान और संरचना-विधान दोनों के 
माध्यम से प्रभावकारिता का निर्माण होता है। फिर भी, हिन्दी और नेपाली लघुकथा में 
बहुत-सी समानताएँ हैं।’
इन लघुकथाओं में पोखरेल जी ने प्रमुखत: संवादात्मक, विवरणात्मक, आत्मकथात्मक 
और वर्णनात्मक शैलियों का प्रयोग किया है। कथ्य का प्राकट्य अधिकतर लघुकथाओं के 
अन्त में हुआ है; लेकिन उस तक पहुँचने के लिए उन्होंने अतीत, पूर्वदीप्ति और फ्लैशबैक का 
सफल प्रयोग किया है। इसका लाभ लघुकथाकार को यह होता है कि वह जीवन के एक लम्बे 
कालखण्ड को कालदोष व्यवधान के बिना कथा की लघु-काया में समो पाने में सफल रहता 
है। अपनी अन्त:निर्मिति में ये लघुकथाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के जीवन-अनुभव 
तथा दर्शन और अमेरिका जैसे विकसित देश में उनके रहन-सहन एवं वैचारिक परिवेश पर 
प्रकाश डालती हैं।
कथाकार पोखरेल कुछेक पारस्परिक संवादों, बहसों और स्थितियों के अंकन के माध्यम से 
कथ्य-स्थापन की ओर बढ़ते हैं। शिकागो में घर है, घर में स्विमिंग पूल है, पाँच-पाँच 
गाड़ियाँ हैं; लेकिन अफसोस, अपने देश की मिट्टी की ‘महक’ नहीं है। इस अफसोस को वे 
जितनी सहजता से व्यक्त करते हैं, उतने ही धारदार तरीके से वह पाठक के मनो-मस्तिष्क 
में उतारते भी हैं।
अपंग हो जाने के कारण सेना से रिटायर हुआ उमेश विलायत से आये अपने दोस्त कमल 
की, देश में भ्रष्टाचार सम्बन्धी गैर-जिम्मेदार बातों से क्षुब्ध होकर साहसपूर्वक ललकारता है—
"मैं तो देश की एकता के लिए लहू दे चुका हूँ, फिर भी दूँगा। आप के जिस्म में अपने देश की 
एकता के लिए लहू है क्या?" ‘लहू’ में इस सवाल के द्वारा लेखक बताता है कि भ्रष्टाचार पर 
गाल बजाने मात्र से कुछ नहीं होगा, देश की सुरक्षा की जितनी जिम्मेदारी सीमा पर तैनात 
सैनिक की है, उतनी ही जिम्मेदारी सीमाओं के अन्दर रहने वाले सामान्य नागरिकों की भी 
है।
‘चायवाला’ में वह चाय की दुकान को देश का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करते हैं जहाँ बैठा हर 
आदमी अपनी-अपनी जाति और सम्प्रदाय/समुदाय को प्रकट करता हुआ बहस में मुब्तिला है। 
चायवाला जाति एवं सम्प्रदाय विहीन देशप्रेमी नागरिक है और इन सबकी सेवा में लगा हुआ है। 
शेष आगामी अंक में…